कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के इस ‘हेट स्पीच और हेट क्राइम’ बिल का बीजेपी शुरू से विरोध कर रही थी। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने बिना मंजूरी दिए ही इसे वापस लौटा दिया था। इसके बाद इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा गया था।
बीजेपी कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के जिस 'हेट स्पीच और हेट क्राइम' बिल का 'ड्रैकोनियन' क़ानून कहकर विरोध कर रही थी उस पर अब मोदी सरकार के गृह मंत्रालय ने आपत्ति जताते हुए सहमति देने से इनकार कर दिया है। केंद्र सरकार ने कर्नाटक सरकार के इस बिल को अनावश्यक बताते हुए कहा है कि इसकी ज़रूरत नहीं है। गृह मंत्रालय का कहना है कि मौजूदा कानून ही इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। गृह मंत्रालय यानी एमएचए ने कर्नाटक सरकार को साफ़ तौर पर बताया कि भारतीय न्याय संहिता 2023 और अन्य मौजूदा कानूनों में इस मुद्दे को पहले से ही अच्छी तरह कवर किया गया है। इसलिए राज्य में अलग से नया कानून बनाने की ज़रूरत नहीं है।
कर्नाटक विधानसभा ने पिछले साल बेलागावी शीतकालीन सत्र में 'हेट स्पीच और हेट क्राइम' बिल पास किया था। तब बीजेपी और जेडीएस ने इसका पुरजोर विरोध किया था। बीजेपी ने इस विधेयक को 'बेहद कठोर', 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला' और 'राजनीतिक प्रतिशोध का एक खतरनाक हथियार' करार दिया था।
बिल पास होने के बाद कांग्रेस सरकार ने इस पर मंजूरी के लिए राज्यपाल थावरचंद गहलोत को भेजा था। राज्यपाल ने जनवरी में बिल को अपनी मंजूरी नहीं दी और इसे वापस कर दिया। उन्होंने कहा कि यह बिल संवैधानिक रूप से सुरक्षित लोकतांत्रिक चर्चा पर बहुत गंभीर असर डालेगा। यानी यह बिल लोगों की आज़ादी से बोलने और चर्चा करने की हिम्मत को कमजोर कर देगा।
इसके बाद फ़रवरी में कर्नाटक सरकार ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के लिए बिल गृह मंत्रालय को भेजा। लेकिन केंद्र ने इस पर सहमति देने से इनकार कर दिया।
गृह मंत्रालय का पत्र
12 मई को जारी ऑफिस मेमोरेंडम में गृह मंत्रालय की सेंट्रल-स्टेट डिवीजन ने लिखा, 'जिन मुद्दों को इस बिल से हल करने की कोशिश की गई है, वे पहले से ही मौजूदा क़ानूनों में शामिल हैं। अलग क़ानून बनाने से क़ानून में दोहराव होगा और देशभर में एकरूपता भी प्रभावित होगी।' मंत्रालय ने साफ़ कहा, 'इसलिए इस समय प्रस्तावित कानून ज़रूरी नहीं लगता है। मौजूदा क़ानूनी ढाँचा चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त है।'अब केंद्र के जवाब के बाद कर्नाटक सरकार के संसदीय मामलों के विभाग ने 20 मई को गृह विभाग को पत्र लिखकर बिल पर अपनी टिप्पणियां या स्पष्टीकरण मांगे हैं।
बिल क्यों लाया गया?
कर्नाटक विधानसभा ने पिछले साल दिसंबर में नफ़रती भाषण रोकने वाला कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025 पास किया। यह देश का पहला ऐसा राज्य स्तर का कानून होता जो नफरत भरे भाषण और इससे जुड़े अपराधों को रोकने के लिए बनाया गया। विधानसभा में बहस के दौरान गृह मंत्री जी. परमेश्वर ने बिल का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह क़ानून ज़रूरी है ताकि समुदायों के बीच नफ़रत और झगड़ा फैलाने वाली बातें रोकी जा सकें। उन्होंने कहा कि कर्नाटक जैसे राज्य में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ होती रहती हैं, उन्हें रोकने के लिए यह बिल मदद करेगा।
बिल का मक़सद क्या है?
यह बिल समाज में नफरत, दुश्मनी या दुर्भावना बढ़ाने वाले भाषण और अपराधों को रोकना और सजा देना चाहता है। इसे बोलकर, लिखकर, छापकर, तस्वीर दिखाकर या ऑनलाइन तरीक़े से फैलाई जाने वाली नफ़रत को रोकने के लिए लाया गया। यह भी कहा गया कि यह कानून भारतीय न्याय संहिता 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 के साथ पुराने कानूनों के साथ चलेगा और यह उन्हें कमजोर नहीं करेगा।नफरती भाषण क्या माना जाएगा?
बिल में उस लिखी हुई बात, तस्वीर या ऑनलाइन संदेश को नफ़रती भाषण बताया गया जो किसी जीवित या मृत व्यक्ति, समूह या संगठन के खिलाफ नफरत, दुश्मनी या चोट पहुंचाने के इरादे से फैलाया जाए। नफ़रती भाषण में न सिर्फ बोलना, बल्कि इसे बढ़ावा देना, उकसाना, इसके फैलाने में मदद करना भी शामिल है। इसका मतलब है कि जो मूल बात कहे और जो उसे आगे फैलाए, दोनों पर कार्रवाई हो सकती है।
सजा और जुर्माना क्या है?
- पहली बार अपराध करने पर: कम से कम 1 साल से 7 साल तक जेल और 50000 रुपये जुर्माना।
- दोबारा अपराध करने पर: कम से कम 2 साल से 7 साल तक जेल और 1 लाख रुपये जुर्माना।
- सभी अपराध गंभीर और संज्ञेय माने गए हैं और जमानत आसानी से नहीं मिलेगी। केस ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास कोर्ट में चलेगा।
कोर्ट पीड़ितों को उनकी चोट और नुकसान के हिसाब से अच्छा मुआवजा दे सकता है। इससे सिर्फ सजा ही नहीं, पीड़ित को राहत भी मिलेगी।
बीजेपी का विरोध क्यों?
इस बिल को पास करने के दौरान विपक्षी बीजेपी के विधायकों ने जोरदार विरोध किया। उनका कहना था कि इस क़ानून का दुरुपयोग हो सकता है। इससे सोशल मीडिया पर या राजनीतिक बातचीत में असहमति जताने वालों को चुप कराया जा सकता है। बीजेपी ने इस बिल को ‘ड्रैकोनियन’, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला’ और ‘राजनीतिक बदले की खतरनाक औजार’ बताया था।
केंद्र के इस रुख के बाद कर्नाटक सरकार को फ़ैसला करना है कि वह बिल पर क्या आगे क़दम उठाती है।