कर्नाटक में पहले से भरे हुए फॉर्म-7 भेजे जाने के मामले में मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय में ज्ञापन देने व प्रेस कॉफ्रेंस करने वाले सीएम डीके शिवकुमार ने आरोप लगाया कि दिल्ली के बीजेपी नेताओं, कार्यकर्ताओं को पहले से प्रिंटेड फॉर्म-7 एप्लीकेशन दिए गए हैं।
कर्नाटक में SIR के दौरान पहले से प्रिंटेड फॉर्म-7 भेजे जाने के मामले में राज्य के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने चुनाव आयोग और बीजेपी के ख़िलाफ़ बड़ा मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन को भेजे जाने को बड़ी आपराधिक साज़िश क़रार दिया है। मुख्यमंत्री ने बीजेपी और जनता दल के नेताओं पर पात्र मतदाताओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि कम से कम 50 लाख फॉर्म-7 छपवाए गए हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव अधिकारी से विस्तृत जांच, एफ़आईआर और जिम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की मांग की है।
डीके शिवकुमार ने आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा कराकर लाखों पात्र मतदाताओं के नाम कटवाने की कथित साजिश की जा रही है। शिवकुमार ने कहा कि कुछ लोगों को पहले से प्रिंट किए हुए फॉर्म-7 दिए गए हैं। इन फॉर्मों में कथित तौर पर मतदाताओं के नाम, पते और EPIC यानी वोटर आईडी नंबर पहले से दर्ज हैं। उन्होंने दावा किया कि कम से कम 50 लाख फॉर्म-7 छपवाए गए हैं और 45 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम या विवरण को लेकर गड़बड़ी सामने आई है।
शिवकुमार ने गुरुवार को कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी सीईओ के कार्यालय पहुँचकर ज्ञापन सौंपा और पूरे मामले की विस्तृत जाँच की मांग की। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इतनी बड़ी कथित गड़बड़ी उनकी जानकारी के बिना संभव नहीं हो सकती है।
क्या है फॉर्म-7 और विवाद क्यों?
फॉर्म-7 चुनाव आयोग की मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका इस्तेमाल किसी मतदाता के नाम को सूची से हटाने या प्रस्तावित नाम शामिल करने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। किसी मतदाता की मृत्यु, स्थान परिवर्तन, एक से अधिक जगह नाम दर्ज होने या अन्य निर्धारित कारणों के आधार पर नाम हटाने की प्रक्रिया में इस फॉर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल है कि क्या किसी व्यक्ति या राजनीतिक कार्यकर्ता को बड़ी संख्या में ऐसे फॉर्म जमा करने चाहिए जिनमें दूसरे मतदाताओं की निजी जानकारी पहले से भरी हो?
डीके शिवकुमार का आरोप है कि कर्नाटक में इसी प्रक्रिया का कथित दुरुपयोग किया जा रहा है। उनके मुताबिक, बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा कराकर ऐसे मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश हो रही है जो वास्तव में मतदान के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल मतदाता सूची में सामान्य सुधार का मामला नहीं, बल्कि चुनावी अधिकारों को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा है।
‘दिल्ली से बीजेपी नेताओं को भेजे गए फॉर्म’
शिवकुमार ने दावा किया कि पहले से प्रिंट किए गए फॉर्म-7 दिल्ली से बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं को उपलब्ध कराए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने ये फॉर्म जमा किए, उनके पास मतदाताओं के EPIC नंबर, पते और दूसरी जानकारियां कहां से आईं?
शिवकुमार ने कहा कि यह पता लगाना जरूरी है कि डेटा किसने उपलब्ध कराया, फॉर्म किसने तैयार किए और उन्हें जमा कराने के पीछे कौन लोग हैं। उनके मुताबिक, कई मामलों में एक ही व्यक्ति ने दर्जनों या सैकड़ों फॉर्म जमा किए। उन्होंने मिसाल देते हुए 84, 92, 241 और 423 फॉर्म जमा किए जाने का दावा किया। शिवकुमार ने बताया कि कई आवेदन 22, 23 और 24 सितंबर को जमा किए गए। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने व्यक्तिगत रूप से इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं की जानकारी जुटाकर आवेदन किए हैं तो यह जांच का विषय है कि उसे यह डेटा कैसे मिला।विजयपुरा में हजारों फॉर्म जमा करने का आरोप
डीके शिवकुमार ने विजयपुरा जिले को लेकर कई गंभीर दावे किए। उनके मुताबिक़ विजयपुरा सिटी विधानसभा क्षेत्र में अकेले 14 हजार से अधिक आवेदन जमा किए गए। उन्होंने कहा कि दो दिनों में क़रीब 13 हजार फॉर्म-7 जमा होने की जानकारी मिली है। बाबलेश्वर विधानसभा क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में आवेदन जमा किए जाने का दावा किया गया।
शिवकुमार के अनुसार, छह लोगों ने क़रीब 1634 से 1651 तक आवेदन जमा किए। बाद में अधिकारियों की ओर से कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दिए जाने के बाद इनमें से कई आवेदन वापस लिए जाने की बात सामने आई। उन्होंने आरोप लगाया कि आवेदन जमा करने वालों में बीजेपी कार्यकर्ता और एक बीजेपी विधायक के कार्यालय से जुड़े कर्मचारी भी शामिल थे।
भाल्की में एक दिन में 3244 फॉर्म जमा करने का दावा
कर्नाटक के मंत्री ईश्वर खांड्रे ने भाल्की विधानसभा क्षेत्र में भी इसी तरह की कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाया। खांड्रे के मुताबिक, एक ही दिन में 36 लोगों ने 3244 फॉर्म-7 जमा किए। उन्होंने इन लोगों को बीजेपी कार्यकर्ता बताया। मंत्री ने एक व्यक्ति का उदाहरण दिया जिसने कथित तौर पर 241 आवेदन जमा किए थे।शिवकुमार ने बेलगावी में भी फॉर्म-7 जमा कराने को लेकर कथित गड़बड़ियों का ज़िक्र किया। उन्होंने बीजेपी के पराजित उम्मीदवार डॉ. रवि पाटिल का नाम लेते हुए दावा किया कि उन्होंने आवेदन जमा कराने में हुई गलती स्वीकार की थी। शिवकुमार के मुताबिक, कुछ फॉर्म एक अस्पताल से जुड़े लोगों के जरिए मतदान केंद्रों तक लाए गए थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ ऐसे लोगों के नाम और फोन नंबर आवेदन में दर्ज थे जिन्होंने खुद आवेदन करने से इनकार किया।
‘70% बूथों पर फॉर्म-7 लेने की जानकारी’
डीके शिवकुमार ने दावा किया कि राज्य के 70 फीसदी से अधिक मतदान केंद्रों से जुड़े क्षेत्रों में बीजेपी और अन्य राजनीतिक नेताओं द्वारा फॉर्म-7 लेने या जमा कराने की जानकारी मिली है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने अपने स्तर पर इस तरह की गतिविधियों की जानकारी जुटाई है और दस्तावेजों को एकत्र किया जा रहा है।
शिवकुमार के मुताबिक, बेलगावी, भाल्की, मैसूरु और अन्य स्थानों पर मतदाताओं के नाम कथित रूप से अवैध तरीके से हटाने की कोशिशों को लेकर FIR दर्ज की गई हैं। उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की कि इन मामलों को केवल प्रशासनिक शिकायत मानकर न देखा जाए, बल्कि संभावित चुनावी अपराध और आपराधिक कृत्य के रूप में जांच की जाए।
डीके शिवकुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर कथित तौर पर फॉर्म-7 जमा किए जाने की गतिविधियां मुख्य चुनाव आयुक्त की जानकारी के बिना नहीं हो सकतीं।
शिवकुमार ने चुनाव आयोग से पूछा कि यदि बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश हो रही है तो आयोग ने अब तक क्या कार्रवाई की है? उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग तत्काल जांच शुरू करे और जहां अपराध के प्रथम दृष्टया आधार हों, वहां एफ़आईआर दर्ज कराई जाए।
CEO कार्यालय पहुंचे शिवकुमार
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि वह अपनी सरकार और कांग्रेस की ओर से जुटाए गए दस्तावेज और सबूत स्वयं मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सौंपेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक कथित आपराधिक साजिश की विस्तृत जांच के आदेश नहीं दिए जाते, वह सीईओ कार्यालय से वापस नहीं जाएंगे। शिवकुमार ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वह कार्यालय में रात बिताने और निर्धारित कैबिनेट बैठक छोड़ने के लिए भी तैयार हैं।
बाद में वह मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनबु कुमार के कार्यालय पहुंचे और बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने की कथित कोशिशों की जांच की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार उपलब्ध कानूनी प्रावधानों की भी जांच करेगी, लेकिन चुनावी अपराधों पर प्राथमिक कार्रवाई की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है।‘गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है’
शिवकुमार ने आरोप लगाया कि फॉर्म-7 के ज़रिए कथित तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों, पिछड़े वर्गों, दलितों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटा दिया जाता है तो उसका सीधा असर उसके मतदान के अधिकार पर पड़ेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के हर नागरिक और मतदाता की सुरक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह जिम्मेदारी केवल कांग्रेस समर्थकों की नहीं, बल्कि बीजेपी के मतदाताओं की भी है।
डीके शिवकुमार ने SIR को रद्द करने की मांग भी की। उन्होंने विधायकों, बूथ लेवल एजेंटों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम मतदाताओं से अपील की कि अगर कहीं संदिग्ध फॉर्म-7 जमा किए जा रहे हैं तो तत्काल इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को दें। उन्होंने जिला उपायुक्तों, सहायक आयुक्तों, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, तहसीलदारों और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से भी कहा कि किसी भी तरह की गड़बड़ी की सूचना चुनाव आयोग को दी जाए।