कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने यह कहते हुए साफ़ तो कर दिया कि उनके बीच कोई मतभेद नहीं है, लेकिन दोनों ने फ़ैसले लेने की ज़िम्मेदारी आलाकमान पर छोड़ दी। ब्रेकफास्ट बैठक के तुरंत बाद दोनों ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उन्होंने कैमरे के सामने मुस्कुराते हुए कहा कि वे एकजुट हैं। उन्होंने कहा कि उनके बीच न पहले कभी मतभेद थे और न ही भविष्य में होगा। सिद्धारमैया ने कहा कि कोई भी फ़ैसला आलाकमान लेगा। डीके शिवकुमार ने भी कहा कि हमने हमेशा आलाकमान का फ़ैसला माना है। लेकिन सवाल है कि जब उनमें इतनी एकता है तो फिर ये बवाल क्यों हुआ और वे आलाकमान पर फ़ैसला लेने की ज़िम्मेदारी क्यों छोड़ रहे हैं? आख़िर आलाकमान क्या तय करेगा? क्या विवाद अभी भी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है?

इन सवालों को समझने से पहले यह जान लें कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों नेताओं ने क्या कहा। डीके शिवकुमार ने कहा, 'मुख्यमंत्री और मैं साथ मिलकर काम करते हैं। हम पार्टी के वफादार सिपाही हैं। पार्टी में कोई गुट नहीं हैं।' हालाँकि, इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि पार्टी बुलाएगी तो हम दिल्ली जाएँगे। उन्होंने कहा कि लोगों का कांग्रेस सरकार में विश्वास है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी डीके शिवकुमार की बात को दोहराते हुए कहा कि उनके बीच में कोई मतभेद नहीं है और उन्होंने गुटबाज़ी की ख़बरों को खारिज कर दिया।
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सरकार के ढाई साल पूरे होने के ठीक बाद उपजे इस संकट को शांत करने के लिए सिद्धारमैया ने डी.के. शिवकुमार को शनिवार सुबह नाश्ते पर आमंत्रित किया था। दोनों नेताओं की यह मुलाकात कांग्रेस आलाकमान के सीधे हस्तक्षेप के बाद हुई। पार्टी के महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने शुक्रवार को दोनों नेताओं को फोन करके साफ निर्देश दिया था कि वे आमने-सामने बैठकर सारे मतभेद सुलझा लें और एकजुटता दिखाएँ। वेणुगोपाल ने कहा था, 'अंतिम फैसला आलाकमान का होगा। आप लोग आपस में न लड़ें। सोशल मीडिया पर एक-दूसरे पर तंज कसना बंद करें। यह कांग्रेस संस्कृति के खिलाफ है।'

शिवकुमार खेमे के समर्थक दावा कर रहे हैं कि 2023 में सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाने के समय आलाकमान ने ढाई साल बाद सत्ता हस्तांतरण का वादा किया था। अब वे उस कथित वादे को पूरा करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर सिद्धारमैया खेमा इसे महज अफवाह बता रहा है।

आलाकमान का फ़ैसला क्या?

बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने शुक्रवार को कहा था, 'आलाकमान ने दोनों को फोन करके मिलने को कहा है। इसलिए मैंने उन्हें कल सुबह नाश्ते पर बुलाया है। वे आएँगे तो बात करेंगे। मेरी स्थिति में कोई बदलाव नहीं है। आलाकमान जो कहेगा, हम दोनों मानेंगे। अगर दिल्ली बुलाया गया तो मैं भी जाऊँगा।'
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शिवकुमार के भी तेवर नरम!

उधर, कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने भी शुक्रवार को नरम तेवर दिखाए थे। आंगनवाड़ी कार्यक्रम के स्वर्ण जयंती समारोह में सिद्धारमैया के साथ मंच साझा करते हुए उन्होंने कहा था, 'मुझे कुछ नहीं चाहिए। पार्टी जो फैसला लेगी, वही मान्य होगा। मैं जल्दबाजी में नहीं हूँ।' उन्होंने यह भी कहा कि संसद के शीतकालीन सत्र से पहले वे दिल्ली जा सकते हैं क्योंकि कर्नाटक के सांसदों से कई परियोजनाओं पर चर्चा करनी है।

संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ दिनों में शिवकुमार समर्थक विधायकों के कई जत्थे दिल्ली जाकर आलाकमान से नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर चुके हैं। सिद्धारमैया भी दिल्ली जाकर स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। 

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बेंगलुरु में कई दौर की बैठकों के बावजूद अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है।

'नेतृत्व परिवर्तन पर आलाकमान का कोई निर्देश नहीं'

सिद्धारमैया के बेटे एवं विधायक यतिंद्र सिद्धारमैया ने पूरे विवाद को मीडिया की उपज करार दिया। उन्होंने कहा, 'नेतृत्व परिवर्तन को लेकर आलाकमान की ओर से कोई निर्देश नहीं आया है। 2023 में ढाई साल बाद सत्ता सौंपने का कोई वादा हुआ था या नहीं, यह किसी को नहीं पता। इसलिए अनुमान लगाना उचित नहीं।'

विपक्षी भाजपा इस अवसर का पूरा फायदा उठाने की फिराक में है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा सांसद बसवराज बोम्मई ने चेतावनी दी, '8 दिसंबर तक समय है। अगर कांग्रेस में अंदरूनी कलह जारी रही तो विधानसभा सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाने की नौबत आ सकती है।' कई भाजपा नेताओं ने कहा कि सरकार में जारी अस्थिरता प्रशासनिक अक्षमता को दिखाती है और ज़रूरत पड़ी तो फ्लोर टेस्ट की मांग की जा सकती है।
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कांग्रेस नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं व विधायकों से अपील की है कि वे सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी न करें और आलाकमान के फैसले का इंतजार करें। पार्टी सूत्र बता रहे हैं कि संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से और विधानसभा का सत्र दिसंबर के पहले सप्ताह में शुरू हो रहा है। ऐसे में आलाकमान कोई भी फैसला बहुत सोच-समझकर और सही राजनीतिक समय देखकर ही लेगा।