केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 2026 के विधानसभा चुनावों में शानदार वापसी की है। दस साल बाद सत्ता में आने का यह मौका कांग्रेस को लंबे इंतजार के बाद मिला। केरल में पिनारायी विजयन सरकार सत्ता विरोधी लहर के बोझ तले दब गई थी, जबकि कांग्रेस ने कोई गलती नहीं की। केरल में बीजेपी का ढिंढोरा खूब पीटा गया लेकिन पिछले चुनाव के नतीजे और इस चुनाव के नतीजों तक बीजेपी कुछ खास करिश्मा नहीं दिखा पाई। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक केरल में यूडीएफ 99 और एलडीए यानी वाम मोर्चा 35 सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी। राज्य में यूडीएफ सरकार बनना तय है।

निकाय चुनाव से ही मिल गया था संकेत

विधानसभा चुनावों से ठीक पहले हुए स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की बड़ी जीत ने पार्टी को भरोसा दिलाया कि सत्ता वापस मिल सकती है। इससे उत्साह तो बढ़ा, लेकिन आशंका भी थी कि नेताओं में आपसी कलह शुरू हो सकती है। पांच साल पहले राहुल गांधी के प्रयासों को केरल कांग्रेस के आंतरिक झगड़ों ने ही नाकाम कर दिया था। हालांकि बीच-बीच में थरूर गैरजरूरी बयान ज़रूर दे देते थे।

कांग्रेस की व्यूह रचना

इस बार कांग्रेस आलाकमान ने पूरी सतर्कता बरती। केरल में पार्टी की सबसे बड़ी जरूरत और चुनौती थी- एकता। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने साल की शुरुआत में तिरुवनंतपुरम सांसद शशि थरूर से लगभग दो घंटे की बैठक की। विभिन्न बयानों से पैदा हुई अटकलों को दूर कर थरूर को कैंपेन कमिटी का सह संयोजक बनाया गया। थरूर ने पूरे राज्य में पार्टी के लिए प्रचार किया। टिकट वितरण के लिए हाईकमान ने गुजरात के वरिष्ठ नेता मधुसूदन मिस्त्री को भेजा। जनता सरकार बदलना चाहती थी, लेकिन लेफ्ट के मौजूदा विधायकों के खिलाफ खास गुस्सा नहीं था। इसको ध्यान में रखकर कांग्रेस ने युवा नेताओं पर दांव खेला।

MPs को टिकट नहीं मिला

मिस्त्री की कमिटी ने फैसला लिया कि कोई मौजूदा सांसद चुनाव नहीं लड़ेगा। इस पर आंतरिक विरोध हुआ। राज्य के पूर्व अध्यक्ष और sitting MP सुधाकरन ने आखिरी समय में टिकट की मांग की थी। यहां तक राहुल गांधी के नजदीकी सांसदों के किसी भी कोटे को महत्व नहीं मिला। प्रियंका गांधी तमाम सांसदों के नाम का अनुमोदन करने से बचीं। एके एंटोनी, खड़गे और राहुल गांधी ने सुधाकरन और उनके परिवार को मनाया। बाद में केसी वेणुगोपाल ने विद्रोही नेताओं को घर जाकर सुलझाया। पार्टी की राज्य प्रभारी दीपा दास मुंशी ने भी पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई।

आक्रामक प्रचार और वादे

टिकट वितरण के बाद कांग्रेस ने अनुशासित और एकजुट टीम का चेहरा दिखाया। प्रचार में CPM सरकार और CM पिनारायी विजयन पर तीखे हमले किए गए। राहुल गांधी ने खुद मोर्चा संभाला और सीएम पर सांठगांठ के आरोप लगाए। पार्टी ने ₹25 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा का वादा प्रमुखता से प्रचारित किया।

सोशल इंजीनियरिंग

मुस्लिम वोट: मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन से भरोसा था। कवि और सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को मुस्लिम समुदाय के बीच प्रचार के लिए आगे किया गया।
ईसाई वोट: ईसाई समुदाय कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक है। चुनाव से पहले सनी जोसेफ (ईसाई) को राज्य अध्यक्ष बनाया गया। केंद्र का FCRA बिल भी ईसाई मतदाताओं को एकजुट करने में मददगार रहा।
नायर समुदाय: संभावित CM चेहरे- केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला सभी नायर समुदाय से हैं। BJP भी इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन कांग्रेस को फायदा हुआ।

चुनावी नतीजा और ऐतिहासिक संदर्भ

केरल में पांच साल में सरकार बदलने की परंपरा रही है। दस साल सत्ता विरोधी लहर के बाद पी विजयन सरकार कमजोर पड़ गई। कांग्रेस ने कोई गलती नहीं की और नारा "UDF Jayikkum, LDF Nayikkum" (UDF जीतेगा, LDF हटेगा) काम कर गया। लगभग 60 साल बाद देश में पहली बार कोई राज्य ऐसा नहीं बचा जहां वामपंथी पार्टी की सरकार हो। वीडी सतीशन समेत कांग्रेस नेताओं ने कार्यकर्ताओं के साथ खुलकर खुशियां मनाईं। यह कांग्रेस के लिए दस साल के राजनीतिक "निर्वासन" का अंत है।