केरल प्रशासन में एक महत्वपूर्ण बदलाव के तहत, 2003 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. रतन यू. केलकर को मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन का सचिव नियुक्त किया गया है। केलकर हाल तक केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के पद पर थे।
केलकर दिसंबर 2024 में केरल के CEO बने थे और उन्होंने हाल ही में संपन्न हुई विधानसभा चुनावों की देखरेख की थी। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने चुनाव के तुरंत बाद यह नियुक्ति की है, जो व्यापक प्रशासनिक फेरबदल का हिस्सा है। मूल रूप से एमबीबीएस डॉक्टर रतन केलकर स्वास्थ्य, आईटी, पर्यावरण और जिला प्रशासन जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। उन्हें पहले बेस्ट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर का पुरस्कार भी मिल चुका है।
केरल सरकार ने इस नियुक्ति को सामान्य बदलाव बताया है, लेकिन विपक्ष, खासकर भाजपा ने इसकी तीखी आलोचना की है। आलोचक इस नियुक्ति की तुलना पश्चिम बंगाल के हालिया मामले से कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान मुख्य निर्वाचन अधिकारी रहे मनोज अग्रवाल को भाजपा के नेतृत्व वाली शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने मुख्य सचिव बना दिया है। कांग्रेस के अलावा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने मनोज अग्रवाल अग्रवाल की पदोन्नति पुरस्कार का पुरजोर विरोध किया था। TMC नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा चुनाव में कथित पक्षपात के लिए अधिकारी को इनाम दे रही है। 
ताज़ा ख़बरें
केरल भाजपा अध्यक्ष के. सुरेंद्रन समेत अन्य नेताओं ने केलकर की नियुक्ति पर टिप्पणी करते हुए इसे "कांग्रेस की दोहरी नीति" बताया है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेताओं ने बंगाल में मंजू अग्रवाल की नियुक्ति को "इनाम" बताया था, लेकिन अब खुद केरल में इसी तरह के पूर्व CEO को मुख्यमंत्री के अत्यंत निकटवर्ती पद पर नियुक्त कर दी है।

सोशल मीडिया पर चर्चा

सोशल मीडिया पर केरल में हुई इस नियुक्ति की काफी चर्चा है। एक्स पर यूजर कोहरा अब्राहम ने लिखा है- ठीक 10 दिन पहले जब मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को पश्चिम बंगाल का मुख्य सचिव बनाया गया था, तब राहुल गांधी ने यही कहा था। आज, केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पद पर कार्यरत रतन केलकर को मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशान का सचिव नियुक्त किया गया है। केलकर उस समय भी मुख्य निर्वाचन अधिकारी थे जब चुनाव संबंधी विज्ञप्ति 'गलती से' भाजपा की मुहर के साथ भेजी गई थी।
एक्स पर एक और यूजर अनुराग झुनझुनवाला ने लंबा ट्वीट किया है। अनुराग ने लिखा है- जीवन भर नौकरशाही में रहने वाले लोगों द्वारा अपने करियर के दौरान विभिन्न भूमिकाएँ निभाने में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन यह वही राहुल गांधी समर्थक समूह है जिसने पश्चिम बंगाल काडर के 36 वर्षीय आईएएस अधिकारी को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का मुख्य सचिव नियुक्त किए जाने पर भाजपा और चुनाव आयोग को "चोर" कहा था। यह आक्रोश इसलिए है क्योंकि एक लंबा राजनीतिक इतिहास है जिसे वे पूरी तरह से दबाना चाहते हैं। 
सोशल मीडिया पर इसी तरह की टिप्पणियां काफी लोगों ने की हैं। जिसमें केरल में हुई नियुक्ति पर सवाल उठाया गया है।
राजनीतिक इतिहास में झांकते हुए अनुराग झुनझुनवाला ने लिखा है-  नेहरू ने भारत के पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पद्म भूषण से सम्मानित किया और बाद में उन्हें बर्दवान विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया। इंदिरा गांधी ने दूसरे मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया। तीसरे मुख्य निर्वाचन अधिकारी कांग्रेस के आंतरिक कलह के दौरान तटस्थ रहे, इसलिए स्वाभाविक रूप से उन्हें कोई पुरस्कार नहीं मिला। चौथे मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। पांचवें मुख्य निर्वाचन अधिकारी को आपातकाल के दौरान उनके कार्यकाल के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। सातवें मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इंदिरा गांधी द्वारा नियुक्त किए जाने के बाद पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। बाद में राजीव गांधी ने उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया। दसवें मुख्य आयुक्त, टी. एन. शेषन ने 1999 के लोकसभा चुनाव में अहमदाबाद से एल. के. आडवाणी के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा।
ग्यारहवें मुख्य आयुक्त, एम. एस. गिल, 2004 से 2016 तक कांग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे। मनमोहन सिंह के नेतृत्व में उन्होंने खेल एवं युवा मामलों के मंत्री के रूप में भी कार्य किया। इसी तरह और भी नियुक्तियों की चर्चा उन्होंने की है।

दोनों नियुक्तियों में अंतर

पश्चिम बंगाल में मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव (Chief Secretary) बनाया गया, जो राज्य का सबसे उच्च प्रशासनिक पद है। जबकि
केरल में रतन केलकर को मुख्यमंत्री के सचिव (Secretary to Chief Minister) बनाया गया है, जो महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत सीमित भूमिका वाला पद है। 
केरल सरकार के समर्थकों का कहना है कि चुनाव के बाद नौकरशाही फेरबदल सामान्य प्रक्रिया है और केलकर का कार्यकाल प्रोफेशनल रहा। हालांकि, चुनाव की देखरेख करने वाले अधिकारी को सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय में लाने के फैसले पर संघर्ष हितों (conflict of interest) और संस्थागत निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।