'हवा में बारूद है' पुस्तक समीक्षा
“ये लड़के कौन थे? उन्हें अपने देश से प्यार था, उन्हें लोगों से प्यार था। वे लोगों को गरीबी, शोषण, बुरी स्थिति से उबरना चाहते थे। हमने उन पर हिंसक होने का ठप्पा लगा दिया, उन्हें यंत्रणा दी, उन्हें मार डाला। अगर वे हिंसक थे तो क्या हम सब अहिंसा के पुजारी के अवतार हैं?”
बांग्ला के दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी के उपन्यास “हवा में बारूद है” की ये पंक्तियां आज के ‘अर्बन नक्सल’ के क्षद्मघोष और जंगलों से नक्सलियों के सफाया अभियान के दौर में समकालीन लग सकता है, लेकिन ये उपन्यास सातवें दशक में युवा और किसान नव जागरण की जमीन पर लिखा गया है। सातवें दशक में उभरे नक्सलबाड़ी उत्कर्ष को बंदूक के दम पर ख़त्म करने की शुरुआत उसी समय हो गयी थी, जिसके समापन की घोषणा हाल में गृहमंत्री अमित शाह ने की। जेल की चारदीवारी में गुथे गए इस उपन्यास की कहानी सत्तर के दशक का होने के बावजूद आज के समय तक फैली हुई होने का एहसास कराती है और पूरे देश में फैली हुई लगती है। व्यापारी ने जेल के जीवन के ज़रिए पूरे देश में पसरे शोषण, अत्याचार और अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की है, जिसे बार बार दबाया जाता है और वो राख के ढेर के भीतर से फिर सुलगने लगता है। क्योंकि वो उभार जिन मुद्दों को लेकर हुए थे उन्हें कभी सुलझाया ही नहीं गया। हर दौर में बस दबाया गया।
इस उपन्यास के कथानक और शैली दोनों पर बंगाल की महान जन लेखक महाश्वेता देवी की छाप दिखाई देती है। इसका एक कारण ये है कि महाश्वेता देवी ही एक तरह से मनोरंजन व्यापारी की गुरु थीं। पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से एक बाल शरणार्थी के तौर पर भारत आए व्यापारी नमो शूद्र जाति से हैं। खदान मजदूर नेता के रूप में मशहूर शंकर गुहा नियोगी के साथ रह कर उनका समसामयिक सरोकारों से नाता जुड़ा। 24 साल की उम्र में जेल के भीतर उन्होंने लिखना-पढ़ना सीखा। बाद में कोलकाता में रिक्शा चलाने के पेशे से जुड़े और इसी दौर में उनकी मुलाक़ात प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी से हुई। उनकी प्रेरणा से व्यापारी ने लिखना शुरू किया।
‘हवा में बारूद है’, एक तरह से भोगा हुआ यथार्थ है। लेकिन ये कोई संस्मरणात्मक विवरण नहीं है। इसके ज्यादातर पात्र जेल के भीतर रहने वाले वे लोग हैं जिन्हें असामाजिक घोषित किया जा चुका है। उपन्यास के कैनवास को थोड़ा ज़ूम आउट करने पर ये पात्र पूरे देश का प्रतिनिधि बन जाते हैं। जो चारदीवारी में हो रहा है वो ही बाहर भी दिखाई देता है।
उपन्यास की शैली पर विद्वता की कोई छाप नहीं है। इसकी भाषा एक नदी की तरह बहती है। कभी उबड़ खाबड़ तल पर मचलती लहरों की तरह तो कभी समतल धरातल पर शांत और स्थिर।
उपन्यास के सारे पात्र अपने आस पास फैले हुए चेहरों की तरह लगते हैं। इस कहानी में बैंडिसवाला से लेकर भोगोबान और भजान तक ऐसे पात्र हैं जो हमारे समय में जीवित दिखाई देते हैं। बैंडिसवाला नहीं है। कहीं नहीं है। वो स्मृति है, वो जेल के आतंक का चेहरा है। वो यातना का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है और प्रेत भी है जो आम कैदियों और षड्यंत्र करनेवाले जेल अधिकारियों की स्मृतियों में बसता है। भोगोबान, एक मामूली अपराधी जो जेल के खबरिया से बागी युवकों का हमदर्द बन जाता है, सत्ता के उस विद्रूप को सामने लाता है जिसका मक़सद असहाय लोगों को यातना चक्र में फँसाए रखना होता है। जेल तोड़ने की हिमाक़त करने वाले बाग़ियों के खात्मा के बाद जेल का मामूली गार्ड भजान का हथियार रवींद्रनाथ टैगोर की कविता बन जाती है। जेल की दीवारों पर उभरकर ये कविता जेल अधिकारियों के बीच दहशत पैदा करने लगती है। असीमित यातनाओं के बावजूद वो लड़के मरे नहीं। वो भजान के शरीर में प्रवेश कर गए। वो यहाँ नहीं हैं। वो कहीं नहीं हैं। लेकिन वो यहीं कहीं हैं। यहीं हमारे आसपास।
मनीषा तनेजा का हिंदी अनुवाद में मौलिकता
मनीषा तनेजा ने हिंदी अनुवाद में बांग्ला की मौलिकता को बरकरार रखते हुए इसे हिंदी की जमीन से जोड़ दिया है। दरअसल इसे पढ़ते हुए ये एहसास ही नहीं होता कि किसी अन्य भाषा से अनुवाद किया गया है। आम फ़हम हिंदी जैसे कोई किस्सागोई कर रहा है। अनेक पात्रों को एक तानाबाना में समेट कर कोई मौलिक दास्तान सुना रहा है। अनुवाद की एक बड़ी समस्या होती है मूल भाषा की विशिष्टता को बरकरार रखते हुए एक नयी भाषा गढ़ना। मनीषा इस कला में माहिर हो चुकी हैं।
मशहूर लेखक पाब्लो नेरूदा के संस्मरण का स्पेनी भाषा से हिंदी में अनुवाद में मनीषा ने कुछ ऐसा ही कमाल दिखाया था। नादिम गार्डिनर को हिंदी में एक नयी पहचान उन्होंने ही दी। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनी भाषा की शिक्षक मनीषा विश्व की विभिन्न भाषाओं की करीब एक दर्जन रचनाओं का अनुवाद कर चुकी हैं। रचना मूल रूप से किसी भी भाषा की हो मनीषा की कोशिश उसे हिंदी की धरातल पर उतारने की होती है। ‘हवा में बारूद है’ को भी उन्होंने हिंदी की मूल रचना का स्वाद दे दिया है।