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बिहार में चुनाव से पहले ही खंड-खंड हो रहा महागठबंधन

बसंत ऋतु ने दस्तक दे दी है और बिहार के लोग बसंती बयार का लुत्फ़ भी उठाने लगे हैं। लेकिन प्रदेश के राजनेता इस मदमस्त बसंती फ़गुनहट से कोसों दूर राजनीतिक चौसर पर व्यस्त नज़र आ रहे हैं। हो भी क्यों नहीं, लोकसभा का चुनाव जो निकट आ रहा है। 

एक ओर जहाँ महागठबंधन के दो घटक दल - राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम), लगातार अपने पुराने एवं विश्वसनीय नेताओं को खो रहे हैं। वहीं, राजद के दो दिग्गज नेता अपनी ही पार्टी में ख़ुद को असहज महसूस कर रहे हैं। सीट बंटवारे को लेकर तो खींचतान पहले से ही जारी है।

  • 10 फ़रवरी की सुबह जैसे ही यह ख़बर आई कि पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) के राज्य के कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि ने इस्तीफ़ा दे दिया है तो महागठबंधन के खेमे में हलचल मच गई। 

पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि, जो प्रख्यात समाजसेवी जगदेव प्रसाद के पुत्र हैं, को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा करने के कारण तीन दिनों के अंदर कारण बताओ नोटिस का जवाब भेजने का फरमान उपेंद्र कुशवाहा ने जारी कर दिया था। उसका जवाब नागमणि के इस्तीफ़े के रूप में सामने आया।

बता दें कि नागमणि की पत्नी सुचित्रा सिन्हा नीतीश कुमार के प्रथम कार्यकाल (2005-10) के दौरान मंत्री रह चुकी हैं। खुद नागमणि अटल बिहारी बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में मंत्री रह चुके हैं। 
नागमणि ने महागठबंधन के शीर्ष नेताओं से कुशवाहा की पार्टी को सिर्फ़ एक सीट देने की सलाह तक दे दी और यहाँ तक कह दिया कि वरना कुशवाहा पैसे लेकर सभी सीट बेच देंगे। कुशवाहा और नीतीश की राजनीतिक दुश्मनी जगजाहिर है।

आरएलएसपी ने किया पलटवार 

नागमणि के आरोप के बाद आरएलएसपी ने पलटवार किया है। आरएलएसपी के महासचिव सत्यानंद दांगी ने नागमणि के आरोप को बेबुनियाद और मनगढ़ंत बताया है। आरएलएसपी नेता ने ख़ुलासा किया कि नागमणि ख़ुद के साथ-साथ अपनी पत्नी के लिए भी टिकट माँग रहे थे, लेकिन पार्टी सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा के इनकार के बाद नागमणि ने रंग बदलना शुरू कर दिया। 

दानिश, पटेल ने छोड़ा माँझी का साथ

दो दिन पूर्व बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माँझी की पार्टी हम को भी एक क़रारा झटका तब लगा जब पूर्व शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल ने इस्तीफ़ा दे दिया। पार्टी के प्रवक्ता दानिश रिज़वान ने भी पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया है। हालाँकि अभी वृषिण पटेल ने कोई पार्टी ज्वाइन नहीं की है, लेकिन वह जेडीयू का दामन थाम सकते हैं, इसकी चर्चा जोरों पर है। 

नागमणि और वृषिण पटेल का लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अपनी-अपनी पार्टी से अलग होना महागठबंधन के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता है।

क्यों बेचैन हैं रघुवंश और जगदानंद?

आरएलएसपी और हम जहाँ अंतर्विरोध से जूझ रहे हैं तो वहीं लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के दो दिग्गज नेताओं - पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह और पूर्व सांसद जगदानंद सिंह ख़ुद को असहज महसूस कर रहे हैं। दोनों नेताओं को केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार की ओर से सवर्ण ग़रीबों को दिए गए 10 प्रतिशत आरक्षण ने बेचैन कर रखा है। ये दोनों नेता सवर्ण हैं। आरजेडी ने केंद्र के इस फ़ैसले का विरोध किया है तथा इसे केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा ग़रीब- ग़ुरबों का हक़ छीनने का प्रयास बताया है।

जेडीयू में लाने में जुटे प्रशांत किशोर

रघुवंश और जगदानंद को सवर्ण वोटरों का डर सता रहा है और उन्हें चुनाव में उनके गुस्से का कोपभाजन बनने की आशंका है। फलतः रघुवंश प्रसाद सिंह और जगदानंद सिंह, जो राजपूत बहुल क्षेत्र से चुनाव लड़ते आए हैं, उन्हें सवर्णों का वोट नहीं मिलने का डर है। उनके इसी डर को भुनाने के लिए जेडीयू के रणनीतिकार और उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है। वे राजद के इन नेताओं को नफ़ा-नुक़सान का ब्यौरा देने के साथ ही उनपर डोरे डालने में पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा सवर्ण आरक्षण का फ़ैसला एक सशक्त चुनावी मुद्दा बन सकता है। बिहार, पूर्व में वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल कमीशन लागू किए जाने का दंश झेल चुका है।
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