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आख़िर क्यों उठ रहे हैं चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल?

चुनाव आचार संहिता लागू है और यह चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने काम के मुताबिक़, निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराए। लेकिन विपक्षी दल कुछ मामलों को लेकर आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। आख़िर विपक्षी दल ऐसा क्यों कह रहे हैं, यह जानना ज़रूरी है। 
पहले मामले में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ को लेकर ख़ासा विवाद हो रहा है। पहले ख़बर आई थी कि यह फ़िल्‍म 5 अप्रैल को रिलीज़ होगी लेकिन फ़िलहाल इसकी रिलीज़ टाल दी गई है। कांग्रेस चुनाव के मौक़े पर फ़िल्म के रिलीज़ होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट चली गई है, कोर्ट ने 8 अप्रैल को इस मामले में सुनवाई करने के लिए कहा है। 
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ग़ौरतलब है कि बायोपिक ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ को लोकसभा चुनाव के मौक़े पर रिलीज़ करने को लेकर कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने कड़ी आपत्‍त‍ि जताई थी। लेकिन चुनाव आयोग ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना था। इसे लेकर भी सवाल उठे थे। 

किताब पर क्यों लगाई रोक? 

इसी तरह एक अन्य मामले में चुनाव आयोग ने रफ़ाल डील से जुड़ी एक किताब को रिलीज़ किये जाने पर रोक लगा दी थी। किताब को प्रकाशित करने वाले भारती प्रकाशन के संपादक पीके राजन ने इस पर ख़ासी नाराज़गी जताते हुए चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाया था। इस किताब का विमोचन वरिष्ठ पत्रकार और ‘द हिंदू’ अख़बार समूह के प्रमुख एन. राम के द्वारा किया जाना था लेकिन उससे पहले ही चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगा दी थी। बता दें कि एन. राम ख़ुद इस सौदे पर कई रिपोर्ट लिख चुके हैं। मंगलवार 2 अप्रैल को जब किताब रिलीज़ होने वाली थी तो चुनाव आयोग ने पुलिस बल के साथ जाकर किताब की प्रतियों को जब्त कर लिया था। क्या आयोग की इस कार्रवाई से उसके निष्पक्ष होने के दावे पर सवाल नहीं खड़े होते हैं?

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भारती प्रकाशन के संपादक पीके राजन ने चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह पता नहीं कि आख़िर किताब पर बैन क्यों लगाया गया है? हमने चुनाव पर कई किताबें प्रकाशित की हैं। आज अचानक चुनाव आयोग और सरकार को क्या आपत्ति आ गई? उन्होंने कहा था कि हालात यह हैं कि हम यह किताब अपनी दुकान पर भी नहीं बेच सकते हैं। 
राजन ने कहा कि उनकी किताब के रिलीज होने से आचार संहिता का उल्लंघन नहीं होता है। उन्होंने कहा कि हम अदालत जाएँगे और किताब को रिलीज़ करवा कर रहेंगे।

‘नमो टीवी’ को लेकर शिकायत

एक अन्य मामले में बीजेपी की ओर से लोकसभा चुनाव के मौक़े पर ‘नमो टीवी’ को लाँच किए जाने को लेकर भी विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से शिकायत की है। विपक्षी दलों ने कहा है कि चुनाव आचार संहिता लागू है, ऐसे में ऐसे में आयोग को ‘नमो टीवी’ पर रोक लगानी चाहिए। इस पर चुनाव आयोग ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से ‘नमो टीवी’ को लाँच करने को लेकर रिपोर्ट माँगी है। ग़ौरतलब है कि ‘नमो टीवी’ के मालिकाना हक़ को लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है। 

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‘नमो टीवी’ पर प्रधानमंत्री मोदी का लोगो लगा है और लगातार उनके भाषण तथा बीजेपी के चुनावी कार्यक्रम इस पर दिखाए जा रहे हैं। इससे सवाल यह खड़ा होता है कि क्या बीजेपी खुले तौर पर नमो टीवी को प्रमोट कर रही है? और अगर ऐसा है तो चुनाव आयोग इस पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करता। 
ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने 31 मार्च को ट्वीट करके ‘नमो टीवी’ के बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था कि लोग ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान का ‘नमो टीवी’ पर लाइव प्रसारण देख सकते हैं।
'मिशन शक्ति’ पर प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन को लेकर भी कई विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे लेकिन तब भी चुनाव आयोग को इसमें कुछ ‘ग़लत’ नहीं लगा था और आयोग ने प्रधानमंत्री को क्लीन चिट दे दी थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के बारे में कहा था कि कांग्रेस के नेता ऐसी सीट से चुनाव लड़ने से डर रहे हैं, जहाँ हिंदू अधिक संख्या में हैं और वे ऐसी सीटों से चुनाव लड़ने जा रहे हैं, जहाँ अल्पसंख्यक मतदाता अधिक हैं। नियमों के मुताबिक़, कोई भी नेता जातीय, धार्मिक, सांप्रदायिक आधार पर वोट नहीं माँग सकता लेकिन प्रधानमंत्री के बयान से ऐसा लगता है कि उनका बयान नियमों के विपरीत है। 
लोकसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा को लेकर भी कई दलों ने चुनाव आयोग से सवाल पूछे थे। विपक्षी दलों ने कहा था कि क्या चुनाव आयोग चुनाव की तारीख़ों के एलान के लिए प्रधानमंत्री के आधिकारिक कार्यक्रम ख़त्म होने का इंतजार कर रहा है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में चुनाव कराने वाली संस्था चुनाव आयोग पर सभी दलों का भरोसा बना रहे, इसके लिए आयोग को उसे मिलने वाली शिकायतों पर कार्रवाई करनी चाहिए और उसकी निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सभी सवालों का उचित कार्रवाई कर जवाब देना चाहिए। 

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