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पूरे नहीं हुए पिछले लोकसभा चुनाव के मोदी के वायदे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 का चुनाव नयी उम्मीदों के रथ पर सवार होकर जीता था। कितने वादे पूरे हुए? कश्मीर से धारा 370 हटाने का मामला हो या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा। चर्चा खूब होती रही लेकिन स्थिति अभी भी 2014 जैसी बनी हुई है। 2014 के चुनावों के पहले वाले मोदी 2019 में हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रवक्ता बन कर सामने आ रहे हैं।
शैलेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 का चुनाव नयी उम्मीदों के रथ पर सवार होकर जीता था। अब पाँच साल बाद उन उम्मीदों, सपनों और वादों की जाँच-पड़ताल जारी है। 2014 के चुनाव में मोदी एक महानायक के रूप में उभरे क्योंकि उन्होंने अपने भाषणों में उन सभी मुद्दों को समेटा जो उस समय जन मानस को झकझोर रहा था।
मोदी के उदय को अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से अलग करके नहीं देखा जा सकता था। दरअसल अन्ना हजारे के आंदोलन ने देश भर में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ व्यापक माहौल तैयार कर दिया था। इसलिए जब मोदी ‘ न खाऊँगा न खाने दूँगा’ के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरे तो लोगों को लगने लगा कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक महायोद्धा का अवतार हो चुका है। लेकिन अपने पाँच सालों के शासन में मोदी ने भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए कोई ठोस उपाय किया हो ऐसा नहीं लगता।
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टू जी को भूले मोदी!

अन्ना आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण माँग थी लोकपाल की नियुक्ति। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पिछले मार्च में लोकपाल की नियुक्ति हो पाई। अभी काम शुरू होने में काफ़ी वक़्त लगेगा। मोबाइल फ़ोन के लिए सेकंड जेनरेशन यानी टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल का सबसे बड़ा घोटाला माना गया। लोकसभा के पिछले चुनाव में बीजेपी और मोदी ने उसे खूब भुनाया। लेकिन सरकार बनने के बाद इस मुद्दे को भुला दिया गया। सरकार विशेष अदालत के सामने कोई सबूत लेकर नहीं गई और आजिज़ आकर जज ने मामलों को बंद कर दिया। मनमोहन सरकार के जिन मंत्रियों को जेल जाना पड़ा था वे अब आरोप से बरी हो चुके हैं।
लोकसभा के पिछले चुनाव में काला धन एक प्रमुख मुद्दा था। मोदी ने एक सभा में यहाँ तक कह दिया कि अगर विदेशों में जमा काला धन देश में आ गया तो देश वासियों को 15 लाख रुपये मिल जाएँगे। पिछले पाँच सालों में मोदी सरकार विदेशों से काला धन लाने में पूरी तरह असफल रही है। बाद में चलकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि यह सिर्फ़ जुमला था। यानी किसी के खाते में 15 लाख रुपये जाने नहीं थे।
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फ़्लॉप नोटबंदी

अब जब विदेशों से काला धन आया ही नहीं तो किसी को मिलता कहाँ से? प्रधानमंत्री मोदी के प्रखर  समर्थक बाबा रामदेव 2014 से चुनावों से पहले काला धन ख़त्म करने के लिए एक हज़ार और पाँच सौ रुपये के नोटों को बंद कराने की माँग कर रहे थे।
प्रधानमंत्री बनने का बाद मोदी ने नोटबंदी तो की लेकिन पाँच सौ के नोटों का सिर्फ़ चेहरा बदला और एक हज़ार रुपये के नोटों को ख़त्म करके दो हज़ार रुपये का नोट शुरू कर दिया।
नोटबंदी की घोषणा करते समय मोदी ने दावा किया कि इससे देश में छिपा काला धन बाहर आ जाएगा। पुराने नोट बंद होने के बाद बैंकों तक काला धन का एक बड़ा हिस्सा आ तो गया लेकिन नये नोटों के रूप में बाहर चला गया। यानी कुल मिलाकर काला धन अपनी जगह पर क़ायम रहा। नोटबंदी के बाद ख़बरें आईं कि कई सहकारी और समान्य बैंकों में रातो-रात पैसा आया और फिर बाहर भी हो गया। लाइन में खड़े होकर नोट बदलने की परेशानी झेलने वाले आम आदमी के हिस्से में कुछ खास नहीं आया।

2 करोड़ रोज़गार याद है न!

तीसरा बड़ा मुद्दा था रोज़गार। मोदी ने घोषणा की थी कि हर साल 2 करोड़ लोगों को रोज़गार दिया जाएगा, वर्तमान स्थिति उससे अलग दिखाई दे रही है। भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक लघु और अत्यंत छोटे उद्योगों में पिछले चार सालों के दौरान सिर्फ़ 3 लाख नौकरियाँ ही मिलीं।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ 2017-2018 के मुक़ाबले 2018-2019 में क़रीब 7 प्रतिशत बेरोज़गारी बढ़ी है।
यह अलग बात है कि सरकार दावा कर रही है कि मुद्रा लोन स्कीम के अंतर्गत 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने स्वरोज़गार शुरू किया। मोदी सरकार ने मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया जैसी अनेक योजनाएँ शुरू की लेकिन उसका व्यापक फ़ायदा कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। एक टीवी इंटरव्यू में मोदी ने कहा कि पकौड़ा बेचना भी एक रोज़गार है। ठीक बात है। छोटे-मोटे रोज़गार भी लोगों को मिलने लगें तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। ऐसा लग नहीं रहा है कि स्वरोज़गार बढ़ गया है। हाँ मुद्रा लोन के नाम पर 5-5 लाख रुपये का कर्ज़ बाँटकर सरकार ज़रूर ख़ुश हो रही है। प्रोविडेंट फ़ंड के आँकड़ों पर ग़ौर करें तो संगठित और बड़े क्षेत्रों में 4 सालों में क़रीब 22 लाख नौकरियाँ ही बाँटी। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुताबिक़ पिछले पाँच सालों में 5 करोड़ नौकरियाँ कम हो गई हैं।

महँगाई पर बीजेपी भी घिरी 

2014 के चुनावों से पहले महँगाई के मुद्दे पर बीजेपी और मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार की जमकर घेराबंदी की। ख़ुद मोदी और बीजेपी के नेताओं ने मनमोहन सरकार के समय पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत को मुद्दा बनाया। मनमोहन सरकार के समय कच्चे तेल की क़ीमत आसमान छू रही थी।
मोदी के आने के बाद कच्चे तेल की क़ीमत ज़बरदस्त रूप से गिरी। उसके बवाजूद पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत लगभग मनमोहन सरकार के दौर जैसी बनी रही।
जिसका बचाव करने के लिए बीजेपी के प्रचार तंत्र ने यहाँ तक कहना शुरू कर दिया कि देश की बड़ी-बड़ी योजनाओं को चलाने के लिए पेट्रोल और डीज़ल की कीमत कुछ ज़्यादा भी है तो क्या हुआ? पिछले पाँच सालों में आटा, दाल, चावल और बाकी सभी ज़रूरी चीजों की कीमत बढ़ चुकी है पर अब उसपर सवाल नहीं उठाया जाएगा।

किसानों के लिए घड़ियाली आँसू

पिछले चुनावों के समय किसान और खेती की लागत को लेकर खूब रोना रोया गया। मोदी ने वादा किया कि किसानों को लागत का पचास फ़ीसदी ज़्यादा मूल्य दिलवाया जाएगा। मोदी सरकार ने अनाज की सरकारी ख़रीद मूल्य बढ़ा कर यह साबित करने की कोशिश भी की कि किसानों की माँग पूरी कर दी गई है। लेकिन वास्तव में सरकारी ख़रीद मूल्य बढ़ाने से आम किसानों को कोई बड़ा फ़ायदा नहीं मिला।

सरकार किसानों से कुल उपज का 15 फ़ीसदी से भी कम ख़रीद रही है। बाकी को किसान मंडियों में बेचने को मजबूर है जिसकी क़ीमत अनाज व्यापारी तय करते हैं। यानी आज भी किसान एक से दो रुपये किलो के भाव से आलू बेचता है और आम उपभोक्ता को वही आलू 15 से 20 रुपये किलो मिलता है। मोदी सरकार ऐसा कोई तंत्र नहीं ला पा रही जिससे छोटा और आम किसान आढ़त के चंगुल से निकले और उसे बेहतर क़ीमत मिले।
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भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कार्रवाई

बैंकों के ज़रिए देश के लाखों करोड़ों का चूना लगाने वालों पर अब भी लगाम नहीं है। देश के बैंक का क़रीब 14 हज़ार करोड़ रुपया हड़प लेने वाला नीरव मोदी एक अख़बार की सक्रियता के बाद गिरफ़्तार हो गया लेकिन भारत लाने और कार्रवाई करने में काफ़ी समय लगेगा। विजय माल्या को भारत वापस लाने की कार्रवाई ब्रिटेन की अदालत में फँसी हुई है। बड़े भ्रष्टाचार या राष्ट्रीय संपत्ति की लूट पर कारगर नियंत्रण मोदी सरकार भी नहीं लगा पाई जो पिछले चुनाव का एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। इसके साथ ही मोदी सरकार पर रफ़ाल विमान ख़रीद घोटाले की काली छाया भी घूम रही है।

मोदी हिंदू राष्ट्रवाद के प्रवक्ता

पिछले चुनाव से पहले वादा यह भी था कि देश में 100 स्मार्ट शहर बनेंगे। मोदी सरकार ने नई दिल्ली जैसे इलाके को स्मार्ट सिटी का हिस्सा घोषित करके अपनी ज़िम्मेदारी से इतिश्री कर ली। महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33% आरक्षण का विधेयक राज्य सभा ने 2014 में ही पास कर दिया था। चुनावी वादे के बावजूद मोदी सरकार लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक नहीं लाई। कश्मीर से धारा 370 हटाने का मामला हो या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा। चर्चा खूब होती रही लेकिन स्थिति अभी भी 2014 जैसी बनी हुई है। 2014 के चुनावों के पहले वाले मोदी 2019 में हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रवक्ता बन कर सामने आ रहे हैं।
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