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सिंधिया को किनारे लगाने की कोशिश में बीजेपी?

मध्य प्रदेश में 28 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव का प्रचार पूरे शबाब पर है। लेकिन इस उपचुनाव की नौबत जिस जुगल जोड़ी के कारण आयी है, वह बिखरती दिख रही है।
जोश-ओ-खरोश के साथ शुरू हुई 'शिवराज-महाराज एक्सप्रेस' आधे रास्ते में पटरी से उतर गई है। बीजेपी और उसके नेताओं को चुनाव अभियान में ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा बार- बार ख़ुद को 'महाराजा सिंधिया' कह कर असल चेहरा बनाने की कोशिश नागवार गुजरी है।
सिंधिया को लेकर मुखर जन- विरोध से भी बीजेपी हैरान है। यही वजह है कि इस उपचुनाव में पार्टी और दिग्गजों ने सिंधिया से किनारा कर लिया है।
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इस उपचुनाव की नौबत कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के दलबदल से आई है। मार्च में सिंधिया अपने साथ दो दर्ज़न विधायकों को साथ लेकर बीजेपी में शामिल हो गये थे और कमलनाथ की सरकार गिर गयी थी। 
दलबदल के बाद हो रहे उपचुनाव के लिये दीनदयाल परिसर भोपाल से शिवराज-सिंधिया एक्सप्रेस गाजे-बाजे के साथ रवाना हुई, लेकिन अब यह सियासी ट्रेन पटरी से उतरती लग रही है।

सिंधिया के ख़िलाफ़ नारे

शिवराज सिंह और उनकी पार्टी को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब चुनाव की घोषणा से पहले शिवराज और सिंधिया एक साथ ग्वालियर आये। यह दोनों का पहला संयुक्त दौरा था।
पार्टी महा सदस्यता अभियान में आये सिंधिया को अपनी पूर्व पार्टी और जनता का ज़बरदस्त विरोध झेलना पड़ा। उन्हें काले झंडे दिखाये गए और 'गद्दार आया, गद्दार आया' जैसे नारे भी लगे।
यही हाल ग्वालियर-चंबल के दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में भी हुआ। सिंधिया के भारी विरोध को देख कर पार्टी चौकन्ना हो गयी।

सिंधिया को झटका

पार्टी ने भारी विरोध के कारण होने वाले नुक़सान से बचने की रणनीति अपनाई और पहली फुर्सत में ही हाईटेक चुनाव रथों पर सिंधिया की फोटो नहीं लगाई। ये रथ पूरे 28 क्षेत्रों में घूम रहे हैं। 
स्टार प्रचारकों की सूची में सिंधिया का नाम दसवें क्रम पर रख कर उन्हें इशारों- इशारों में उनकी जगह बता दी गई। रथों पर फोटो न होने और स्टार प्रचारकों में इतना नीचे नाम होने पर सिंधिया कोप भवन में चले गए और 5 दिन चुनाव प्रचार से दूर रहे।

महाराजा?

चुनाव के औपचारिक एलान के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हर सभा में ख़ुद को आगे रख कर बोलना शुरू कर दिया। मुरैना में कार्यकर्ता सम्मेलन में एक कार्यकर्ता से बोले कि 'तुम्हारे सामने ख़ुद महाराज खड़े हैं, खुल कर बोलो।'
भांडेर में चुनाव सभा के बाद कार्यकर्ताओं से कह दिया कि 'यह चुनाव रक्षा का नहीं है। गाँव गाँव जाकर बता दो कि यह चुनाव महाराजा सिंधिया का है।' रक्षा वहां से बीजेपी प्रत्याशी हैं।
मंत्री महेंद्र सिसौदिया के लिये एक चुनावी में सभा में सिंधिया ने कहा कि 'ये चुनाव बीजेपी-कांग्रेस का नहीं है। ये चुनाव मेरा है। पूरा देश देख रहा है कि ग्वालियर-चम्बल में सिंधिया परिवार का झंडा बुलंद होगा कि नहीं! '
सिंधिया के इन बयानों से शिवराज के साथ साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर, वी. डी. शर्मा, प्रभात झा, जयभान सिंह पवैया असहज हो रहे हैं।

बीजेपी से दूरी?

सिंधिया के बयानों के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने एक इंटरव्यू में साफ- साफ कह दिया कि सिंधिया को चीनी की तरह चाय में घुलने में समय लगेगा। अभी तो वे पार्टी की परम्परायें और रीति-नीति को समझ रहे हैं। सिंधिया को बीजेपी में आये आठ महीने हो चले हैं।
पूर्व सांसद प्रभात झा ने भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कह दिया कि मुझसे सिंधिया के बारे में कोई सवाल न करें। प्रभात झा सिंधिया के मुखर विरोधी रहे हैं और उनके ज़मीन घोटाले उठाते रहे हैं। किसी दौर में झा ने ऐलान किया था कि वे हर दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सिंधिया के एक ज़मीन घोटाले का पर्दाफ़ाश करेंगे। अब सिंधिया के बीजेपी में आ जाने से वह भी बहुत असहज हैं।

बीजेपी नेताओं को दिक्क़त

पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया भी सिंधिया को लेकर बहुत अनमने हैं। पवैया की पूरी राजनीति जयविलास प्रसाद और सामंतवाद के विरोध पर आधारित रही है। अपनी इसी राजतंत्र विरोधी शैली के कारण ही वे किसी दौर में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया को कड़ी चुनौती देने में कामयाब रहे थे। 
माधवराव ने इस चुनौती के बाद ही ग्वालियर छोड़ कर गुना-शिवपुरी संसदीय सीट का रुख किया था। अब अपनी ही पार्टी के मंच पर सिंधिया के बार- बार ख़ुद को महाराजा कहने से पवैया बेचैन हैं। वह संघ में भी ऊपर तक पहुँच रखते हैं, सो अपनी बेचैनी नागपुर तक पहुँचा चुके हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर शिवराजसिंह और पार्टी के बदले हुये रवैया के कारण पिछले 10 दिन से कोई बड़ा नेता उनके साथ मंच साझा नहीं कर रहा। सिंधिया अकेले ही चुनाव अभियान में लगे हैं।

किनारे किए जाएंगे सिंधिया के लोग

हैरानी की बात यह है कि हफ़्ते भर से ग्वालियर चंबल में ही शिवराज सिंह की हर दिन दो-तीन सभाएं हो रहीं हैं, लेकिन एक में भी सिंधिया उनके साथ नहीं रहे हैं। सियासी गलियारों में ख़बर गर्म है कि सिंधिया के भविष्य में बढ़ने वाले दख़ल से मुक्त रहने के लिये बीजेपी नई रणनीति पर काम कर रही है।
रणनीति के तहत सिंधिया समर्थक मंत्रियों को मंझधार में छोड़ने पर काम चल रहा है। पार्टी का एक खेमा चाहता है कि सरकार बनाने के लिये जितना ज़रूरी हैं, सिर्फ़ उतने विधायक जीत जाएं तो सिंधिया के दवाब से मुक्ति मिल जाएगी।
यही वजह हैं कि शिवराज और पार्टी सिंधिया से खिंचे खिंचे लग रहे हैं। यहां तक कि दोनों नेता एक दूसरे का नाम भी सिर्फ़ रस्म अदायगी के लिये ले रहे हैं।
देखना होगा कि चुनाव के बाक़ी बचे दिनों में शिवराज-सिंधिया एक्सप्रेस दोनों इंजनों के साथ कितने स्टेशनों पर पहुंचती है? फ़िलहाल दोनों इंजन अलग अलग पटरी पर दौड़ते दिख रहे हैं।
(डा० राकेश पाठक के फ़ेसबुक पेज से साभार)

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