एमपी लोकायुक्त संगठन में 'दैनिक भास्कर' के एक स्टिंग ऑपरेशन में रिश्वतखोरी का बड़ा मामला सामने आया है। डीएसपी और स्टाफ कैमरे में कैद हुए हैं।
भ्रष्टाचार रोकने एवं भ्रष्टों पर कार्रवाई करने के लिए 44 साल पहले गठित मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन पर गहरा काला दाग लगा है! संगठन के पुलिस विंग के कर्मी एवं अन्य स्टाफ, स्टिंग ऑपरेशन में रिश्वतखोरी के आरोप में कैमरों में कैद हुए हैं। फिलहाल दो हेड कांस्टेबल सहित तीन छुटभैये सस्पेंड किए गए हैं। बेहद संगीन इस मसले पर राज्य की सरकार ने मौन साध लिया है।
दरअसल, दैनिक भास्कर के डिजीटल विंग ने एक बड़ा स्टिंग ऑपरेशन किया है। कथित रिश्तेदारों के ‘ट्रैप’ मामलों के ‘सेटलमेंट’ के लिए रिपोर्टर ने जाल बिछाया। इस जाल में करप्ट पुलिस वाले और स्टाफ फंस गया। पूरे गोरखधंधे में लिप्त आरक्षक से लेकर डीएसपी स्तर तक के अधिकारियों में ‘पैठ’ बनाकर रिपोर्टर ने पहले ‘सौदे’ किए और फिर पूरी ‘धंधेबाजी’ को अपने कैमरे में कैद कर लिया।
स्टिंग ऑपरेशन में एक महिला डीएसपी मंजू सिंह एवं अन्य डीएसपी बीएम द्विवेदी, हेड कांस्टेबल रामदास कुर्मी, यशवंत सिंह एवं बृज बिहारी पांडेय, डीएसपी मंजू सिंह का रीडर एवं कांस्टेबल गौरव साहू और लोकायुक्त, जस्टिस सत्येन्द्र कुमार सिंह का ड्राइवर अमित विश्वकर्मा रिश्वत की बातचीत करते हुए कैमरों में कैद हुए हैं। वाइस रिकार्डिंग भी, इनमें कई की हुई है।
लोकायुक्त ट्रैप के मामलों को कैसे सेटल कर सकते हैं, वॉयस सैंपल कैसे मैनेज हो सकते हैं, केस में खत्मा कैसे लग सकता है, कोर्ट में केस को कैसे लटका सकते हैं एवं कैसे देरी की जा सकती है, सहित अन्य पहलुओं पर आरोपी, न केवल बिन्दास बात करते रहे, बल्कि हर काम के रेट भी उन्होंने बताये। केस सेटल करने के सौदे किए।
केस की ट्रांसक्रिप्ट मिल गई:- संगठन के स्टाफ संग, एक केस के निपटारे के लिए, रिपोर्टर द्वारा 8 लाख रुपये के ‘एक सौदे’ के बाद केस से जुड़ी ट्रांसक्रिप्ट तक रिपोर्टर को मिल गई।
रिपोर्टर जब स्टिंग कर चुका और उसने खुद संबंधितों को फोन नहीं लगाए, तो संगठन के उपरोक्त लोगों में कई के फोन उसके (रिपोर्टर के) पास आये। इस बातचीत को भी रिकॉर्ड किया गया। संकेतों में सौदों को आगे बढ़ाने की बात करता, गोरखधंध में लिप्त लोकायुक्त स्टाफ के कर्मी नजर आये।
हैरत की बात ये है, सनसनीखेज स्टिंग के बाद से अब तक डीजी लोकायुक्त योगेश देशमुख द्वारा 2 हेड कांस्टेबल सहित कुल तीन को संस्पेंड करने की कार्रवाई के साथ इनकी सेवाएं मूल स्थापना को वापस की गई हैं।
दोनों डीएसपी को लोकायुक्त से हटाकर, पुलिस हेडक्वार्टर भेजा गया है और निलंबन प्रस्तावित किया गया है। जबकि चालक अमित विश्वकर्मा और डीएसपी के रीडर बृज बिहारी पांडेय के खिलाफ संबंधितों से एक्शन का आग्रह किया गया है।
मंत्री-अफसरों पर कोई एक्शन नहीं!
बता दें कि वर्ष 1982 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन का गठन किया था। सत्ता के दुरुपयोग, कुप्रशासन और भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई इस संगठन का मुख्य उद्देश्य है। मंत्रियों, विधायकों, प्रशासन और लोक सेवकों के विरुद्ध जनता की शिकायतों के निवारण की जिम्मेदारी संगठन के पास है।
सुप्रीम कोर्ट अथवा हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद पर रहे न्यायमूर्ति को लोकायुक्त बनाये जाने का प्रावधान है। उप लोकायुक्त की पदस्थापना के साथ, करप्शन पर अंकुश एवं भ्रष्टाचार की धरपकड़, जांच एवं आरोपी को सजा दिलाने के लिए स्पेशल पुलिस सेल सहित पूरा सेटअप है।भ्रष्टाचार की शिकायतें निरंतर बढ़ी हैं। करप्शन के तरीके बदले हैं, लेकिन बीते दो से ढाई दशक के बीच लोकायुक्त संगठन, सिंगल डिजीट संख्या वाले अपवादों को छोड़कर, बड़े अफसरों और बड़े भ्रष्टाचार मामलों में कार्रवाई करता नजर नहीं आया है। मंत्रियों के खिलाफ कोई केस उपरोक्त अवधि में नहीं दिखाई पड़ा है।
केस की जांच पूर्ण होने के बाद ‘बड़े लोगों’ (मंत्री-अफसरों) के खिलाफ मुकदमे चलाने की अनुमति देने के मामले भी बरसों-बरस से पेंडिंग हैं।
कांग्रेस सरकारों के दौर में लोकायुक्त का वार्षिक प्रतिवेदन मध्य प्रदेश विधानसभा के पटल पर नियमित रखा जाता था। प्रतिवेदनों पर बाकायदा चर्चा होती थी। साल 2003 में निजाम बदला, भाजपा की सरकार आयी। भाजपा के सत्ता में आने के बाद धीरे-धीरे ये व्यवस्था (वार्षिक प्रतिवेदनों की प्रस्तुति एवं चर्चा का सिलसिला) बंद होता चला गया। बीते डेढ़ दशक से प्रतिवेदनों की विधानसभा में प्रस्तुति और चर्चा का सिलसिला समाप्त हो चुका है।
संगठन को बंद कर देना चाहिए: दीक्षित
सीनियर जर्नलिस्ट अरुण दीक्षित ने दैनिक भास्कर के स्टिंग मसले और व्यवस्थागत खामियों को लेकर ‘सत्य हिन्दी’ से कहा, ‘लोकायुक्त संगठन की उपयोगिता नहीं रह गई है, बिना देर किए इस संगठन को बंद कर देना चाहिए।’ वे कहते हैं, ‘संगठन अपने मूल उद्देश्यों से न केवल भटक चुका है, बल्कि रिश्वतखोरी का बड़ा अड्डा बन चुका है। कई उदाहरण भी उन्होंने गिनाये।’
दीक्षित ने कहा, ‘केवल लोकायुक्त संगठन भर नहीं, मध्य प्रदेश राज्य आपराधिक अन्वेषण ब्यूरो की भी प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। सरकार इसके लिए जिम्मेदार है। दोनों ही संगठन, सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाले संगठनों ने किस बड़े आदमी को पकड़ा है, बताइये?’
एक केस में, मध्य प्रदेश के लोकायुक्त से दो-दो हाथ कर चुकने वाले, मध्य प्रदेश राज्य विधानसभा के रिटायर्ड प्रमुख सचिव भगवानदेव ईसरानी की प्रतिक्रिया भिन्न है। वे फरमा रहे हैं, ‘लोकायुक्त संगठन या आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को बंद किया गया, तो हालात बद से बदतर हो जायेंगे।’ईसरानी का कहना है, ‘सरकार ईमानदारी से इन संगठनों का उपयोग करे, पारदर्शिता बरते, अधिकारों के उपयोग में बाधा नहीं बने तो दोनों ही संगठन, अच्छा काम कर सकते हैं। करप्शन पर कुछ अंकुश लग सकता है।’
ईसरानी का यह भी कहना है, ‘लोकायुक्त ही नहीं अन्य उन महत्वपूर्ण संगठनों के प्रतिवेदनों को हर साल विधानसभा के पटल पर रखने एवं पहले की तरह चर्चा कराये जाने की अत्यधिक जरूरत है।’
सीबीआई गठजोड़ पकड़ा गया
मध्य प्रदेश में केवल लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू भर में नहीं, मध्य प्रदेश के मैदानी पुलिस अमले एवं स्पेशल शाखाओं में पदस्थ पुलिस वालों की रिश्वतखोरी मामलों में संलिप्तता के चौंकाने वाले केस लगातार सामने आ रहे हैं।मध्य प्रदेश के बहुचर्चित एवं नेशनल मीडिया की सुर्खी बने, नर्सिंग घोटाले की जांच के लिए बने सीबीआई दल के अफसर, बीते साल मध्य प्रदेश में रिश्वत लेते पकड़े गए थे। जेल जाना पड़ा था।
इनकम टैक्स के अफसरों को भी मध्य प्रदेश में ‘सौदेबाजी-रिश्वतखोरी’ के आरोपों में पकड़ा गया है। ऐसे मामलों में पकड़ी गई एजेंसियों एवं शामिल पाए गए अदने से आला कर्मियों की फेहरिस्त, खासी लंबी है।