महाराष्ट्र में नवरात्रि और गरबा आयोजनों में मुस्लिमों पर प्रतिबंध लगाने की वीएचपी और बीजेपी नेता नीतेश राणे की मांग के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता फडणवीस ने इन आयोजनों में सभी समुदायों की भागीदारी का समर्थन किया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी और सामाजिक कार्यकर्ता अमृता फडणवीस ने साफ़ कहा है कि गरबा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति शांतिपूर्वक गरबा में शामिल होकर त्योहार का आनंद लेना चाहता है तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

अमृता फडणवीस का यह बयान तब आया है जब बीजेपी नेता और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे ने विश्व हिंदू परिषद की उस मांग का समर्थन किया है, जिसमें नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया आयोजनों में मुस्लिमों की भागीदारी पर रोक लगाने या उनकी पहचान की जांच करने की बात कही गई है। इस मुद्दे पर अब संघ परिवार के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आने लगी है। आरएसएस से जुड़े लेखक रतन शारदा ने कहा है कि अमृता को इस मामले में नहीं पड़ना चाहिए और उन्हें दूर रहना चाहिए। जबकि अमेरिका, कनाडा और यूके की यात्रा के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया था।
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अमृता फडणवीस ने क्या कहा?

चंद्रपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमृता फडणवीस ने कहा कि गरबा केवल किसी एक समाज का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा सांस्कृतिक उत्सव है जिसे देश और विदेश में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, शांति और सम्मान के साथ गरबा में शामिल होता है तो उसमें कोई समस्या नहीं है।

हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिमों की भागीदारी पर रोक लगाने की मांग के पीछे जो अन्य तर्क दिए जा रहे हैं, उनका उन्होंने विस्तार से अध्ययन नहीं किया है। इसलिए उन पर फिलहाल कोई टिप्पणी करना सही नहीं होगा।

नियमों का पालन जरूरी

अमृता फडणवीस ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सभी को है, लेकिन सार्वजनिक आयोजनों के दौरान नियमों का पालन भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि त्योहार इस तरह मनाए जाने चाहिए कि आम लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो।

अमृता फडणवीस ने तेज आवाज वाले डीजे को लेकर कहा कि वह पूरी तरह प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन तय ध्वनि सीमा और प्रशासन के नियमों का पालन होना चाहिए।

VHP ने जारी किए थे दिशा-निर्देश

इस विवाद की शुरुआत विश्व हिंदू परिषद द्वारा जारी किए गए कुछ दिशा-निर्देशों से हुई। संगठन ने गरबा और डांडिया आयोजकों से कहा कि कार्यक्रमों में आने वाले लोगों की पहचान सुनिश्चित की जाए। वीएचपी ने कहा था कि प्रतिभागियों के आधार कार्ड की जांच की जाए और उनके माथे पर तिलक लगाया जाए, ताकि उनकी पहचान स्पष्ट हो सके। संगठन का कहना है कि इन उपायों का उद्देश्य धार्मिक आयोजनों की पवित्रता बनाए रखना और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

नितेश राणे ने किया समर्थन

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और बीजेपी नेता नितेश राणे ने वीएचपी की मांग का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि नवरात्रि के दौरान कथित 'लव जिहाद' जैसी घटनाएं बढ़ जाती हैं। उनका तर्क था कि जो लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, उन्हें हिंदू धार्मिक आयोजनों में भाग नहीं लेना चाहिए। राणे ने प्रतिभागियों की पहचान की जांच और अन्य सुरक्षा उपायों को भी सही बताया।

संघ से जुड़े लेखक रतन शारदा क्या बोले?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से जुड़े लेखक रतन शारदा ने भी अमृता फडणवीस के बयान पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अमृता के बयान पर पोस्ट करते हुए कहा है कि 'किसी को भी ऐसे मामलों में नहीं पड़ना चाहिए जिसकी उनको समझ न हो।' उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि गरबा केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह मां दुर्गा की आराधना का धार्मिक आयोजन है। उन्होंने कहा कि जो लोग मां दुर्गा की पूजा करते हैं, वे अपने परिवार के साथ स्वागत योग्य हैं, लेकिन जो मूर्ति पूजा का विरोध करते हैं और देवी के सामने श्रद्धा नहीं रखते, उनके लिए यह आयोजन नहीं है।

अमृता फडणवीस और नितेश राणे के अलग-अलग बयानों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। एक ओर वीएचपी और बीजेपी के कुछ नेता धार्मिक आयोजनों में पहचान की जांच और प्रतिबंध की वकालत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमृता फडणवीस ने त्योहारों को सभी के लिए खुला और समावेशी बताया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नवरात्रि से पहले यह मुद्दा राज्य की राजनीति में और गर्मा सकता है।


इस वर्ष 11 अक्टूबर से नवरात्रि का पर्व शुरू होगा। हर साल महाराष्ट्र और गुजरात समेत देश के कई हिस्सों में गरबा और डांडिया के बड़े आयोजन होते हैं, जिनमें हजारों लोग हिस्सा लेते हैं। इस बार त्योहार शुरू होने से पहले ही मुस्लिमों की भागीदारी, पहचान जांच और धार्मिक आयोजनों की प्रकृति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। इस पर भी बहस तेज हो गई है कि विदेश यात्रा पर दिया गया मोहन भागवत का सर्वधर्म समभाव वाला संदेश क्या हवा में उड़ गया!