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भीमा कोरेगाँव : सालगिरह मनाने पर अड़ी भीम आर्मी

1 जनवरी 2018 का वह दिन तो आपको याद ही होगा, जब पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी। इस हिंसा में कई घरों और गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया था। इस भयावह मंज़र में एक शख़्स को अपनी जान गँवानी पड़ी थी। अब एक बार फिर से भीमा कोरेगाँव में ऐसी विकट स्थिति पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। दरअसल, भीम आर्मी 30 दिसंबर को भीमा कोरेगाँव युद्ध की 201वीं सालगिरह मनाने जा रही है। इस दिन भीम आर्मी की ओर से पुणे में एक बड़े प्रोग्राम का आयोजन किया जा रहा है। इस दौरान भीम आर्मी के नेता और संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद सभा को संबोधित करेंगे। 

भीम आर्मी की चेतावनी

भीमा कोरेगाँव युद्ध की 201वीं सालगिरह के प्रोग्राम को लेकर भीम आर्मी ने साफ़ तौर पर चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर उन्हें इसके लिए स्थानीय पुलिस इजाज़त नहीं देती है, तो भी वे अपना यह कार्यक्रम निर्धारित तारीख़ और समय पर करेंगे। भीम आर्मी का कहना है कि उन्हें उनके इस गौरव पर्व को मनाने से कोई नहीं रोक सकता। भीम आर्मी की पुणे इकाई के अध्यक्ष के मुताबिक़, वे पिछले एक महीने से इस कार्यक्रम के लिए पुलिस से इजाज़त माँग रहे हैं, लेकिन पुलिस न तो अनुमति दे रही है और न ही इनकार कर रही है। 

अध्यक्ष का कहना है कि उन्होंने पुणे पुलिस के साथ कई बार बैठक कर कार्यक्रम के लिए अनुमति माँगी लेकिन हर कोशिश नाकाम रही। उनका कहना है कि अगर पुलिस इस कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं भी देती है तो भी वे इसका आयोजन करेंगे। भले ही उन्हें क़ानूनी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़े। इस मामले में पुणे पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शिवाजी का कहना है कि अभी तक इस कार्यक्रम के लिए इजाज़त नहीं दी गई है, पुलिस इस पर विचार-विमर्श कर रही है। 

पिछल साल भीमा कोरेगाॅंंव में भड़क उठी हिंसा (फाइल फोटो)

पिछले साल भड़की थी हिंसा

पिछले साल यानी, 31 दिसंबर 2017 को 200वीं सालगिरह का आयोजन किया गया था। इस आयोजन को 'भीमा कोरेगाँव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान' के बैनर तले तमाम संगठनों ने एक साथ आकर भव्य रैली का आयोजन किया था। जिसका नाम यलगार परिषद रखा गया था। ग़ौरतलब है कि इस रैली के दौरान 'लोकतंत्र और संविधान बचाने' की बात कही गई थी। इस रैली में कई नामीगिरामी हस्तियाँ जैसे, प्रकाश आंबेडकर, हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल, गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवानी, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र उमर ख़ालिद शामिल हुए थे। बता दें कि इनके भाषणों के साथ-साथ कबीर कला मंच ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी सबके सामने पेश किया था। 

इसके एक दिन बाद जब भीमा कोरेगाँव में उत्सव मनाया जा रहा था, तो इसी दौरान कोरेगाँव के आस-पास के इलाक़ों में हिंसा भड़क गई थी। हिंसा के शुरुआती दौर में कुछ देर तक पत्थरबाज़ी हुई और बाद में कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। हिंसा में एक शख़्स की मौत हो गई थी। इस मामले में दक्षिणपंथी संस्था समस्त हिंद अघाड़ी के नेता मिलिंग एकबोटे और शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक संभाजी भिड़े के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ की गई। कोरेगाँव हिंसा को लेकर पुणे पुलिस अब भी जाँच कर रही है। इस मामले में दो और एफ़आईआर दर्ज़ की गई थी जिसमें से पहली एफ़आईआर में जिग्नेश मेवानी और उमर ख़ालिद पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा था।

दूसरी एफ़आईआर, यलगार परिषद से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज़ की गई। ग़ौरतलब है कि इस एफ़आईआर के संबंध में इस साल के जून महीने में सुधीर धवले समेत 5 एक्टिविस्ट गिरफ़्तार किए गए। इतना ही नहीं, इस हिंसा में पुणे पुलिस ने गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, अरुण फरेरा और वरनॉन गोन्जाल्विस को गिरफ़्तार किया था। जिसमें से गौतम नवलखा को रिहा कर दिया गया है, बाक़ी लोगों को लेकर फ़िलहाल जाँच-पड़ताल चल रही है। 

दलितों के लिए ख़ास क्यों? 

भीमा कोरेगाँव पेशवाओं के नेतृत्व वाले मराठा साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध के लिए जाना जाता है। बता दें कि मराठा सेना यह युद्ध हार गई थी। कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी को महार रेजीमेंट के सैनिकों की बहादुरी की वजह से जीत हासिल हुई थी। बाद में भीमराव आंबेडकर यहां हर साल आते रहे। ग़ौरतलब है कि यह जगह पेशवाओं पर महारों यानी कि दलितों की जीत के एक स्मारक के तौर पर स्थापित हो गई। इसके बाद हर साल इस दिन उत्सव मनाया जाने लगा।

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