अजित पवार के निधन तुरंत के बाद ही राजनीति क्यों हो रही है? शिवसेना के मुखपत्र सामना ने सुनेत्रा पवार की शपथ में जल्दबाजी पर तीखी टिप्पणी की, वहीं बीजेपी ने शरद पवार पर एनसीपी विलय का मुद्दा उठाने को लेकर हमला बोला।
अजित पवार की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी कि राजनीतिक रोटियाँ सेंकीं जाने लगीं! शिवसेना के मुखपत्र सामना ने जहाँ लिखा कि अजित पवार की चिता की आग ठंडी होने से पहले शपथ चौंकाने वाला है, वहीं बीजेपी ने शरद पवार पर यह कहकर निशाना साधा है कि अजित पवार की अस्थियां विसर्जित होने से पहले ही उन्होंने एनसीपी के दोनों खेमों के विलय का मुद्दा उठा दिया। बीजेपी की यह प्रतिक्रिया तब आई है जब अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी में विलय की बात तेज हो गई है। इसी को लेकर महाराष्ट्र बीजेपी ने शरद पवार की पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा है कि वे बहुत जल्दबाजी में हैं। बीजेपी ने पूछा है कि अजित पवार की अस्थियां विसर्जित होने से पहले ही विलय की चर्चा क्यों उठाई गई? और अगर विलय होता है तो शरद पवार की पार्टी के 'सेक्युलर' एजेंडे का क्या होगा?
28 जनवरी को प्लेन क्रैश में अजित पवार का निधन हो गया। इसके बाद रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि 12 फ़रवरी को दोनों एनसीपी गुटों के विलय का ऐलान होगा। एनसीपी (एसपी) के नेताओं ने कहा कि अजित पवार विलय के पक्ष में थे और दोनों तरफ़ से कई दौर की बातचीत हुई थी।
महाराष्ट्र बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता केशव उपाध्याय ने सोशल मीडिया पर शरद पवार की विश्वसनीयता और उनकी पार्टी की विलय की बेचैनी पर सवाल उठाए गए। उन्होंने लिखा, "शरद पवार बोलते हैं, और उनका 'HMV'- हिज़ मास्टर्स वॉयस- इकोसिस्टम बिना सोचे-समझे उन शब्दों को बिना किसी सवाल या सोच के पूरी सच्चाई मानकर दोहराता है। यह अब कोई अपवाद नहीं रहा; यह एक आम बात हो गई है। अजित पवार के दुर्भाग्यपूर्ण आकस्मिक निधन के बाद पवार गुट ने जो राजनीति शुरू की, उसे देखते हुए असल में शरद पवार की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाए जाने चाहिए थे। इसके बजाय, आलोचना सुनेत्रा पवार और बीजेपी पर की गई। यह राजनीतिक ईमानदारी नहीं है, बल्कि ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश है।'
उपाध्याय ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' को दिए इंटरव्यू में कहा, 'एनसीपी एनडीए और महायुति के साथ है। अगर शरद पवार की पार्टी एनसीपी में शामिल होना चाहती है तो उसे सरकार में शामिल होना पड़ेगा। फिर उनके सेक्युलर एजेंडे का क्या होगा?' उन्होंने आगे कहा,
'शरद पवार की पार्टी इतनी बेचैन क्यों है विलय के लिए? शोक की अवधि ख़त्म होने से पहले और अजित पवार की अस्थियाँ विसर्जित होने से पहले ही विलय की बात क्यों उठाई? इतनी जल्दी क्यों है?' केशव उपाध्याय
महाराष्ट्र बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता
शरद पवार का क्या कहना है?
शरद पवार ने पिछले शनिवार को खुद इस मुद्दे से दूरी बनाई। उन्होंने कहा कि विलय की कई ख़बरें अजित पवार गुट के आंतरिक मामले हैं और उनके गुट से कोई चर्चा नहीं हुई। विलय की बातें चल रही थीं लेकिन अब अनिश्चित लग रही हैं। इसी बीच, अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को शनिवार को महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
उपाध्याय ने कई सवाल उठाए
- दुर्घटना वाले दिन ही विलय की चर्चा शुरू हो गई और शरद पवार ने सहमति जताई। एनसीपी की तरफ से कोई आधिकारिक मांग नहीं थी, फिर इतनी जल्दी क्यों?
- क्या यह पवार गुट की राजनीतिक मजबूरी का संकेत है? क्योंकि अजित पवार एनडीए और महायुति के साथ थे।
- अगर विलय होता है तो शरद पवार का 'सेक्युलर' रुख क्या होगा? मीडिया जिस विचारधारा की तारीफ करता था, उसे अचानक क्यों साइडलाइन किया?
- अगर विलय की बात चल रही थी तो शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने भी केंद्र में यूपीए और राज्य में एमवीए पर क्या असर होगा, यह क्यों नहीं सोचा?
- सबसे बड़ा सवाल- शरद पवार ने परिवार के बुजुर्ग के तौर पर साफ क्यों नहीं कहा कि अभी कोई विलय की चर्चा नहीं होनी चाहिए? उन्हें सुनेत्रा पवार के साथ खड़े होकर कहना चाहिए था कि मैं उनका जो भी फैसला होगा, मानूंगा। शोक की अवधि खत्म होने के बाद राजनीतिक बात करेंगे।
सामना ने की बीजेपी की आलोचना
अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी में चल रहे घटनाक्रम को लेकर शिवसेना यूबीटी ने अपने मुखपत्र ‘सामना' के संपादकीय के माध्यम से बीजेपी पर तीखा हमला बोला है। संपादकीय में इसे महाराष्ट्र की राजनीति का 'बेहद घटिया दौर' करार देते हुए बीजेपी नेतृत्व, विशेषकर अमित शाह और देवेंद्र फडणवीस पर साजिश वाली राजनीति करने का आरोप लगाया गया है।
सामना ने लिखा है कि अजित पवार के मन में अपने चाचा शरद पवार के प्रति सम्मान और आत्मीयता थी, इसी भावना से दोनों राष्ट्रवादी दलों के संभावित विलय की चर्चा और प्रक्रिया शुरू हुई थी। जिला परिषद चुनावों के बाद इस पर अंतिम फैसला होना तय माना जा रहा था, लेकिन उससे पहले ही अजित पवार का आकस्मिक निधन हो गया। संपादकीय ने लिखा है कि अजित पवार के जाने से पवार परिवार ही नहीं, बल्कि पूरी महाराष्ट्र की राजनीति में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है, और इस उलझन को सुलझने न देना ही कई राजनीतिक शक्तियों का स्वार्थ बन गया है।सामना में लिखा गया है कि एनसीपी के विलय या टूट की राजनीति में प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे की भूमिका संदिग्ध है और उन्हें यह विलय स्वीकार नहीं है। इसमें कहा गया है कि यह पूरा घटनाक्रम अमित शाह और देवेंद्र फडणवीस के 'एजेंडे' के तहत आगे बढ़ाया गया है। इसी संदर्भ में संपादकीय में कहा गया है कि महाराष्ट्र अभी अजित पवार के निधन के सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि बीजेपी की राजनीतिक चालों ने राज्य को दूसरा झटका दे दिया। अजित पवार की चिता की आग ठंडी होने से पहले ही शपथ ग्रहण समारोह होना, कई लोगों के लिए असहज और चौंकाने वाला रहा।
बहरहाल, यह पूरा मामला महाराष्ट्र की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर रहा है। अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी के भविष्य पर सबकी नजर है।