2006 के मालेगांव ब्लास्ट मामले में आरोपियों के बरी होने के पीछे क्या कारण रहे? 31 निर्दोष लोगों की मौत का ज़िम्मेदार अब कौन है? और दोषियों को सजा दिलाने की ज़िम्मेदारी किसकी है? क्या ये सारे सवाल एक ही जवाब की तरफ़ इशारा करते हैं?
मालेगांव ब्लास्ट का घटनास्थल
मालेगांव ब्लास्ट के बाक़ी बचे आरोपी भी बरी कर दिए गये। 2006 में मालेगांव ब्लास्ट हुआ, 31 लोग मारे गए और 300 से ज़्यादा घायल हुए थे। और अब 20 साल बाद एक भी आरोपी नहीं है। तो क्या इनकी मौतों के लिए कोई दोषी नहीं? एटीएस और एनआईए जैसी जाँच एजेंसियों को क्या इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए? बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन्हीं दोनों एजेंसियों पर सवाल उठाते हुए बुधवार को आख़िरी चार आरोपियों को भी दोषमुक्त क़रार दे दिया।
तो सवाल है कि आरोपियों को किस आधार पर रिहा किया गया? कोर्ट ने इसका जवाब दिया है। इसने कहा है कि इस केस में दो अलग-अलग जांच एजेंसियों- ATS और NIA ने बिल्कुल उल्टी-सीधी कहानियां बनाई हैं, जो किसी भी तरह से एक साथ नहीं बैठतीं। कोर्ट ने इसे 'डेड एंड' बताया। यानी जिसका कोई नतीजा नहीं निकल सकता है।
पहले क्या हुआ?
8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास और कब्रिस्तान के नजदीक बम फटे थे। इन हमलों में 31 लोग मारे गए और 312 लोग घायल हो गए। यह एक बहुत बड़ा आतंकवादी हमला था, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। शुरू में महाराष्ट्र की एंटी टेररिज्म स्क्वॉड यानी ATS ने 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया। बाद में CBI ने जांच संभाली, लेकिन उसी लाइन पर काम किया। लेकिन इसके बाद जाँच पूरी तरह बदल गई।
2011 में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी NIA ने जांच अपने हाथ में ली और दिशा बदल दी। NIA ने कहा कि यह हमला हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों ने किया था। NIA ने सुनील जोशी और कुछ अन्य लोगों पर आरोप लगाए। सुनील जोशी की बाद में मौत हो गई। इनमें से 4 आरोपी अब बरी हो गए हैं– मनोहर नरवरिया, राजेंद्र चौधरी, धन सिंह और लोकेश शर्मा। ये 4 लोग 2019 से जमानत पर बाहर थे।
बरी होने की वजह क्या?
चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम सी चंदक की बॉम्बे हाईकोर्ट की बेंच ने कहा, 'ATS और NIA की जांच पूरी तरह से विरोधाभासी हैं। दोनों कहानियां एक-दूसरे से बिल्कुल उल्टी हैं और इन्हें किसी भी तरह जोड़ा नहीं जा सकता है। एनआईए ने ज़्यादातर hearsay witnesses यानी सुनी हुई बात के आधार पर गवाही देने वाले गवाह रखे, जो अदालत में मान्य नहीं होते।
हाईकोर्ट ने कहा कि कई गवाहों ने पहले एक बयान दिया, फिर उसे वापस ले लिया। ऐसे गवाहों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसने कहा कि NIA ने 2011 के बाद कोई नये ठोस सबूत नहीं जुटाए, बल्कि वह पुराने बयानों पर ही निर्भर रही।
स्वामी असीमानंद के बयान का भी इस्तेमाल किया गया, लेकिन उन्होंने बाद में उसे वापस ले लिया था और अन्य कोर्टों ने उसे खारिज कर दिया था। स्पेशल NIA कोर्ट ने आरोप तय करते समय 'कोई न्यायिक दिमाग नहीं लगाया'।
कोर्ट ने साफ़ कहा, 'आज की स्थिति में घटना की दो पूरी तरह अलग-अलग कहानियां हैं। ATS और NIA की चार्जशीट एक-दूसरे से इतनी अलग हैं कि दोनों को साथ नहीं लाया जा सकता। केस डेड एंड पर पहुंच गया है।'
कोर्ट ने यह भी पूछा कि ATS और CBI द्वारा इकट्ठा किए गए वॉइस सैंपल और फॉरेंसिक रिपोर्ट जैसे सबूत को ट्रायल कोर्ट कैसे नजरअंदाज कर सकता है?
पीड़ित परिवारों के न्याय का क्या हुआ?
इस फ़ैसले के बाद मालेगांव ब्लास्ट 2006 केस में कोई भी आरोपी बाकी नहीं बचा है। 20 साल बाद भी इस हमले के असली दोषियों तक पहुंच नहीं हो पाई है। पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की उम्मीद अब और कम हो गई है। कई लोग निराश हैं कि इतने बड़े हमले में कोई सजा नहीं हुई।
यह फैसला आतंकवाद पर जांच एजेंसियों के काम करने के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाता है। दो एजेंसियां एक ही केस में बिल्कुल अलग-अलग दिशा में जांच करें, तो न्याय कैसे मिलेगा?
सरकार और NIA अब क्या कदम उठाएगी, यह देखना बाकी है। हो सकता है कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएं, लेकिन फिलहाल हाईकोर्ट का यह फैसला आखिरी है।
यह केस दिखाता है कि आतंकवाद की जांच में ठोस सबूत, एकसाथ काम करने वाली एजेंसियां और सही गवाह कितने जरूरी हैं। 31 निर्दोष लोगों की मौत का ज़िम्मेदार अब कौन है? और दोषियों को सजा दिलाने की ज़िम्मेदारी किसकी है? क्या ये सारे सवाल एक ही जवाब की तरफ़ इशारा करते हैं?
2008 के मालेगाँव विस्फोट में क्या हुआ था?
मालेगांव के व्यस्त भिकू चौक के पास 29 सितंबर 2008 को एक दोपहिया वाहन में बम धमाका हुआ था। इसमें सात लोगों की मौत हुई थी, जबकि 92 लोग घायल हो गए थे। इस मामले में ट्रायल में 7 मुख्य आरोपी थे। इन सभी आरोपियों को 31 जुलाई 2025 को स्पेशल NIA कोर्ट ने बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सबूतों के अभाव में यह फैसला आया। इस मामले में 7 आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय राहिरकर और सुधाकर द्विवेदी थे। ये सभी पहले जमानत पर रिहा थे, लेकिन 2025 के फैसले से पूरी तरह दोषमुक्त हो गए।