महाराष्ट्र में बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर बेंच में एक याचिका दायर कर सीईसी ज्ञानेश कुमार द्वारा पिछले 10 महीनों में जारी किए गए 14 आदेशों को रद्द करने और महाराष्ट्र में वोटर लिस्ट से काटे गए नामों को बहाल करने की मांग की है।

तीन स्थानीय निवासियों द्वारा याचिका में कहा गया है कि ये आदेश एकतरफा तरीके से जारी किए गए। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार याचिका में इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट का हवाला दिया गया है जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इन 14 मौकों पर आपत्ति जताई थी। ये आपत्तियां वोटर रजिस्ट्रेशन, नाम काटना-बहाल करना, वोटर लिस्ट का डेटाबेस, इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के कामकाज और सॉफ्टवेयर प्रक्रियाओं से जुड़ी थीं।
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याचिका में आरोप लगाया गया है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार ने अपने आधिकारिक कर्तव्यों का सही तरीके से पालन नहीं किया। इसलिए उनके द्वारा किए गए किसी भी काम को कानूनी सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार अपना काम नहीं किया।

याचिका में क्या-क्या मांग की गई?

  • 14 प्रशासनिक आदेशों को रद्द किया जाए।
  • महाराष्ट्र में SIR प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
  • SIR के दौरान जिन वोटरों के नाम काटे गए, उन्हें तुरंत बहाल किया जाए।
  • जिन राज्यों में SIR हुआ है, वहां आगामी विधानसभा चुनाव तब तक टाल दिए जाएं जब तक कानूनी रूप से सही और नई वोटर लिस्ट तैयार न हो जाए।
  • एक स्वतंत्र न्यायिक समिति बनाई जाए, जिसकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज करें। यह समिति SIR के दौरान हुए डेटा डिलीशन और सॉफ्टवेयर ब्लॉकेज की जांच करे।
  • जुलाई में फॉर्म 6 में किए गए कुछ बदलावों को भी चुनौती दी गई है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि ये फैसले एकतरफा लिए गए, जिसमें अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।

SIR प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप

इसी बीच, बॉम्बे हाईकोर्ट में एक और याचिका दाखिल हुई है। वंचित बहुजन अघाड़ी यानी वीबीए के यूथ अध्यक्ष सागर रमेश गवई और एक अन्य व्यक्ति ने SIR के दौरान महाराष्ट्र में हुई प्रक्रिया संबंधी गड़बड़ियों को लेकर याचिका लगाई है। इसमें कहा गया है कि बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO लोगों से दस्तावेज मांग रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग के अपने नियमों के अनुसार एन्यूमरेशन के दौरान दस्तावेज नहीं मांगे जाने चाहिए।

याचिका में यह भी आरोप है कि घर पर न मिलने या पुरानी लिस्ट में नाम न मिलने पर बिना सुनवाई और बिना लिखित आदेश के लोगों के नाम ‘अनुपस्थित’, ‘शिफ्ट’, ‘मृत्यु’ या ‘डुप्लिकेट’ के कोड लगाकर काट दिए जा रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि वे सिर्फ पारदर्शिता और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का पालन चाहते हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स मामले के फैसले का हवाला देते हुए एकतरफा नाम काटने का विरोध किया है। नागरिकता की जांच को लेकर भी संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका

उधर, सुप्रीम कोर्ट में भी CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर इस मामले में आगे बढ़ने के लिए वैधानिक सहमति मांगी है। अधिवक्ता का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए संवैधानिक सिद्धांतों का कथित तौर पर उल्लंघन हुआ है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की विस्फोटक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के ऐसे फैसलों पर आपत्ति दर्ज की, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए थे।

बहरहाल, ये याचिकाएँ वोटर लिस्ट की पारदर्शिता और सही प्रक्रिया अपनाने पर जोर देती हैं। अदालत अब इन मुद्दों पर सुनवाई करेगी।