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शिक्षा पर मंदी की मार, महाराष्ट्र में 70% इंजीनियरिंग सीटें खाली

सरकार देश में तेज़ी से फ़ैल रही आर्थिक मंदी के आँकड़े कितने भी छुपाने का प्रयास कर ले लेकिन उसका असर किसी न किसी तरह से अब सामने आने लगा है। ऐसा ही एक सच सामने आया है महाराष्ट्र में इंजीनियरिंग महाविद्यालयों में विद्यार्थियों के प्रवेश को लेकर। रोज़गार के कम होते अवसर और मंदी की मार की वजह से इस साल प्रदेश के इंजीनियरिंग महाविद्यालयों में 70% तक सीटें खाली हैं। एक दौर हुआ करता था जब इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश को लेकर मारामारी रहती थी। डायरेक्ट्रेट ऑफ़ टेक्निकल एजुकेशन के जो आँकड़े हैं उनके अनुसार महाराष्ट्र में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की सर्वाधिक सीटें हैं।

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बीई के लिए सेंट्रलाइज़्ड एडमिशन प्रोसेस (सीईपी) के आँकड़ें देखें तो मैकेनिकल इंजीनियरिंग की 33900 सीटों में से 72% सीटें इस साल खाली हैं। जबकि सिविल इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की क्रमशः 67% और 69% सीटें खाली हैं। जबकि कम्प्यूटर इंजीनियरिंग की 17476 सीटों में से 30% सीटें खाली हैं। कुल मिलाकर प्रदेश में विभिन्न विषयों की कुल 1 लाख 27 हज़ार इंजीनियरिंग की सीटों में से इस साल 62086 सीटें खाली पड़ी हैं। सभी का औसत निकालें तो यह क़रीब 49 % के बराबर है यानी इंजीनियरिंग कॉलेज की हर दो में से एक सीट खाली है। लेकिन जब सरकारी या अनुदानित इंजीनियरिंग कॉलेज तथा निजी और ग़ैर अनुदानित कॉलेज की तुलना करें तो यह आँकड़ा एक नयी तसवीर ही दिखाता है।

निजी और ग़ैर अनुदानित कॉलेज में क़रीब 99% सीटें खाली पड़ी हैं जबकि सरकारी और अनुदानित कॉलेज में यह आँकड़ा कुछ सौ तक ही है। यानी विद्यार्थियों ने वहीं प्रवेश लिया जहाँ उन्हें कम शिक्षण शुल्क या रियायती शिक्षण शुल्क में कोर्स करने का अवसर मिला है।

रोज़गार पर असर

पहले निजी कॉलेज के प्रबंधक हर साल अपने इंजीनियरिंग कॉलेज में सीटों की संख्या वृद्धि को लेकर कोशिश करते रहते थे लेकिन अब वह सिलसिला भी बंद हो गया है। इसका कारण यह है कि प्रदेश में इंजीनियरिंग कॉलेजों में जितनी सीटें हैं, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों की संख्या उससे कहीं कम है। इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और सिविल इंजीनियरिंग क्षेत्र में रोज़गार के अवसर काफ़ी घटते जा रहे हैं। 

कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में अभी भी रोज़गार की कुछ संभावना है लिहाज़ा उस तरफ़ विद्यार्थियों का अभी तक झुकाव बना हुआ है। इन लोगों का कहना है कि कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग क्षेत्र में आयी मंदी की वजह से उससे सम्बंधित क़रीब 300 किस्म के क्षेत्रों में भी उसका असर पड़ रहा है और रोज़गार के अवसर तेज़ी से घटते जा रहे हैं।

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कॉलेजों के बंद होने का ख़तरा!

रोज़गार के जो अवसर मिल रहे हैं वह सेवा क्षेत्र से संबंधित हैं जहाँ पर इंजीनियरिंग के डिग्रीधारियों को सामान्य बीकॉम और बीएससी की डिग्री वालों से चुनौती मिल रही है। ऐसे में विद्यार्थी यह सोचने लगे हैं कि क्यों वे इंजीनियरिंग में अतिरिक्त वर्ष की पढ़ाई करें जबकि उन्हें रोज़गार के लिए सर्विस क्षेत्र में ही जाना है। 

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बता दें कि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा हुआ था। इस नेटवर्क पर इन राज्यों के राजनीतिक दलों से सम्बंधित लोगों का आधिपत्य बना हुआ है लेकिन अब वे परेशान हैं कि किस तरह से वे इन कॉलेज को चलाएँ। तेज़ी के दौर में जब शिक्षा का कारोबार फल-फूल रहा था तो अधिकाँश नेताओं ने ग़ैर अनुदानित संस्थाएँ शुरू कर दीं क्योंकि उसके लिए लाइसेंस की और सरकारी स्वीकृति की प्रक्रिया में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं आती थी। लेकिन अब उनके सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।
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