महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने बिना वोट पड़े ही 68 सीटें हासिल कर लीं। इसमें अकेले बीजेपी की 44 सीटें हैं। विपक्ष ने धांधली का आरोप लगाया है। राज्य चुनाव आयोग ने जांच के आदेश दिए हैं।
महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों से पहले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को बड़ी सफलता मिली है। नामांकन वापसी की अंतिम तिथि शुक्रवार को खत्म होने के बाद भाजपा, एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी के कुल 68 उम्मीदवार बिना किसी विरोध के विजयी घोषित कर दिए गए हैं। इनमें भाजपा के 44, शिवसेना के 22 और एनसीपी के 2 उम्मीदवार शामिल हैं। इसके अलावा मालेगांव में इस्लाम पार्टी का एक उम्मीदवार भी निर्विरोध चुना गया। हालांकि विपक्ष ने धांधली का आरोप लगाया है।
राज्य के 29 नगर निगमों में कुल 2,869 सीटों के लिए 15 जनवरी को मतदान होगा। इनमें से कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (केडीएमसी) में सबसे अधिक 22 उम्मीदवार निर्विरोध विजयी हुए, जिनमें भाजपा के 15 और शिवसेना के 7 शामिल हैं। यह क्षेत्र भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण का गृह क्षेत्र है। जलगांव में 12 महायुति उम्मीदवार (भाजपा और शिवसेना के 6-6) निर्विरोध चुने गए, जो जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन का गृह क्षेत्र है। पनवेल नगर निगम में भाजपा के 6 उम्मीदवारों के सामने विपक्षी उम्मीदवारों ने अंतिम समय में नामांकन वापस ले लिया। पुणे नगर निगम की 165 सीटों में भाजपा की मंजुषा नागपुरे और श्रीकांत जगताप निर्विरोध विजयी हुए।
महायुति नेताओं का दावा: 'यह सिर्फ ट्रेलर है'
शिवसेना नेता शाइना एनसी ने इसे महायुति की बड़ी उपलब्धि बताया और कहा, "यह सिर्फ ट्रेलर है, पूरी फिल्म अभी बाकी है। महायुति सभी 29 नगर निगमों पर कब्जा जमाएगी। यह लहर ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह है।"
केंद्रीय मंत्री मुरलीधर मोहोल ने पुणे में निर्विरोध जीत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में हुए विकास कार्यों का परिणाम बताया। उन्होंने कहा, "यह पुणे में भाजपा का महापौर सुनिश्चित करने की शुरुआत है।"
विपक्ष का आरोप: धमकी और दबाव से नामांकन वापसी
विपक्षी दलों ने इन निर्विरोध जीतों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता संजय राउत ने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर्स को निर्देश दिए गए थे कि नामांकन वापसी के फॉर्म रात में भी स्वीकार किए जाएं। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, "एक मित्र ने बताया कि देर रात फॉर्म स्वीकार करना उचित नहीं है, लेकिन संरक्षक मंत्री ने अनुरोध और धमकी के लहजे में कहा कि स्थानीय विधायक की सुनें। यह लोकतंत्र के नाम पर गुंडातंत्र है।" राउत ने चेतावनी दी कि इससे बांग्लादेश और नेपाल जैसे जन आंदोलन हो सकते हैं।
विपक्ष का आरोप है कि महायुति ने विपक्षी उम्मीदवारों को धमकी देकर या पैसे देकर नामांकन वापस लेने पर मजबूर किया।
संजय राउत के प्रमुख आरोप
शिवसेना (यूबीटी) के नेता एवं राज्यसभा सांसद संजय राउत ने सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन (भाजपा, एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना एवं अजित पवार गुट की एनसीपी) पर तीखा हमला बोला है। उनके मुख्य आरोप इस तरह हैंः
रिटर्निंग अधिकारियों पर दबाव: राउत ने आरोप लगाया कि रिटर्निंग अधिकारियों को निर्देश दिए गए थे कि नामांकन वापसी के फॉर्म आधिकारिक समय-सीमा (दोपहर 3 बजे) के बाद रात में भी स्वीकार किए जाएं। उनका कहना है कि यह चुनावी नियमों का उल्लंघन है।
एक अधिकारी ने देर रात फॉर्म स्वीकार करने पर आपत्ति जताई और कहा कि यह उचित नहीं है। इस पर संरक्षक मंत्री ने अनुरोध एवं धमकी के मिले-जुले लहजे में कहा कि “स्थानीय विधायक की बात मानो”।
विपक्षी उम्मीदवारों पर व्यापक दबाव: राउत ने महायुति पर आरोप लगाया कि उन्होंने धमकी, ब्लैकमेल एवं संभवतः पैसे का लालच देकर विपक्षी उम्मीदवारों को अंतिम क्षण में नामांकन वापस लेने पर मजबूर किया। साथ ही, अधिकारियों पर दबाव डालकर विपक्षी उम्मीदवारों का नामांकन दाखिल करने से ही रोक दिया।
“लोकतंत्र के नाम पर गुंडाराज”: राउत ने इस स्थिति को “लोकतंत्र के नाम पर गुंडाशाही (मॉबोक्रेसी)” करार दिया और कहा कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हो रही है। उन्होंने चेताया कि इस तरह के कृत्यों से बांग्लादेश एवं नेपाल जैसे हालिया जेन ज़ी जन-उभार जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। राउत ने कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग के जांच आदेश के बाद नामांकन केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज गायब होने लगे हैं।
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने संजय राउत के धांधली एवं धमकी के आरोपों का सीधे तौर पर जवाब नहीं दिया। शिंदे ने इन जीतों को अपनी पार्टी के कार्यों एवं लोकप्रियता का प्रमाण बताया है, लेकिन विपक्ष के आरोपों पर कोई प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं की।
जांच तक विजेताओं की घोषणा रोकी गई
विपक्ष के आरोपों के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने रिटर्निंग ऑफिसर्स को निर्देश दिया है कि इन वार्डों में विजेताओं की अंतिम घोषणा जांच पूरी होने तक रोकी जाए। आयोग यह जांच करेगा कि क्या नामांकन वापसी दबाव में हुई। ये निर्विरोध जीत महायुति के लिए चुनावी बढ़त तो दे रही हैं, लेकिन विपक्ष के आरोपों ने लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं। 15 जनवरी के मतदान और 16 जनवरी को मतगणना के परिणामों पर सभी की नजरें टिकी हैं।