महाराष्ट्र में Special Intensive Revision (SIR) के बाद जारी मसौदा मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि राज्य की अल्पसंख्यक आबादी वाली विधानसभा सीटों पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। अकेले मुंबई की कम से कम 10 विधानसभा सीटों पर 35 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं को मसौदा सूची से बाहर किया गया है। 

महाराष्ट्र में कुल 2.06 करोड़ नाम मसौदा सूची से बाहर

SIR प्रक्रिया से पहले महाराष्ट्र में करीब 9.78 करोड़ मतदाता दर्ज थे। SIR के बाद जारी मसौदा मतदाता सूची में यह संख्या घटकर करीब 7.71 करोड़ रह गई है। यानी 2,06,88,487 मतदाताओं के नाम मौजूदा मसौदा सूची में शामिल नहीं हैं। यह पिछली मतदाता सूची का लगभग 21.14 प्रतिशत है। निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक नाम हटने के पीछे अलग-अलग कारण बताए गए हैं। इनमें मतदाताओं का दूसरे स्थान पर पंजीकरण, मृत्यु, स्थायी रूप से स्थान बदलना, मतदाता का पता नहीं चलना अथवा अनुपस्थित होना और अन्य श्रेणियां शामिल हैं।
कुल बाहर किए गए नामों में करीब 76.76 लाख मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित, 75.41 लाख अनुपलब्ध/अनट्रेसेबल, 34.82 लाख मृत, 17.66 लाख दूसरे स्थान पर पंजीकृत और करीब 2.22 लाख अन्य श्रेणी में रखे गए हैं।

मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर ज्यादा कटौती का आरोप

महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि मुंबई में मुस्लिम आबादी वाली कई सीटों पर मतदाता कटौती का प्रतिशत राज्य के औसत से काफी ज्यादा है।चांदिवली इसका प्रमुख उदाहरण है। यहां मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत बताई गई है। कुल 4,62,346 मतदाताओं में से 1,91,577 नाम, यानी करीब 41.4 प्रतिशत, ASDDO श्रेणी में चले गए। ASDDO का अर्थ Absent, Shifted, Dead, Deleted and Others है। 2024 के विधानसभा चुनाव में चांदिवली सीट से शिवसेना के दिलीप लांडे ने कांग्रेस के खान मोहम्मद आरिफ उर्फ नसीम खान को 20 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था।
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इसी तरह मानखुर्द-शिवाजीनगर में करीब 55 प्रतिशत मुस्लिम आबादी बताई गई है। यहां 1,46,912 मतदाता, यानी लगभग 42.3 प्रतिशत, मसौदा सूची से बाहर हैं। 2024 में इस सीट से समाजवादी पार्टी के अबू आसिम आजमी ने AIMIM के अतीक अहमद खान को करीब 12,753 वोटों से हराया था।

मुंबई की अन्य सीटों पर भी बड़ी संख्या में नाम हटे

आंकड़ों के मुताबिक
  • मालाड वेस्ट में करीब 39 प्रतिशत मतदाता बाहर हुए। यहां मुस्लिम आबादी लगभग 28 प्रतिशत है।
  • मुंबादेवी में लगभग 50 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और करीब 38 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटे।
  • वांद्रे वेस्ट में करीब 38 प्रतिशत मतदाता हटे।
  • बायकुला, जहां मुस्लिम आबादी लगभग 38.9 प्रतिशत है, वहां करीब 35 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हैं।
  • वांद्रे ईस्ट में लगभग 31.4 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और 35.1 प्रतिशत नाम हटे।
  • धारावी (SC) में करीब 35.8 प्रतिशत नाम हटे।
  • कुर्ला (SC) में लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और 36.6 प्रतिशत मतदाता बाहर हुए।
  • अंधेरी वेस्ट, जहां मुस्लिम आबादी लगभग 26.4 प्रतिशत बताई गई है, वहां 36.8 प्रतिशत नाम हटे।

मुंबई से बाहर भी यही पैटर्न

यह मामला सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं है। मुंबई महानगर क्षेत्र और महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में भी मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने की बात सामने आई है।
  • भिवंडी ईस्ट में मुस्लिम आबादी करीब 42 प्रतिशत है और यहां लगभग 49.4 प्रतिशत मतदाता मसौदा सूची से बाहर किए गए। वहीं भिवंडी वेस्ट में मुस्लिम आबादी करीब 43 प्रतिशत बताई गई है और वहां 46.4 प्रतिशत मतदाता हटे।
  • मुंब्रा-कलवा में करीब 44 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटे हैं, जबकि मुस्लिम आबादी लगभग 38.7 प्रतिशत है।
  • नागपुर सेंट्रल में मुस्लिम आबादी का अनुमान लगभग 22 प्रतिशत है और यहां भी करीब 38.5 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हुए हैं।

NCP-SP नेता अनिश गवांडे का आरोप

NCP-SP के नेता अनिश गवांडे ने इन आंकड़ों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि मुंबई और मुंबई महानगर क्षेत्र को इस “अतार्किक और पक्षपातपूर्ण” कटौती का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। उनके मुताबिक महाराष्ट्र में करीब 76 लाख नाम हटाए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 35 प्रतिशत है, जबकि राज्य के बाकी हिस्सों में औसत करीब 17 प्रतिशत है। उन्होंने दावा किया कि मुंबई में जिन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से ज्यादा है, वहां 40 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

कांग्रेस का आरोप-‘सिर्फ बीजेपी समर्थकों के नाम बचे’

कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंढे ने इससे भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने मीडिया से कहा कि कथित तौर पर “ग्रीन, ब्लू और विपक्षी वोटरों” के नाम हटाए गए और केवल “सैफ्रन” यानी बीजेपी समर्थक मतदाताओं को रखा गया। लोंढे ने नागपुर में करीब 500 बीजेपी कार्यकर्ताओं को विदर्भ के अलग-अलग हिस्सों से लाकर चुनाव अधिकारियों के साथ मिलकर मतदाता सूची में हेरफेर करने का आरोप भी लगाया।
इससे पहले भी महाराष्ट्र कांग्रेस ने SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाए थे। पार्टी ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस के प्रभाव वाले बूथों पर “अनमैप्ड” मतदाताओं की संख्या ज्यादा है और कुछ जगहों पर Form 7 के जरिए नाम हटाने की कोशिश की गई। चुनाव अधिकारी ने तब कहा था कि उसे इस संबंध में कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।

राहुल गांधी ने पूछा- कौन सी मतदाता सूची सही थी?

महाराष्ट्र में मतदाता संख्या में हुए इस बदलाव को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में करीब 9.29 करोड़ मतदाता थे। उसी वर्ष नवंबर में विधानसभा चुनाव के समय यह संख्या बढ़कर करीब 9.7 करोड़ हो गई। अब SIR के बाद यह संख्या करीब 7.78 करोड़ रह गई है। राहुल गांधी ने सवाल किया- “कौन सी सूची सही थी?” उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी और उनके शब्दों में “वोट चोरी आयोग” चुनाव जीतने के लिए तरीकों में बदलाव करता रहता है।

खड़गे ने भी चुनाव आयोग को बीजेपी कुर्सी बचाओ आयोग

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी महाराष्ट्र में 2 करोड़ से ज्यादा नाम बाहर होने को लेकर चुनाव आयोग और बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि जहां बीजेपी को फायदा होता है वहां वोटर जोड़े जाते हैं और जहां फायदा नहीं होता वहां वोट बांटे या हटाए जाते हैं। खड़गे ने चुनाव आयोग पर तंज करते हुए “BJP Kursi Bachao Aayog” कहा।

चुनाव आयोग का क्या कहना हैः महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोक्कलिंगम ने स्पष्ट किया है कि अभी जारी सूची मसौदा मतदाता सूची है, अंतिम सूची नहीं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के नाम मसौदा सूची में नहीं हैं, वे 30 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दाखिल कर सकते हैं। इसके बाद संबंधित दावों की जांच और सत्यापन किया जाएगा। महाराष्ट्र की अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या SIR से वास्तविक मतदाता हटे या फर्जी/अयोग्य नाम?

महाराष्ट्र के आंकड़ों में एक तरफ बड़ी संख्या में नाम हटने का दावा है, वहीं चुनाव अधिकारियों का कहना है कि इन नामों में मृत, स्थानांतरित, अनुपलब्ध और दूसरी जगह पंजीकृत मतदाता शामिल हैं। इसलिए केवल मसौदा सूची में नाम न होने को अपने-आप में अंतिम रूप से “मताधिकार छीनना” नहीं माना जा सकता।
लेकिन मुंबई और भिवंडी जैसी मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर कटौती का प्रतिशत राज्य के औसत से काफी अधिक होने के कारण विपक्ष ने सवाल उठाया है कि क्या SIR की प्रक्रिया समान रूप से लागू हुई या कुछ सामाजिक-राजनीतिक समूहों पर इसका ज्यादा असर पड़ा। इसका निर्णायक जवाब अंतिम सूची, दावों-आपत्तियों और चुनाव आयोग की सत्यापन प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
यानी महाराष्ट्र SIR विवाद का असली सवाल अब सिर्फ 2.06 करोड़ नाम हटने का नहीं, बल्कि यह है कि इनमें से कितने नाम वास्तविक रूप से अयोग्य थे और कितने वैध मतदाताओं के नाम गलती से या किसी कथित पक्षपात के कारण हटे।