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महाराष्ट्र: शिवसेना को नहीं मिली सुप्रीम कोर्ट से राहत, उद्धव को झटका

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में फ्लोर टेस्ट को चुनौती देने वाली शिवसेना के चीफ व्हिप सुनील प्रभु की याचिका पर स्टे देने से इनकार कर दिया। उधर, सुप्रीम कोर्ट में बागी विधायकों की अयोग्यता को चुनौती देनी वाली एकनाथ शिंदे की याचिका पर 11 जुलाई को सुनवाई होगी। जेल में बंद एनसीपी विधायक नवाब मलिक और अनिल देशमुख की याचिका पर रात में ही सुनवाई हुई। कोर्ट ने सॉलिसीटर जनरल से कहा कि उन्हें फ्लोर टेस्ट में वोट डालने दीजिए। हालाँकि, अब कल फ्लोर टेस्ट नहीं होगा, क्योंकि उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया है। 

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार शाम 5 बजे महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के निर्देश को चुनौती देने वाली शिवसेना के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई शुरू की। राज्यपाल ने ठाकरे से 30 जून को सदन के पटल पर अपना बहुमत साबित करने को कहा था। केस की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जे.बी. परदीवाला की बेंच में हो रही है। रात साढ़े आठ बजे तक कई पक्षों ने दलीलें पेश कीं।
सुनील प्रभु के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने बहस की शुरुआत करते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह पत्र जो हमें फ्लोर टेस्ट के बारे में बताता है, कहता है कि 28 जून को विपक्ष के नेता ने राज्यपाल से मुलाकात की और बुधवार सुबह हमें गुरुवार के फ्लोर टेस्ट के बारे में सूचना मिली। एनसीपी के दो सदस्य कोविड से पीड़ित हैं और एक कांग्रेस विधायक देश से बाहर है।

उन्होंने कहा कि फ्लोर टेस्ट के लिए आदेश ने सुपरसोनिक स्पीड तय की। लेकिन फ्लोर टेस्ट यह भी तय करता है कि कौन सी सरकार लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। सही बहुमत का पता लगाने के लिए फ्लोर टेस्ट किया जाता है।

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लाइव लॉ के मुताबिक इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उनसे पूछा - अयोग्यता का मामला हमारे सामने लंबित है, हम तय करेंगे कि नोटिस वैध है या नहीं? लेकिन यह फ्लोर टेस्ट को कैसे प्रभावित कर रहा है?

इस पर सुनील प्रभु के वकील ने कहा- स्पीकर के फैसले से पहले मतदान (फ्लोर टेस्ट में) नहीं होना चाहिए। उनके फैसले के बाद सदन के सदस्यों की संख्या में बदलाव होगा। एक तरफ कोर्ट ने अयोग्यता की कार्यवाही पर रोक लगाई है, दूसरी तरफ विधायक कल मतदान करने जा रहे हैं, यह सीधा विरोधाभास है।

सुनील प्रभु के वकील ने तर्क दिया कि यह अदालत अयोग्यता कार्यवाही की वैधता पर विचार कर रहा है और मामले को 11.07.2022 को सुनवाई के लिए रखा है। अयोग्यता का मुद्दा फ्लोर टेस्ट के मुद्दे से सीधे जुड़ा हुआ है। 

सुप्रीम कोर्ट ने सुनील प्रभु की ओर से पेश हुए वकील अभिषेक सिंघवी से पूछा- क्या आप इस बात पर विवाद कर रहे हैं कि आपकी पार्टी के 34 सदस्यों ने पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं? सिंघवी ने जवाब दिया - कोई सत्यापन नहीं है। सरकार एक सप्ताह तक पत्र रखती है और केवल तभी कार्रवाई करती है जब नेता विपक्ष उनसे मिलते हैं। सरकार की हर कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि जो लोग पक्ष बदल चुके हैं और दलबदल कर चुके हैं, वे लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। क्या राज्यपाल कल (गुरुवार) फ्लोर टेस्ट नहीं बुलाने के लिए कोर्ट पर भरोसा नहीं कर सकते? कल फ्लोर टेस्ट नहीं हुआ तो क्या आसमान गिर जाएगा ?
सिंघवी ने किहोतो फैसले का उल्लेख किया। राज्यपाल के फैसले पर न्यायिक समीक्षा के कई फैसलों का हवाला दिया। सिंघवी ने कहा कि मी लार्ड को गवर्नर के फैसले की समीक्षा का अधिकार है। सिंघवी ने इसके बाद उत्तराखंड, मध्य प्रदेश में विधायकों की अयोग्यता के मामलों के उदाहरण दिए। सिंघवी की दलीलें पूरी हो चुकी हैं।

सिंघवी ने कहा कि जब तक विधायकों की अयोग्यता का मामला न तय हो जाए, तब तक फ्लोर टेस्ट रोका जाए। सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि कैसे सुनील प्रभु ही शिवसेना के चीफ व्हिप हैं, जिन्हें इस सारे घटनाक्रम से बहुत पहले नियुक्त कर दिया गया था।
बागी विधायक एकनाथ शिंदे की ओर से सीनियर एडवोकेट एन के कौल ने बहस की शुरुआत की। उन्होंने नबाम रेबिया केस का हवाला देते हुए कहा कि पहले यह तय हो कि जब तक स्पीकर को नहीं हटाया जाता, तब तक विधायकों की अयोग्यता तय नहीं हो सकती। कौल ने कहा कि यह अदालत के हस्तक्षेप का सवाल नहीं है, सवाल यह है कि आप मामले से निपट सकते हैं या नहीं, क्योंकि आपकी क्षमता पर सवाल है।

कौल ने तर्क दिया कि यह तय है कि फ्लोर टेस्ट में देरी नहीं होनी चाहिए। केवल विधायक ने इस्तीफा दिया है या 10वीं अनुसूची से संबंधित कार्यवाही पेंडिंग होने के कारण फ्लोर टेस्ट में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं। 
इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा - दूसरे पक्ष का थोड़ा अलग तर्क यह है कि कार्यवाही अध्यक्ष द्वारा स्वेच्छा से लंबित नहीं रखी जाती है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण रोक दी जाती है। यह दलील बताती है कि हमें पहले स्पीकर के अधिकार पर बात करना चाहिए।
वकील कौल ने कहा कि जब तक गवर्नर के इऱादे के बारे में पता नहीं लगता कि उसका इरादा क्या है, तब तक राज्यपाल के आदेश पर सवाल नहीं उठ सकता। यहां तो बागी विधायकों ने खुद राज्यपाल को पत्र भेजा है।
जस्टिस कांत ने पूछा कि इस मामले में फ्लोर टेस्ट में कौन-कौन योग्य लोग हिस्सा ले सकते हैं। इस पर वकील कौल ने कहा कि अभी हाउस तो भूल जाइए। अभी तो वो लोग अपनी पार्टी में ही अल्पमत में हैं। मैंने देखा है कि फ्लोर टेस्ट के लिए तमाम दल खुशी-खुशी तैयार हो जाते हैं लेकिन यह पार्टी डर रही है। कौल ने 2020 में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने शिवराज सिंह चौहान को फ्लोर टेस्ट के लिए कहा था। कौल ने इस केस के फैसले के कुछ हिस्से पढ़कर कोर्ट को सुनाए।
कौल ने इसके बाद सवाल किया कि क्या लोकतंत्र में यह निर्धारित करने के लिए बेहतर जगह हो सकती है कि सदन के पटल से सरकार का समर्थन कौन कर रहा है? एकमात्र तर्क यह है कि चूंकि आपके आधिपत्य ने नोटिस जारी किया है, इसलिए फ्लोर टेस्ट को टाल दिया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा : सिर्फ नोटिस नहीं, अंतरिम आदेश दिया गया है।
कौल ने कहा जितना अधिक आप फ्लोर टेस्ट में देरी करते हैं, उतना ही अधिक नुकसान  आप संविधान का करते हैं। यदि आप खरीद-फरोख्त को रोकना चाहते हैं, तो इसे रोकने का सबसे अच्छा तरीका फ्लोर टेस्ट है। इससे क्यों कतरा रहे हैं? जहां तक ​​राज्यपाल की शक्ति का प्रश्न है, मुझे मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है, कुछ मुद्दों पर राज्यपाल अपने विवेक से कार्य कर सकता है। फ्लोर टेस्ट उनका विवेक है। क्या इस मामले में राज्यपाल की कार्रवाई इतनी तर्कहीन है? इसलिए पहले स्पीकर को हटाया जाए, फिर विधायकों की अयोग्यता पर बात हो। इसलिए फ्लोर टेस्ट होने दिया जाए। राज्यपाल ने अपने अधिकार के तहत इसे तय कर दिया है।

वकील एनके कौल ने बोम्मई केस की लाइनों का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई सीएम फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं करना चाहता तो इसका मतलब है कि उसने सदन का विश्वास खो दिया है। यह तथ्य सार्वजनिक है कि निर्दलीय विधायकों ने गवर्नर को पत्र लिखा और उन्होंने उस पर फ्लोर टेस्ट कराने का निर्णय लिया।
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कौल ने नबाम रेबिया केस के हवाले से कहा कि स्पीकर कोई फैसला नहीं ले सकते। याचिकाकर्ता के तर्कों में दम नहीं है। तमाम तर्कों के सुनने के बाद जस्टिस कांत ने कौल से पूछा कि असंतुष्ट खेमे में कितने विधायक हैं। इस पर वकील कौल ने कहा कि मेरी समझ से 55 में से 39 असंतुष्ट खेमे में हैं। इस पर कोर्ट ने पूछा कि नोटिस कितनों को दिया गया है, वकील कौल ने बताया कि नोटिस 16 विधायकों को दिया गया है। उन्होंने शिंदे का वाक्य दोहराया। हम शिवसेना में हैं। हम शिवसेना नहीं छोड़ रहे हैं। हमें 9 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन है। याचिकाकर्ता के पास सिर्फ 14 विधायक हैं। जो हमारा विरोध कर रहे हैं।
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कौल ने बहस पूरी कर ली। अब सीनियर वकील मनिन्दर सिंह अपने तर्क दे रहे हैं। दरअसल, ये तर्क वकील एनके कौल के सबमिशन पर है। सिंह ने कहा कि यह कहना कि राज्यपाल ने मंत्रियों की सहायता और सलाह के बिना कार्य किया। तमाम फैसले बताते हैं कि फ्लोर टेस्ट के लिए मंत्रियों की सहायता की आवश्यकता नहीं है। फ्लोर टेस्ट कराना प्राकृतिक न्याय का हिस्सा है।

अब गवर्नर की ओर से सॉलिसीटर जनरल तर्क रख रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल के आदेश को चुनौती देने के मापदंडों को याचिकाकर्ताओं ने पूरा नहीं किया है। उन्होंने राज्यपाल का आदेश पढ़कर सुनाया। सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि डिप्टी स्पीकर ने असंतुष्ट विधायकों को दो दिन का नोटिस दिया और अब वही शख्स 24 घंटे पहले के फ्लोर टेस्ट के नोटिस पर सवाल उठा रहा है। गवर्नर को बहुत सारे लोगों ने पत्र लिखे थे और हालात से आगाह किया था। तमाम परिस्थितियों को देखते हुए राज्यपाल ने फैसला लिया।
इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने रीज्वाइंडर पेश किया। 
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