मराठा आरक्षण के आंदोलनकारी मनोज जरांगे ने महाराष्ट्र सरकार को फिर से आंदोलन की चेतावनी दी है। उन्होंने घोषणा की है कि 30 मई से वे जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में बिना किसी छाया, तंबू या छत के तपती धूप में आमरण अनशन शुरू करेंगे। जरांगे ने कहा, 'मैंने सरकार को काफी समय दे दिया था। अब बातचीत का समय खत्म हो गया है। इस बार मैं सख्त रुख अपनाऊंगा। अगर मुझे गर्मी से लू लगकर कुछ हो गया तो इसके लिए मुख्यमंत्री और सरकार जिम्मेदार होगी।'

मनोज जरांगे ने मराठा समुदाय से अपील की है कि वे उनके अनशन स्थल पर न आएँ। उन्होंने कहा, 'कोई यहाँ न आए। मैं मई की तेज धूप में अकेला बैठूंगा।'

कोई तंबू या छाया नहीं रहेगी। वे धूप में खुले आसमान के नीचे बैठेंगे। अनशन के दौरान पानी, भोजन और जूते भी नहीं पहनेंगे। उन्होंने कहा, 'या तो सरकार काम करेगी, या मैं जान दे दूंगा।'

सरकार पर आरोप

जरांगे ने आरोप लगाया कि सरकार मराठा आरक्षण की मांग को बार-बार टाल रही है। उन्होंने कहा, 'शांतिपूर्ण आंदोलन, रैलियां और बातचीत के बावजूद कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया। मराठा युवाओं पर झूठे मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। आंदोलन में जान गंवाने वालों के परिवारों को नौकरियां नहीं दी गईं। चुनाव में वोट तो चाहिए, लेकिन आरक्षण नहीं दे रहे।'

उन्होंने कहा कि सरकार ने 3 लाख कुनबी प्रमाणपत्र दिए हैं, लेकिन इसे एहसान समझ रही है। उन्होंने सवाल किया, 'पश्चिम महाराष्ट्र में बागान और अमीर किसान हैं तो क्या ओबीसी समुदायों के पास बागान नहीं हैं? क्या अमीरी आरक्षण का आधार है?'

मुख्य मांगें क्या हैं?

मनोज जरांगे मांग कर रहे हैं कि सभी मराठाओं को कुनबी जाति का प्रमाणपत्र दिया जाए। कुनबी ओबीसी श्रेणी में आती है, इसलिए इससे मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मिल सकेगा।

मनोज जरांगे ने 29 मई तक मराठवाड़ा में कुनबी प्रमाणपत्र बाँटने की डेडलाइन दी थी, लेकिन अब अनशन का ऐलान कर दिया है।

पिछली बातचीत

कुछ दिन पहले बीजेपी विधान पार्षद प्रसाद लाड जरांगे से मिलने आए थे, लेकिन जरांगे के अनुसार कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। जरांगे ने इस अनशन को 'निर्णायक लड़ाई' बताया है। उन्होंने कहा, 'हमने सब कुछ शांति से समझाया, रैलियां निकालीं, फिर भी आरक्षण नहीं मिला। मराठा बच्चों को भी अधिकारी बनने का हक है।'

पिछले साल के आंदोलन में क्या हुआ था?

मनोज जरांगे ने पिछले साल सितंबर में भी मराठा कोटा के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की थी। तब उन्होंने मुंबई के आज़ाद मैदान में प्रोटेस्ट किया था। उन्होंने मराठवाड़ा के मराठा समुदाय के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत 10% आरक्षण की मांग की थी। तब सरकार ने हैदराबाद गजट को लागू करने का वादा किया था, जो मराठवाड़ा के मराठों को कुनबी के रूप में मान्यता देता है। इससे वे सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के पात्र हुए। महाराष्ट्र सरकार ने मराठवाड़ा क्षेत्र के मराठों को कुनबी स्टेटस देने के लिए एक सरकारी प्रस्ताव यानी जीआर जारी करने का आश्वासन दिया था तो जरांगे पाटिल ने मराठा आरक्षण आंदोलन ख़त्म कर दिया था। जरांगे ने तब अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था, 'हम जीत गए हैं'। लेकिन उन्हें अब फिर से प्रदर्शन करने आगे आना पड़ा है।

30 मई से शुरू होने वाला यह अनशन गर्मी के मौसम में बेहद कठिन होगा। महाराष्ट्र सरकार पर अब दबाव बढ़ गया है। देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है। मराठा आरक्षण का यह विवाद लंबे समय से चल रहा है और राज्य की राजनीति में गरमागरम चर्चा का विषय बना हुआ है।

महाराष्ट्र की क़रीब 30% आबादी वाले मराठा समुदाय ने लंबे समय से शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की है। 2023 में मनोज जरांगे के संगठन 'शिवबा संघटना' ने जालना में भूख हड़ताल शुरू की थी, जो पूरे राज्य में विशाल रैलियों में बदल गई थी।
जरांगे की मांगें कुनबी दर्जे के ज़रिए ओबीसी कोटा में शामिल होने की तभी से उठ रही हैं। कुनबी मराठा किसानों की उप-जाति है और पहले से ही ओबीसी के रूप में वर्गीकृत है। उनके आठ सूत्री मांग-पत्र में मराठवाड़ा में मराठाओं को कुनबी के रूप में मान्यता देने वाला 1918 के हैदराबाद गजट को फौरन लागू करना; प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस मामले वापस लेना; मृत आंदोलनकारियों के परिजनों के लिए नौकरियां और सहायता; और मराठा व कुनबी को एक घोषित करने वाला जीआर शामिल था। इनमें से कुछ मांगें पहले ही मान ली गई हैं।