मुंबई के मलाड स्टेशन पर मामूली विवाद को लेकर मुंबई की भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन में 33 वर्षीय प्रोफेसर आलोक कुमार सिंह की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना ने रेलवे सुरक्षा में घोर खामियों को उजागर किया है।
मुंबई के मालाड रेलवे स्टेशन पर प्रोफेसर का मर्डर कर दिया गया
मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनों में एक बार फिर खौफनाक हत्या की घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। 24 जनवरी 2026 को पश्चिम रेलवे की एक भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन में नरसी मोनजी कॉलेज के 33 वर्षीय जूनियर प्रोफेसर आलोक कुमार सिंह की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना मालाड स्टेशन पर ट्रेन के पहुंचते ही हुई, जहां एक मामूली विवाद ने कुछ ही पलों में जानलेवा रूप ले लिया। आरोपी ओमकार शिंदे को महज 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन यह गिरफ्तारी घटना की भयावहता को कम नहीं करती, बल्कि मुंबई की रेलवे सुरक्षा व्यवस्था की गहरी खामियों को उजागर करती है।
जीआरपी ने बताया कि यह विवाद ट्रेन से उतरने को लेकर हुआ था। आरोपी ने आलोक सिंह पर हमला करने के लिए "अपने पास मौजूद धारदार चाकू" का इस्तेमाल किया। मुंबई लोकल ट्रेन नेटवर्क जैसे विशाल शहरी परिवहन नेटवर्क में यात्रियों के बीच कहासुनी और हाथापाई की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं, लेकिन हालिया हत्या कहीं अधिक गंभीर है।
मुंबई लोकल ट्रेनें दुनिया की सबसे व्यस्त और खतरनाक commuter सिस्टम में से एक हैं। रोजाना लाखों यात्री इन ट्रेनों में सफर करते हैं, जहां भीड़ इतनी अधिक होती है कि सामान्य निगरानी भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। लेकिन इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक व्यक्ति धारदार चाकू लेकर बिना किसी रोक-टोक के ट्रेन में कैसे घुस सकता है? रेलवे पुलिस (GRP) और रेलवे प्रशासन की ओर से प्लेटफॉर्म और ट्रेनों पर हथियारों की जांच के लिए कोई प्रभावी स्क्रीनिंग या मेटल डिटेक्टर सिस्टम क्यों नहीं है? दिल्ली मेट्रो या एयरपोर्ट जैसी जगहों पर जहां सख्त चेकिंग होती है, वहां भी कभी-कभी चाकू जैसी चीजें छिपाकर ले जाई जाती हैं, लेकिन मुंबई लोकल में तो यह लगभग खुलेआम है।
आलोक कुमार सिंह मालाड (पूर्व) के कुरार गांव में अपने चाचा सुनील कुमार सिंह (रिटायर्ड बीएमसी स्कूल शिक्षक) के साथ बचपन से रहते थे। उन्होंने ज्ञानोदय विद्या मंदिर हाई स्कूल से दसवीं तक पढ़ाई की, इस्माइल यूसुफ कॉलेज, जोगेश्वरी से एचएससी पूरी की और मुंबई विश्वविद्यालय से बीएससी तथा एमएससी की डिग्री हासिल की। 7-8 साल पहले उन्होंने शिक्षण की शुरुआत अंधेरी के एक अंतरराष्ट्रीय स्कूल से की। बीएड पूरा करने के बाद उन्होंने टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) पास किया। पिछले दो साल से वे विले पार्ले के नरसी मोनजी कॉलेज में लेक्चरर थे, जहां वे कक्षा 11 और 12 के छात्रों को मैथ्स पढ़ाते थे। पिछले साल उन्हें कॉलेज में स्थायी लेक्चरर बनाया गया था।
दो साल पहले उनकी शादी पूजा सिंह (28 वर्ष) से हुई थी, जो वर्तमान में बीएड कर रही हैं। परिवार में शिक्षा की मजबूत परंपरा है। उनके पिता अनिल कुमार सिंह (58 वर्ष) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सुरक्षा में तैनात हैं और गणतंत्र दिवस परेड की तैयारियों के सिलसिले में दिल्ली में थे, जब उन्हें बेटे की मौत की खबर मिली। परिवार के अन्य सदस्य उत्तर प्रदेश से मुंबई पहुंच रहे हैं।
आलोक सिंह उस दिन सहकर्मी सुधीर त्रिवेदी के साथ ट्रेन में थे, जैसा कि रोजाना होता था। ट्रेन मालाड स्टेशन पर पहुंची तो उतरते समय एक महिला यात्री के सामने खड़े होने के कारण उन्होंने आरोपी से कहा कि जल्दबाजी न करें। इसी पर विवाद बढ़ा और आरोपी ने चाकू से उन पर हमला कर दिया। हमले के बाद उन्हें कांदिवली के बाबासाहेब आंबेडकर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन भारी खून बहने के कारण उनकी मौत हो गई।
परिवार का आरोप है कि हमले के समय (5:50 PM) से अस्पताल पहुंचने (7:00 PM) तक देरी हुई, क्योंकि जीआरपी ने कागजी कार्रवाई को प्राथमिकता दी। जिससे समय पर इलाज नहीं हो सका। अन्यथा प्रोफेसर की जान बचाई जा सकती थी।
पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। पीड़ित के पिता अनिल कुमार सिंह ने कहा, "आरोपी पकड़ा गया है। रक्षा मंत्री ने मुझे आश्वासन दिया है कि उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से बात की है और इस मामले में सख्त कार्रवाई होगी। अगर यह यूपी में होता और सरकारी कर्मचारी को नुकसान पहुंचता, तो यूपी पुलिस आरोपी को एनकाउंटर में मार देती।"परिवार ने गहरा दुख जताते हुए कहा, "ट्रेन में विवाद आम बात है, लेकिन तेज हथियार क्यों? हमने एक ऐसे बेटे को खो दिया जिसकी जिंदगी अभी बहुत आगे थी। उम्मीद है आरोपी को कभी रिहा न किया जाएगा, ताकि भविष्य में ऐसे मामूली विवाद से किसी की जान न जाए।"
यह पहली घटना नहीं है। पिछले कई वर्षों में मुंबई की लोकल ट्रेनों में छेड़छाड़, लूट, मारपीट और हत्याओं की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। 2006 के 7/11 सीरियल ब्लास्ट से लेकर छोटी-मोटी झगड़ों में चाकूबाजी तक। हर बार प्रशासन "सुरक्षा बढ़ाई जाएगी" का वादा करता है, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता। CCTV कैमरे तो लगे हैं, जैसा कि इस मामले में फुटेज से आरोपी के भागने का सीन कैद हुआ, लेकिन क्या कैमरे अकेले अपराध रोक सकते हैं? क्या रेलवे पुलिस की तैनाती पर्याप्त है? क्या महिला/पुरुष रक्षक दल और गश्ती टीमें वाकई सक्रिय हैं? जवाब ज्यादातर मामलों में नकारात्मक ही आता है।
इस हत्या ने एक और कड़वी सच्चाई उजागर की है। मामूली विवाद भी घातक हो सकते हैं, खासकर जब समाज में असहनीशलता, गुस्सा और हथियारों की आसानी से उपलब्धता बढ़ रही हो। यह घटना सिर्फ किसी परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामूहिक विफलता है, जिसमें रेलवे, पुलिस, सरकार और समाज सब शामिल हैं। सबसे बड़ी गलती रेलवे पुलिस की है। जिसने इलाज के लिए भेजने में देर लगाई। यह घटना मुंबई लोकल ट्रेनों में बढ़ती हिंसा और सुरक्षा की खामियों को एक बार फिर उजागर करती है। छोटे-छोटे झगड़े घातक रूप ले रहे हैं, जबकि ट्रेनों में धारदार हथियारों की जांच और त्वरित चिकित्सा/पुलिस सहायता की कमी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।