बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग यानी एमपीएससी की भर्ती प्रक्रिया को लेकर चल रहे छात्रों के प्रदर्शन के मामले में सरकार के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रोटेस्ट कर रहे छात्र असामाजिक तत्व नहीं हैं। इसने कहा कि पुणे राज्य का शिक्षा हब है और यहाँ पढ़ने आए छात्र सच में अपनी पढ़ाई में रुचि रखते हैं। अदालत ने साफ़ कहा कि यदि वे सड़क पर उतरे हैं तो इसका मतलब है कि उनकी शिकायतें गंभीर हैं। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों का सिस्टम पर भरोसा फिर से बहाल करे।
चीफ़ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने यह बात कही। सुनवाई के दौरान जब एडवोकेट जनरल डॉ. मिलिंद साठे ने यह भी बताया कि पुलिस ने छात्रों के साथ बहुत संयम से व्यवहार किया है और अगर एफआईआर दर्ज होती है तो प्रदर्शनकारी छात्रों के करियर पर असर पड़ सकता है तो इस पर कोर्ट ने कहा, 'वे छात्र हैं, असामाजिक नहीं। एक परीक्षा खत्म होते ही अगर उन्हें लगता है कि प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी हुई है, तो छात्रों को विरोध करने का पूरा अधिकार है। आपने पहले ही बताया है कि 70 हजार पद खाली दिखाए गए हैं। विस्तृत जाँच होनी चाहिए। सोचिए कि देश भर के माता-पिता संकट में हैं।'
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खंडपीठ ने सरकार को फटकार लगाते हुए छात्रों से भी अपील की कि वे पढ़ाई करने वापस लौटें। इसने कहा कि अगर विरोध प्रदर्शन जारी रखना है तो पहले अनुमति लें और सार्वजनिक सड़कों के अलावा कोई दूसरा स्थान चुनें, क्योंकि सड़कों पर प्रदर्शन लंबे समय तक नहीं चल सकता।

छात्रों की चिंताएँ और आरोप

कोर्ट ने ग़ौर किया कि विरोध कर रहे छात्र एमपीएससी के कामकाज को लेकर चिंतित हैं। आयोग को 70 हजार से ज़्यादा खाली पद भरने हैं। छात्रों का आरोप है कि परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है और पेपर लीक हो जाते हैं। परीक्षाएं निष्पक्ष और सही तरीके से नहीं होतीं। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल डॉ. मिलिंद साठे ने कोर्ट को बताया कि छात्रों की चार मांगें हैं। इसमें एमपीएससी अध्यक्ष का इस्तीफा, परीक्षा शुल्क 100 रुपये करने और सभी परीक्षाएं ऑफलाइन करने की मांगें शामिल हैं। साठे ने दावा किया कि परीक्षा शुल्क 100 रुपये करने और सभी परीक्षाएं ऑफलाइन करने की मांगें पहले ही स्वीकार हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि पहली मांग पर राज्य सरकार ने राज्यपाल को प्रस्ताव भेज दिया है, ताकि सही फ़ैसला लिया जा सके।

इस पर बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि पुणे भारत के सबसे बड़े शिक्षा केंद्रों में से एक है। यदि वे सड़क पर उतरे हैं तो इसका मतलब है कि उनकी शिकायतें गंभीर हैं।

अदालत ने कहा, "अगर छात्र आंदोलन कर रहे हैं तो शिकायतें गंभीर हैं। खाली पदों की संख्या बहुत ज्यादा है। छात्र कहते हैं कि परीक्षाएं प्रक्रिया के अनुसार नहीं होतीं। परीक्षाएं निष्पक्ष होनी चाहिए। खासकर पुणे में ज़्यादातर छात्र पढ़ाई में सचमुच दिलचस्पी रखते हैं। वे सड़क पर आकर मांग करने के इच्छुक नहीं होते। राज्य सरकार को भरोसा बहाल करने के लिए ईमानदार कदम उठाने चाहिए।"

कोर्ट का निर्देश क्या

एडवोकेट जनरल ने बताया कि कुछ छात्र नेता 30 सितंबर को मुख्यमंत्री से मिले थे। लेकिन कोर्ट ने कहा कि अब मामला अदालत के सामने है और वह स्थिति का सही तरीक़े से ध्यान रखेगा। कोर्ट ने छात्रों से अपील की कि वे कक्षाओं में वापस लौटें। कोर्ट ने कहा, 'अब मामला अदालत के सामने है। हम छात्रों से अनुरोध करेंगे कि वे कक्षाओं में वापस जाएं। हम इसे आसानी से छोड़ने वाले नहीं हैं। भरोसा बहाल होना चाहिए। परीक्षाएं निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए।'
उन्होंने कहा कि 'आयोग के अध्यक्ष को कैसे नियुक्त और हटाया जाता है, यह सरकार जानती है। हम सुनिश्चित करेंगे कि सरकार की ओर से जवाब आए। हम चाहते हैं कि पहले बैकलॉग वाले खाली पद भरे जाएं। पढ़ाई में रुचि रखने वालों को परीक्षा में बैठने का निष्पक्ष मौका मिलना चाहिए। 70 हजार पद खाली हैं। माता-पिता की हालत देखिए, जिन्होंने अपने बच्चों को पुणे भेजा है। ये बच्चे मासूम हैं। हम देखेंगे कि राज्य इस मामले में कैसे निपट रहा है।' अदालत ने छात्रों से सिर्फ अनुरोध है कि वे फैकल्टी से जुड़ें, वरना उनका करियर बदल जाएगा। पूरा रुझान बदल जाएगा। उन्हें ऐसी चीजों में नहीं पड़ना चाहिए।

राज्य सरकार को नोटिस

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और कहा कि तीन हफ्तों के अंदर भर्ती प्रक्रिया के बारे में लिखित रूप में पूरी जानकारी दे। हर विभाग में कितने खाली पद हैं, उसका ब्यौरा भी बताए। भर्ती प्रक्रिया तेज गति से होनी चाहिए। एडवोकेट जनरल ने कहा कि अगली सुनवाई से पहले हलफनामा दाखिल किया जाएगा।

नागरिकों की परेशानी का मामला

कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें पुणे के अन्य नागरिकों की परेशानियों का ज़िक्र था। छात्रों ने मुख्य सड़कें ब्लॉक कर दी हैं, जिससे आम लोगों को आने-जाने में काफी दिक्कत हो रही है।
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कोर्ट ने आश्वासन दिया, 'जनता को असुविधा नहीं होनी चाहिए। जहाँ तक आपकी चिंता है, हम सुनिश्चित करेंगे कि भर्ती अभियान का ध्यान रखा जाए। और गड़बड़ी का ब्यौरा भी आएगा कि क्या किया गया है। हम अगली तारीख़ को सबकी जाँच करेंगे। तब तक हम सभी आंदोलनकारी पक्षों से अनुरोध करते हैं कि प्रदर्शन वापस लें और फैकल्टी से जुड़ें। अब मामला अदालत के सामने है।'
कोर्ट ने कहा, 'हम सभी पक्षों से अनुरोध करते हैं, यह शांतिप्रिय समाज है। यह शिक्षा हब है। देशभर में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि यह छात्रों के लिए उपयुक्त जगह नहीं है, वरना माता-पिता को भी आशंका होगी। कृपया कक्षाओं में शामिल हों। अगर विरोध करना है तो अनुमति लें, जगह ढूंढें और सुनिश्चित करें कि नागरिकों को कोई असुविधा न हो।' कोर्ट ने तीन हफ्तों के लिए सुनवाई स्थगित कर दी है। इस बीच राज्य सरकार को भर्ती प्रक्रिया का पूरा विवरण देना होगा।