बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में अब मेयर/महापौर कोई महिला ही बनेगी। यह पद महिला (ओपन कैटेगरी) के लिए रिजर्व किया गया है। लेकिन इसे लेकर तमाम विवाद हो गए हैं। जिस पर्ची या लॉटरी सिस्टम के जरिए, महिला के लिए आरक्षित किया गया, उसमें अनुसूचित जनजाति (एसटी) की पर्ची थी ही नहीं। इस प्रक्रिया को लेकर शिवसेना (यूबीटी) ने तीखी आपत्ति जताई है और इसे सत्ताधारी गठबंधन के पक्ष में 'फिक्स्ड' या तयशुदा बताया है। मुंबई की पूर्व मेयर और शिवसेना (यूबीटी) नेता किशोरी पेडनेकर ने लॉटरी प्रक्रिया में हुई धांधली को लेकर तमाम आरोप लगाए हैं। महाराष्ट्र की 28 अन्य नगर निगमों में भी महापौर पद के लिए लॉटरी निकाली गई। लेकिन सभी की नज़र बीएमसी पर के मेयर कुर्सी पर थी।
शहरी विकास विभाग की राज्य मंत्री माधुरी मिसल की अध्यक्षता में हुई इस लॉटरी में मुंबई को ओपन कैटेगरी में रखा गया, जहां पहले से ही महिला आरक्षण का प्रावधान लागू है। राज्य में कुल 17 महानगरपालिकाएं ओपन कैटेगरी में आईं, जिनमें से 9 में महिला महापौर होंगी। मुंबई के अलावा पुणे, पिंपरी-चिंचवड़ (पीसीएमसी), भिवंडी, धुले, नवी मुंबई, मालेगांव, नांदेड़ और मीरा-भायंदर में भी महिला महापौर नियुक्त होंगी।

ओबीसी आरक्षण वाली महानगरपालिकाओं में इचलकरंजी, अहिल्यानगर, कोल्हापुर, चंद्रपुर, जलगांव, अकोला, पनवेल और उल्हासनगर शामिल हैं, जिनमें से चंद्रपुर, इचलकरंजी, अकोला और जलगांव में ओबीसी से महिला महापौर होंगी। थाने और भिवंडी-निजामपुर में एससी कैटेगरी का महापौर चुना जाएगा।

बीएमसी मेयर को लेकर विवाद सामने आया

बीएमसी के मेयर को लेकर जब लॉटरी डाली जाने लगी तो शिवसेना (यूबीटी) की ओर से जबरदस्त आपत्ति हुई। क्योंकि पर्ची में एसटी कैटेगरी नहीं थी। मुंबई की पूर्व महापौर किशोरी पेडनेकर ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने एसटी (अनुसूचित जनजाति) कैटेगरी के नियम आखिरी समय में बदल दिए। उन्होंने कहा, "एसटी कैटेगरी के लिए न्यूनतम सदस्यों की संख्या की शर्त बदल दी गई। मुंबई को एसटी कैटेगरी में जानबूझकर नहीं रखा गया, क्योंकि सिर्फ शिवसेना-यूबीटी के दो पार्षद ही इस वर्ग से हैं।" उन्होंने दावा किया कि यह सब सत्ताधारी गठबंधन को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया।


पेडनेकर ने कहा- “मुंबई में कई ऐसे इलाके हैं जहां ओबीसी समुदाय रहता है। हालांकि, लॉटरी में उनके प्रतिनिधियों के नाम वाली कोई पर्ची शामिल नहीं की गई। यह गलत और अस्वीकार्य है।” पेडनेकर ने वॉकआउट के बाद आरोप लगाया कि ड्रॉ 'पूर्व निर्धारित इरादे' से आयोजित किया गया था और इसे 'ओबीसी और एसटी के साथ अन्याय' बताया।
मुंबई की पूर्व मेयर ने कहा- “ओबीसी समुदाय के साथ अन्याय हुआ है। हम लॉटरी प्रणाली की कड़ी निंदा करते हैं। यह प्रक्रिया जानबूझकर निष्पक्ष प्रतिनिधित्व से वंचित करने के लिए बनाई गई थी।” उन्होंने कहा कि विपक्ष इस फैसले का विरोध जारी रखेगा।
शिवसेना यूबीटी ने कहा कि सरकार ने एसटी वर्ग से न्यूनतम सदस्यों (कॉरपोरेटरों) की संख्या की शर्त को संशोधित कर दिया। उदाहरण के लिए, कम से कम तीन एसटी कॉरपोरेटरों की जरूरत वाली शर्त जोड़ी या बदली गई। यह बदलाव जानबूझकर किया गया ताकि मुंबई एसटी कैटेगरी में न आए। पार्टी का कहना है कि एसटी वर्ग से सिर्फ शिवसेना (यूबीटी) के पास ही दो कॉरपोरेटर हैं। न्यूनतम सीमा बढ़ाकर (जैसे तीन) मुंबई को एसटी आरक्षण से बाहर रखा गया, जिससे शिवसेना (यूबीटी) का महापौर बनना असंभव हो गया। यह सत्ताधारी महायुति गठबंधन (बीजेपी-शिवसेना शिंदे गुट + सहयोगी) को फायदा पहुंचाने की साजिश है।

लॉटरी पूरी तरह से पूर्व-निर्धारित ("pre-decided lottery") और धांधली वाली ("rigged") थी। पारदर्शिता की कमी थी और सरकार ने नए नियमों को बिना सूचना दिए लागू किया। कुछ बयानों में उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पिछले दो कार्यकाल (2017 और 2019) में ओपन कैटेगरी होने के बावजूद इस बार ओबीसी कैटेगरी क्यों नहीं लगाई गई, जिससे ओबीसी महिलाओं के साथ अन्याय हुआ। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने भी इसे "फिक्स्ड" और अपारदर्शी बताया।
वहीं, राज्य मंत्री माधुरी मिसल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार ने सभी आपत्तियों पर ध्यान दिया, लेकिन शिवसेना (यूबीटी) के दावे बेबुनियाद हैं। उन्होंने कहा, "पार्टी को केवल वही आरक्षण चाहिए था जो उनके अनुकूल हो। प्रक्रिया नियमों के अनुसार पूरी की गई है।"

आरक्षण लॉटरी के बाद बीएमसी हाउस की विशेष बैठक बुलाई जाएगी, जहां महापौर चुनाव की तारीखों की घोषणा होगी। चुनाव संभवतः 28 या 29 जनवरी के आसपास हो सकता है। यह प्रक्रिया महाराष्ट्र में महानगरपालिका कानून के तहत रोटेशन सिस्टम के अनुसार की जाती है, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी और महिला वर्गों के लिए बारी-बारी से आरक्षण तय होता है।

बीएमसी 15 जनवरी को हुए थे। ये चुनाव शहर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए। लगभग 30 वर्षों में पहली बार उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने नगर निकाय पर अपना लंबे समय से चला आ रहा वर्चस्व खो दिया। 16 जनवरी को घोषित अंतिम परिणामों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि उसकी सहयोगी, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीटें मिलीं।