बोलने की आज़ादी पर पाबंदी लगाए जाने के आरोप पहले से ही झेल रही सरकार ने अब मीडिया पर सेंसरशिप लगाने की नयी पहल शुरू कर दी है। केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोमवार को सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 में बड़े बदलावों का प्रस्ताव जारी किया है। जानकरों का कहना है कि ये बदलाव बोलने-लिखने की आज़ादी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर गहरा असर डाल सकते हैं। इन प्रस्तावित संशोधनों पर आम लोगों से 14 अप्रैल तक सुझाव मांगे गए हैं। यानी सुझाव व आपत्ति के लिए सिर्फ़ 15 दिनों का समय दिया गया है। क्या यह समय काफ़ी है या जानबूझकर कम रखा गया है ताकि लोगों की आपत्ति कम से कम आ पाए?

क्या हैं बड़े बदलाव?

सरकार ने जो प्रस्ताव दिए हैं उनमें चार बड़े बदलाव शामिल हैं। सरकार के निर्देशों का पालन अनिवार्य होगा। न्यूज़ और करंट अफेयर्स पर ही नहीं अब आम यूज़रों व फे़सबुक, ट्विटर जैसे इंटरमीडियरी पर भी नजर रहेगी। इंटर-डिपार्टमेंटल कमिटी की ताक़त बढ़ेगी। और डेटा रखने की अवधि बढ़ सकती है।

सरकार के निर्देशों का पालन अनिवार्य

अब फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर जैसे इंटरमीडियरी को मंत्रालय द्वारा जारी किसी भी स्पष्टीकरण, एडवाइजरी, दिशा-निर्देश या एसओपी का पालन करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया तो उन्हें क़ानूनी कार्रवाई से राहत का फायदा नहीं मिलेगा। इसके तहत ये प्लेटफॉर्म यूजरों द्वारा पोस्ट की गई गलत सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराए जाते हैं और उनको मुक़दमे जैसी क़ानूनी उलझनों से छूट मिलती है।

आम यूजरों, इंटरमीडियरी पर भी नज़र

सूचना और प्रसारण मंत्रालय की निगरानी अब सिर्फ बड़ी न्यूज वेबसाइट्स तक ही नहीं, बल्कि आम यूजरों और इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स पर भी रहेगी। जो लोग ऑनलाइन न्यूज या करंट अफेयर्स से जुड़ी पोस्ट शेयर करते हैं, वे भी इस निगरानी के दायरे में आ सकते हैं।

इंटर-डिपार्टमेंटल कमिटी की ताक़त बढ़ेगी

पहले यह कमिटी सिर्फ शिकायतें सुनती थी। अब यह किसी भी 'मामले' पर सुनवाई कर सकती है, जो सरकार खुद भेजे। यानी इस कमेटी का दखल अब कोई भी मामला सामने आने पर बढ़ सकेगा। इससे सेंसरशिप का दायरा बहुत बढ़ सकता है।

डेटा रखने की अवधि बढ़ सकती है

यूजरों का डेटा अब और लंबे समय तक रखना पड़ सकता है, जो निगरानी के जोखिम को बढ़ा सकता है।

क्यों हो रही है चिंता?

संविधान का उल्लंघन? ये बदलाव 2015 के श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन कर सकते हैं, जिसमें कहा गया था कि सरकार बिना कोर्ट आदेश के सामग्री हटाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

मौजूदा स्टे ऑर्डर दरकिनार? बॉम्बे हाईकोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट ने 2021 के कोड ऑफ़ इथिक्स से जुड़े कुछ नियमों पर रोक लगा रखी है। नए बदलाव इन रोकों को घुमाकर लागू करने की कोशिश लग रहे हैं।

ओवर-सेंसरशिप का डर है। नये बदलाव के बाद प्लेटफॉर्म खुद को सुरक्षित रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा सामग्री खुद-ब-खुद हटाने लगेंगे, खासकर सरकार की आलोचना, पैरोडी या सटायर वाली पोस्ट्स। इसके अलावा सरकार को असीमित पावर मिलने की आशंका है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय बिना पारदर्शिता के कोई भी निर्देश जारी कर सकता है, वह भी उस मामले में भी जिसका कोई क़ानूनी आधार साफ़ नहीं हो।

डिजिटल अधिकार संगठनों की प्रतिक्रिया

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन यानी आईएफ़एफ़ जैसे संगठनों ने तुरंत इन संशोधनों को वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि ये बदलाव डिजिटल तानाशाही की ओर ले जा रहे हैं। वे चाहते हैं कि अदालतें इन चुनौतियों पर फ़ैसला दे दें और सरकार संसद के ज़रिए क़ानून लाए, न कि नियमों से।

क्या कहते हैं सरकार के समर्थक?

सरकार का पक्ष यह है कि ये बदलाव सिर्फ स्पष्ट करने और प्रक्रिया सुधारने के लिए हैं, ताकि ग़लत सूचना, डीपफेक और अवैध सामग्री पर बेहतर नियंत्रण रहे। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या इतने कम समय 15 दिन में इतने अहम बदलावों पर सही चर्चा हो पाएगी? क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी को और सीमित करने की नई कोशिश नहीं है?

क्या होगा आगे?

यह मसौदा अभी सिर्फ प्रस्तावित है। आम लोगों, संगठनों और हितधारकों से फीडबैक लेने के बाद सरकार अंतिम फैसला लेगी। लेकिन डिजिटल दुनिया में यह बहस पहले से ही गरम हो गई है। एक तरफ सरकार ऑनलाइन सुरक्षा और जवाबदेही की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ डिजिटल अधिकार एक्टिविस्ट सेंसरशिप और सरकारी नियंत्रण की चिंता जता रहे हैं। ये अब इन प्रस्तावों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। क्या सरकार इन सुझावों को ध्यान में रखकर संशोधन वापस लेगी या और सख्ती करेगी?