आप अक्सर पहले इस तरह की खबरें अखबारों में पढ़ते थे कि एक महिला के साथ किसी ने बलात्कार किया। तब अपराधी एक व्यक्ति होता था। फिर आपने इस तरह की खबरें भी पढ़ीं कि एक महिला के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार किया। इस तरह अपराध का स्वरूप बदला और सामूहिक बलात्कार होने लगे। फिर इस तरह की खबरें आने लगीं कि सामूहिक बलात्कार के बाद अमुक पीड़िता की हत्या कर दी गयी।
यह नए किस्म का अपराध था जिसमें पीड़िता की हत्या भी होने लगी।
देश की एक प्रतिष्ठित संवाद समिति यूएनआई के साथ इसी तरह का हादसा हुआ।यह पत्रकारिता की पीड़िता थी। पहला हादसा संयुक्त मोर्चा सरकार में हुआ जब यूएनआई मात्र 32 करोड़ में ज़ी के हाथों  गैर कानूनी तरीके से बिक गयी। क्योंकि इसकी जमीन पर उद्योगपतियों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी थी। नरेश मोहन को लगा कि ज़ी को बेचकर पैसे कमाए जा सकते हैं। तब कॉरपोरेट मंत्रालय के मंत्री प्रेमचन्द गुप्ता थे जो लालू की पार्टी के थे। यानी पहली बार बलात्कार उस जमाने मे हुआ और यहीं से संकट शुरू हुआ। यूएनआई के बिकने की पहली खबर लालू यादव ने पीटीआई यूनियन के एक नेता को दी थी।
ZEE कम्पनी के विरोध में आनंद बाजार पत्रिका कम्पनी लॉ बोर्ड में गयी और सुभाष चन्द्र मुकदमा हार गए। आनंद बाजार का शेयर 26 प्रतिशत था जबकि सुभाष चन्द्र ने 51 प्रतिशत शेयर खरीद लिया। आनंद बाजार पत्रिका ने इसे कम्पनी ला बोर्ड में चुनौती दी और बोर्ड ने फैसला सुनाया की ज़ी ने गैरकानूनी तरीके से शेयर खरीदे हैं । ज़ी ने मुकदमा हारने के बाद अदालत से बाहर आनंद बाजार पत्रिका से समझौता किया और अपने पैसे वापस मांगे। उस समय यूएनआई की एफडी टूटी। यहीं से यूएनआई का आर्थिक संकट शुरू हुआ।
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यूएनआई के साथ दूसरा बलात्कार तब हुआ जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मामले में दिलचस्पी नहीं दिखाई। यूएनआई का एक शिष्टमंडल डॉक्टर सिंह से मिला ।कुछ दिन के बाद ज़ी के मालिक सुभाष चन्द्र ने मनमोहन सिंह से भेंट करके उन्हें भरमाया जिसका नतीजा यह हुआ कि  सरकार ने इस मामले में कोई दिलचस्पी  नहीं दिखाई और यूएनआई का संकट जारी रहा। इस विवाद से द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया ने निदेशक मंडल से इस्तीफा दे दिया। आनंद बाजार पत्रिका भी यूएनआई के संकट को सुलझा नहीं पाया। यह न्यूज़ एजेंसी चलती रही। पत्रकारों के वेतन अनियमित हो गए पर लोग काम करते रहे। कई साल आंदोलन चला। सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने भाषण दिए। संसद में तीन बार सवाल उठे पर सरकार चुप बैठी रही।
इसके साथ तीसरा बलात्कार मोदीं सरकार ने किया जब प्रसार भारती ने अपनी सेवा काट ली। सात करोड़ रुपए वार्षिक मिलते थे वे बन्द हो गए। फिर सरकार उर्दू सेवा को मिंलने वाले 50 लाख हर माह भी बन्द कर दिए। जबकि उसने हिंदुस्तान समाचार को 7 करोड़ देकर न्यूज़ लेना शुरू किया । नतीजा यह हुआ कि सरकार ने इस संस्था के हाथ पांव काट लिए। इस तरह मोदीं सरकार ने बलात्कार के साथ हत्या तब कर दी जब उसने 9 रफी मार्ग खाली कराने का नोटिस थमा दिया।
जब यह संवाद समिति संकट में थी तब अपनी इमारत कैसे बनाती। क्या सरकार कोई सॉफ्ट लोन नहीं दे सकती थी जैसे वह बेलआउट पैकेज देती है। एयरलाइन्स को भी दिया। सच पूछिए तो वह चाहती नहीं  थी कि देश मे दो संवाद समिति रहे क्योंकि ये एजेंसियां गोदी मीडिया नहीं हैं। ये ऑब्जेक्टिव खबरें देती हैं। पीटीआई ने यूएनआई की तालाबंदी की खबर दी पर गोदी मीडिया नहीं देगा।  पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यूएनआई की स्थापना की थी क्योंकि वे दो संवाद समिति देश मे चाहते थे क्योंकि एकाधितार न हो। मोदीं तो यह पसंद नहीं क्योंकि यूएनआई से विपक्षी दलों की खबरें भी जाती रही हैं।

UNI एएनआई की तरह निजी एजेंसी नहीं थी और मोदी समर्थक नहीं थी जबकि इसमें काम करने वाले कई लोग मोदी के समर्थक थे।

हाई कोर्ट ने गलत तर्क दिया कि यूएनआई का स्वरूप बदल गया था। वह निजी संस्था हो गयी थी।आखिर कंपनी लॉ बोर्ड ने रेसोलुशन प्रोसेस शुरू किया था । इसलिए यह बदलाव कानून सम्मत था। हाई कोर्ट ने कम्पनी लॉ बोर्ड के फैसले को नहीं सही माना।पर यह संस्था अपने आप नहीं बदली। इसके बदलाव का कानूनी आधार था।
सरकार चाहती तो यूएनआई के लोगों से बातचीत कर यह समस्या सुलझती क्योंकि कम्पनी दिवालिया हो गयी थी। अखबारों में यूएवआई सील होने की जो ख़बर आई उसमें इसके वास्तविक संकट को नहीं समझा गया। सबने अधूरी भ्रामक खबरें दी। पत्रकार बिना मेहवच करे बिना जाने बिना पता लगाएं खबरें देते हैं।
यूएनआई में जो कुछ हुआ वह नयी आर्थिक नीति, कॉरपोरेट लापरवाही भ्रष्टाचार और सरकार की उदासीनता और यूएनआई के टॉप अधिकारियों के गैर जिम्मेदार आचरण के कारण हुआ और हाई कोर्ट पुलिस की क्रूरता के कारण।

जब लेबर कोर्ट ने कर्मचारियों की बाकी ग्रैच्युटी देने का आर्डर दिया तो वह लागू क्यों नहीं हुआ।कानून के तहत मालिक की कुर्की गिरफ्तारी का प्रावधान है।तब दिल्ली पुलिस ने कोर्ट का आर्डर क्यों नहीं लागू किया।आज वह अदालत का आदेश लागू करने चली है। UNI संकट के मामले में पिछली और वर्तमान सरकार अदालत और पुलिस सबकी संवेदन हीनता नजर आई।
मीडिया से और खबरें
अगर प्रेमचन्द गुप्ता ने ज़ी को बेचने नहीं दिया होता तो यह दिन देखने को नहीं मिलते। मोदीं सरकार ने प्रसार भारती की सेवा काटकर कब्र में आखिरी कील ठोंक दी और अदालत के फैसले की आड़ में तालाबन्दी कर दी।
आज 250 कर्मचारियों का भविष्य खतरे में हैं। UNI एक विकलांग संवाद समिति के रूप में अभी भी काम कर रही है। इसके कर्मचारियों ने बिना वेतन के दस साल तक जिंदा रखा और आज भी खबरें जा रही हैं।