शायर तो आगे की दुनिया पढ़ ही लेता है। और दर्ज कर लेता है अपनी शायरी में। तो बशीर साहब ने पढ़ लिया हो शायद। जाती याददाश्त के साथ दुनिया की जो बेरूखी देखी। वो इस मुकाम तक लाएगी ये भले अंदाजा नहीं होगा उन्हें। बशीर साहब के मशहूर शेर की एक लाइन जैसे उनके आखिरी दिन की बयानी हो गई। इक ज़रा वफा कम है तेरे शहर वालों में। शायर नहीं होकर भी सबकुछ कह देता है ना। तो कह रहे थे बशीर साहब वफा कम है। वफा होती तो अपने महबूब शायर को अलविदा कहने ये शहर बशीर मंज़िल तक आया होता।

भोपाल में बशीर साहब का स्थाई पता थी ये बशीर मंज़िल। वफा होती तो जिनके शेर उठा उठा कर गा कर सुना कर चुनाव जीतते रहे नेता। वो दो बरस बाद आ रहे चुनाव की गरज़ से सही अपने शहर में रह रहे इस मकबूल शख्सियत को अलविदा कहने अपना काफिला उस गली तक लाते. . .।
डिमेंशिया ने तो बशीर साहब की याददाश्त पर असर छोड़ा था। डिमेंशिया से तो उनका ज़हन कमजोर हुआ था। बाकी दुनिया की याददाश्त को क्या हुआ भला। या सहुलियत की संवेदनाओं का रास्ता देख चुके समाज में अब उम्मीद बेमानी है।
 
ये कैसा समाज बना रहे हैं हम कि जिसमें सोशल मीडिया पर सादर नमन… और तीन तस्वीरों के साथ दो शेर चस्पा कर देने से शायर की याद पूरी हो जाती है। वैसे तो जब से डिमेंशिया ने घेरा और जबसे मुशायरों से दूर हुए बशीर बद्र, मुशायरे लूट लेने वाले इस शायर से दुनिया ने तभी से दूरियाँ बना ली थीं। बशीर साहब अपने एक शेर में इन्हें मतलबों के सलाम कहते हैं। इन सलामों की उम्र छोटी रही।
श्रद्धांजलि से और ख़बरें
पूरी दुनिया में जिस शायरी के अलविदा कहने पर ईद मीठी नहीं रही। उस शायर के आखिरी सफर में गिनती के लोग जुटे। पूरी उम्र मोहब्बत लुटाने वाला शायर तो आज भी मोहब्बत देकर गया है। मोहब्बत के वो अल्फ़ाज जो हर मौके हमें अपने जज्बात की बयानी में हमें सहारा देते रहेंगे। हमें सोचना है कि हमने उस मोहब्बत के बदले क्या दिया।

बशीर साहब का ही शेर है-

कहाँ अब दुआओं की बरकतें, वो नसीहतें, वो हिदायतें
ये ज़रूरतों का खुलूस है, वो मतलबों के सलाम हैं!
हां, वो मतलबों के सलाम थे।