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चुनाव के 'ग्रामर' को कैसे बदल दिया टी. एन. शेषन ने?

टी. एन. शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनते ही जिन सुधारों का एलान किया और जिस सख़्ती से उन्हें लागू करवाया, उसने भारतीय राजनीति की दश दिशा बदल दी। शेषन ने रविवार को अंतिम सांसें लीं। जानिए, उन्होंने किस तरह भारत के चुनावों को बदल कर रख दिया।
हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार 1990 में लोगों को अहसास हुआ कि इस देश में चुनाव आयोग जैसी कोई संस्था भी है, जिसके पास कोई ताक़त भी है और वह स्वतंत्र तौर पर काम कर सकती है। वर्ना अन्य सरकारी एजेंसियों की तरह यह भी एक सरकारी एजेंसी की तरह है , ऐसी धारणा आम लोगों के मन में सहज रूप से विद्यमान थीं।
टी. एन. शेषन ने जब 12 दिसंबर 1990 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार ग्रहण किया था, तो उनके सामने दो रास्ते थे। आयोग जिस ढर्रे पर चल रहा था, उसे वैसा ही चलने देते, अपनी सैलरी उठाते, अवकाश ग्रहण करने के बाद सरकारी प्रसाद के रूप में राज्यपाल, आयोग के चेयरमैन बनकर जीवन भर सरकारी गाड़ियाँ, बंगला और आवास सहित अन्य सुविधाएँ उठाते।  
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 शेषन होने का मतलब!

शेषन के महत्व को समझने के लिए देश के तत्कालीन चुनावी तंत्र और प्रक्रियाओं को समझना बहुत प्रासंगिक होगा, ख़ास कर उत्तरी भारत के राज्यों में मौजूद चुनावी प्रक्रियाओं में व्याप्त खामियाँ। उन दिनों के अख़बार आम चुनावों के समय बूथ लूट, व्यापक हिंसा, बूथों पर बमबारी आदि ख़बरों से भरे होते थे। ये आम बात थीं। सरकारी संरक्षण में सरकारी गुंडे, प्रशासनिक अधिकारी मिलकर इन कुकृत्यों को अंजाम दिया करते थे। 
यह कहना ग़ैरवाजिब नहीं होगा कि बूथ लूट की संस्कृति को कांग्रेस ने शुरू किया था, ख़ास कर इंदिरा गाँधी के समय से इस संस्कृति को खूब बढ़ावा मिला और कांग्रेस ने इसका खूब फ़ायदा उठाया और कई राज्यों में इसने सरकारें भी बनायीं। 80 के दशक के उत्तरार्ध में यह भयावह रूप ले चुका था। बिहार की बात करें तो यह कहना ग़ैर मुनासिब न होगा कि पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने भी इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया और कई वर्षों तक सत्ता सुख का लुत्फ़ उठाया। बाद में जब मंडल आंदोलन का आगाज हुआ तो उत्तर भारत के कई राज्यों में ग़ैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ इस तथ्य के बावजूद कि बूथ लूट और चुनावी हिंसा जारी रही। 

कैसे बदला समीकरण?

मास वोटों का कांग्रेस से विलगाव, मुसलिमों का कांग्रेस से मोहभंग होना और मंझोली जातियाँ आनी अन्य पिछड़ी जातियाँ जो कभी कांग्रेस के लिया लठैती करती रही रही थी, जातीय खेमों में बँटकर क्षेत्रीय दलों की तरह मुड़ चुकी थीं। 
जो कल तक कांग्रेस के लिए बूथ लूटते थे , वे अब राजद, सपा, बसपा में जाति के नाम पर टिकट पाकर चुनाव लड़ने लगे और कभी विधायक प्रतिनिधि बनकर संतोष कर लेने की जगह अब खुद विधायक बनने लगे। ऐसे एकाध लोग नहीं थे बल्कि सैकड़ों की संख्या में थे।

बूथ-लूट जारी रहा?

लेकिन इस सबके बीच उस बूथ लूट की संस्कृति का क्या हुआ ? इसका उत्तर यह है कि यह अनवरत जारी रहा। लेकिन इसके स्वरूप और दिशा में तबदीली आयी। अब यह एकतरफा नहीं रहा। पिछड़े वर्ग के लोग, खासकर यादव, कुर्मी और दबदबा रखने वाली अन्य जातियाँ जो कांग्रेस, कम्युनिस्ट और अन्य दलों में विभाजित रहती थीं, जाति के नाम पर गोलबंद होती गयी और अपने - अपने दबदबे वाले क्षेत्रों में अपनी जाति के उम्मीदवारों के लिए पोलिंग बूथ पर आक्रामक रूप से वोट कराने लगी। जहाँ मौका मिला, वहाँ वोटिंग में ज़बरदस्ती भी की और अपने दलों ( राजद , तत्कालीन जनता दल ) के लिए बूथ भी छापती थीं।
बूथ लूट के कई स्वरूप होते हैं। उदाहरण के लिए कोई यादव बहुल गाँव यदि है तो स्वाभाविक है कि जनता दल या लालू यादव के समर्थक की तादाद अधिक है, इसलिए वहाँ लालू यादव को अतिरिक्त मेहनत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। गाँव के लोग एकमत होकर वोट गिरा लेते थे, भले ही कोई वोटर उस दिन वहाँ मौजूद हो या न हो। लेकिन जहाँ सवर्ण वोटर्स अधिक होते थे और पिछड़ों के वोट कम होते थे, असल परिवर्तन वहाँ हुआ। सवर्ण गुंडे पहले अपने गाँव, मोहल्ले के सभी पिछड़ों के वोट गिरा लेते थे, वहाँ उन्हें चुनौती मिलने लगी। 

क्या हुआ बिहार में?

आरोपों - प्रत्यारोपों के बीच बिहार विधानसभा का चुनाव होना था और टी. एन. शेषन के सामने निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौती थी। उधर पदभार ग्रहण करने के साथ ही शेषन ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे कि वह सरकारी रबड़ स्टाम्प बनकर रहने वालों में से नहीं है। 

शेषन के बारे में कई लोकोक्तियाँ आज भी प्रचलित हैं। उन्होंने एक बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि वह नाश्ता में पॉलिटिशियन खाते हैं। यानि जब भी कोई नेता चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करता पाया जाता था, उनको एक्शन लेने में सेकंड भी नहीं लगते थे। चुनावी हिंसा और बूथ लूट के लिए कुख्यात बिहार विधानसभा चुनाव भी उनके लिए पहाड़ को लांघने जैसी चुनौती से कम नहीं थीं।

कई चरणों में चुनाव

पहली बार बिहार विधानसभा एक से अधिक चरणों में कराने का निर्णय लिया गया। लोगों ने पहली बार विधानसभा चुनाव में आरएएफ़, बीएसएसफ़, सीआरपीएफ़, सीआईएसएफ की बटालियन को गाँव - गाँव, चप्पे -चप्पे पर तैनात देखा। हर आदमी की जुबान पर टी. एन. शेषन का नाम चढ़ चुका था। ऐसा लग रहा था कि शेषन बनाम लालू यादव हो रहा है। लालू यादव अक्सर अपनी सभाओं में शेषन पर आलोचनात्मक अंदाज में बोलते थे कि शेषन कुछ भी कर ले, मतपेटियों से जिन्न निकलेगा और हम भरी बहुमत से सरकार बनाएंगे।
ऐसा भी नहीं था कि शेषन लालू के विरोध में या किसी दुर्भावना से यह सख्ती बरत रहे थे, उनकी छवि हमेशा से ईमानदार और सख्त अफसर की रही थी। इस सख्ती का परिणाम भी साफ़ देखने को मिला। राज्य में ऐसी बूथ की संख्या हज़ारों में थी जहाँ दलित - हरिजन वर्ग के लोग आज़ादी के बाद से पहली बार वोट डाल रहे थे। अब तक उनका वोट सवर्णों और अन्य दबंग जातियों के लोग डाल देते थे।

निष्पक्ष चुनाव, कम हिंसा!

शेषन ने अपना काम बखूबी कर लिया था। बिहार में पहली बार निष्पक्ष चुनाव करवाया जा सका था वह भी बिना अधिक हिंसा के। कहीं -कहीं थोड़ी गड़बड़ी ज़रूर हुई थी लेकिन वह इतनी कम थी कि इतने बड़े राज्य में इसे नगण्य ही कहा जा सकेगा। 
जब चुनाव संपन्न हुए और मतगणना की बारी आयी तो इस निष्पक्ष चुनाव के नतीजे आशा के अनुरूप ही आये। लालू यादव ने अपने राजनैतिक जीवन की सबसे बड़ी जीत हासिल की थीं और उनकी बात सच निकली कि मतपेटियों से जिन्नात निकलेंगे।
ऐसा होना लाज़िमी था क्यूँकि तब तक लालू यादव जाति के नहीं जमात के नेता थे और सारा पिछड़ा - अल्पसंख्यक - मुलिम वोटरों ने जमकर उनके पक्ष में आक्रामक वोटिंग की। कई विधानसभा के इतिहास बदल गए। आजादी के बाद से दर्जनों सीटों को कभी न हारने वाली कांग्रेस कई सीटों पर धराशायी हो गयी।
भारी और ऐतिहासिक जीत के बाद लालू यादव को शेषन ने बधाई दी और करिश्माई नेता कहा। आज शेषन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिंदुस्तान में चुनाव सुधारों के लिए वह हमेशा याद किये जायेंगे।
लालबाबू ललित
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