पद्म विभूषण तीजन बाई के जीवन और उनके संघर्षों की कहानी। उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोककला 'पंडवानी' को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई। पढ़िए, डॉ. सुधीर सक्सेना उनको कैसे याद करते हैं।
लोक गायिका तीजन बाई का निधन
अभी खबर मिली कि तीजन बाई नहीं रहीं। तत्क्षण मेरे जेहन में बरसों पहले की उनसे हुई मुलाकात कौंध गयी। सर्द दिसंबर 1978 की एक शांत शाम थी, जब रायपुर की गुढ़ियारी बस्ती में अंधेरा धीरे-धीरे उतर रहा था। हल्की रोशनी में सिमटी उस बस्ती के किनारे एक साधारण तंबू खड़ा था, जिसके भीतर सीमित साधनों के बीच एक असाधारण व्यक्तित्व अपनी पहचान गढ़ रहा था। उसी छोटे से डेरे में पहली बार एक ऐसी लोक कलाकार से मुलाकात हुई, जिसने आगे चलकर पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया—वह थीं तीजन बाई।
हम एक श्यामल बरन अच्छे सौष्ठव की, पांच फुट से कुछ इंच ऊपर कद की खुशमिजाज महिला के अस्थायी डेरे पर थे। महिला की आंखों में बला की चमक थी और बात करते हुए वह जब-तब और तीक्ष्ण हो जाती थी। उसके होंठ पान की पीक से लाल थे और दांतों के किनारों पर लाल लकीरें थीं। जाहिर था कि वह पान की शौकीन हैं। जिस चीज ने सबसे पहले आकर्षित किया, वह था उसका गजब का आत्मविश्वास। झिझक से उसका वास्ता न था। याद पड़ता है कि वह चटख लाल रंग की साड़ी पहने थीं, बेमेल ब्लाउज के साथ। चटख बिंदी। चांदी के थोड़े से आभूषण। करीने से काढ़े हुए केश। वह हंसतीं तो उसके दांत चमकते थे और साथ ही चमकता था उसका बिंदासपन। कोई बात काबिले-दाद होती तो वह बखुद अपनी जांघ पर थाप देकर आनंदित हो लेती थी।
तीजन बाई का ‘कांफिडेंस-लेवल’ औसत से काफी ऊंचा था
तंबू में खटिया पर सामने बैठी इस साधारण छत्तीसगढ़िया औरत का ‘कांफिडेंस-लेवल’ औसत से काफी ऊंचा था और वह बातचीत में बरबस छलकता था। वही हुआ। देखते ही देखते वह लोककला के परिदृश्य में छा गयीं। उसने सरहदें लांघी और उसकी ख्याति ने दिशायें। एक दशक के भीतर वह सेलिब्रिटी थी। सन् 1988 में उसे पद्मश्री से नवाजा गया। फिर तो पदकों की झड़ी लग गयी। यह वह स्त्री थी, जिसने आकाशवाणी से बतौर पारिश्रमिक पहला चेक लिया तो पावती में हस्ताक्षर न कर अंगूठा लगाया था। उस रात गुढ़ियारी में पहला दफा रूबरू हुई यह स्त्री थी तीजन बाई।
2019 में मिला पद्मविभूषण
वह आज हमारे बीच नहीं हैं। वह 70 साल की थीं। उनकी ख्याति भी लंबा सफर तय कर चुकी है। सन् 2003 में उन्हें पद्मभूषण मिला और सन् 2019 में भारत के महामहिम राष्ट्रपति के हाथों पद्मविभूषण। पद्म पुरस्कारों से उनका सम्मान उस लोक कला का भी सम्मान है, जिसे उन्होंने तमाम तकलीफें उठाकर निबाहा। रायपुर में गुढ़िायारी में सर्द दिसंबर में लालटेन की धुंधली रोशनी में लिया गया वह इंटरव्यू उनकी जिंदगी का पहला साक्षात्कार था। इस इंटरव्यू के निमित्त बने थे लोककला मर्मज्ञ निरंजन महावर। इंटरव्यू ‘नवभारत’, रायपुर में छपा था। उसकी कतरन मेरी बेतरतीब फाइलों के जखीरे में कहीं सुरक्षित है। जस की तस तो नहीं, मगर उसकी कही कुछ बातें स्मृति में हैं।तीजन बाई की संघर्ष गाथा
तीजन का जन्मगांव इस्पात नगरी भिलाई से कुछ दूर है। जीरोमाइल से 14 किमी दूर गनियारी को अब भिलाई में ही मानिये। पिता चुनुक लाल। मां सुखमती। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी। जाति की पारधी। उस अंत्यज समाज की जो मूलत: राजपूत समाज से संबद्ध होने के बावजूद जनजातियों में परिगणित है और आखेट तथा पक्षियों को पकड़ने के लिए जानी जाती है। पारधी परिन्दों को पकड़ने के लिए भांति-भांति के जाल या फंदे बुनने में निपुण होते हैं। बहरहाल महाराष्ट्र-गुजरात की अपेक्षा छत्तीसगढ़ में इनकी आबादी कम है। कई दशकों तक जरायमपेशों में शुमार पारधी अब घुमंतू जनजाति है। वे झाड़ू-चटाई, टोकरी आदि अच्छी बना लेते हैं।विडंबना देखिये कि जब जात-बाहर विवाह के कारण तीजन पारधी-समाज से निष्कासित हुईं तो यही पेशा गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर बर्तन-नाज-मांग-मूंगकर जीवनयापन में उसके काम आया, मगर यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रही।
कला ने उन्हें दो जून की रोटी दी, नौकरी दी, सम्मान और प्रतिष्ठा दी और उन्हें उस पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां तक पहुंचना विपन्न और हत्भाग्य पारधियों के लिए ख्वाब में भी दूभर था।
पंडवानी विरासत में मिली
तीजन को पंडवानी विरासत में मिली। मातृकुल से। उनके नाना बृजलाल पारधी पंडवानी कहते थे कि बालपने में तीजन ने नाना से पंडवानी सुनी और वह उसे कंठस्थ हो गयी। तेरह की वय में समीपवर्ती गांव चंदखुरी में उन्हें पहली बार पंडवानी गायन का मौका मिला। दक्षिणा या चढ़ावे में मिले दस रुपये उनकी पहली कमाई थी। सवर्ण, विशेषत: ब्राह्मण रुष्ट हुए कि एक तो स्त्री और फिर पारधी होकर पवित्र कथा का वाचन। विरोध, लांछन, वर्जना का दौर चला। तीजन में हठ भी था और भगवान कृष्ण में अटूट भक्ति भी। वे उसके स्वप्न में आते थे। जीवन कष्टों से बिंधा था। पहले पति से अलग हुईं। दूसरा पति जालिम निकला। वह अक्सर उनकी पिटाई करता था। तीजन ने पीड़ा-प्रताड़ना सही लेकिन पंडवानी नहीं छोड़ी। पंडवानी में ही उनकी मुक्ति थी, पीड़ा से भी, दैन्य से भी, वर्जनाओं से भी। पंडवानी ही उन्हें स्याह बोगदे के बाहर उस ठौर ले गयी, जहां खुली हवा थी, रोशनी थी और उन्हें सराहती हुई एक बड़ी दुनिया थी।
पुरुषों के वर्चस्व वाले पंडवानी क्षेत्र मं झंडा गाड़ा
कला कोई भी हो, वह तैयारी या रियाज मांगती है। तीजन ने अपने को तैयार किया, मांजा या परिष्कृत किया और सबसे बढ़कर उसे नवाचारित भी किया। सबलसिंह चौहान की छत्तीसगढ़ी महाभारत कंठस्थ करने के बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से विधिवत प्रशिक्षण लिया। पंडवानी पुरूषों के वर्चस्व का क्षेत्र था। बैठकर वाचन की वेदमती शैली उनके उपयुक्त थी, लेकिन तीजन ने इसकी विलोम कापालिक शैली चुनी। अब देखो तो लगता है कि तीजन का चयन सही था। कापालिक शैली में खड़े-खड़े ‘महाभारत’ गायी जाती थी। तबला, खड़ताल, ढोलक, मंजीरा, हार्मोनियम जैसे इने-गिने वाद्य। साथ में तंबूरा। तीजन का बदन दोहरा है। आवाज थोड़ी कर्कश। कहें तो थोड़ा मर्दानापन। तंबूरे से वह कई प्रयोजन साधती हैं। वह अर्जुन का बान है और भीम की गदा भी। तीजन वाचिक को आंगिक अभिनय से निखार देती है। माहौल के मुताबिक शब्द चयन में थोड़ा हेरफेर। वह गायन, नृत्य, प्रलाप, वादन, संवाद और अभिनय से अपना ‘डोमेन’ रचती है और दर्शकों को बांध लेती हैं। चीरहरण और दु:शासन वध उसके प्रिय प्रसंग हैं। उसकी बुलंद आवाज और मंच पर तीव्र पदाघात अलग रस की वृष्टि करते हैं। वह खूब जानती है कि मंच पर नाटकीयता का निर्वाह कैसे किया जाता है।
तीजन निरक्षर थीं। बड़े-बड़े हरूफ में दस्तखत करना उन्होंने सीख लिया। अनपढ़ होने का उन्हें मलाल नहीं। उसके तईं सब प्रभु की माया है। मोरपंखजड़ा तंबूरा उनका वाद्ययंत्र, आयुध भी और साथी भी। तंबूरा हाथ में आते ही उनमें ओज आ जाता। सन् 80 के दशक में उन पर रंगकर्मी हबीब तनवीर की निगाह पड़ी। कला-गुरू को कलासाधिका की प्रतिभा पहचानते देर न लगी। वह भारत महोत्सव में गयीं। दिल्ली में इंदिरा गांधी के सम्मुख उन्होंने पंडवानी प्रस्तुत की। उन्हें जगह-जगह से न्यौता मिला। दिशायें गौण हो गयीं। वह फ्रांस, जर्मनी, मॉरीशस, तुर्की, रोमानिया, बांग्लादेश और स्विट्जरलैंड गयीं ही, माल्टा, ट्यूनीशिया और साइप्रस भी हो आई। फ्रांस उन्हें सर्वप्रिय लगा। वहां वह कई बार हो आईं। उनके हिसाब से इवनिंग इन पेरिस का जवाब नहीं। पहली फ्रांस यात्रा के बाद उन्होंने ‘आई-ब्रो’ (भौहे) बनाना सीख लिया। आधुनिक सौन्दर्य प्रसाधन भी उनके जीवन में आ गये। तुलसीराम देशमुख में उन्हें पति मिला और साथी भी। पेटी (हार्मोनियम) वादक देशमुख उनके कामों में हाथ भी बंटाते थे और उन्हें साइकिल से भिलाई इस्पात संयंत्र के उनके दफ्तर भी छोड़ आते थे।
‘‘हमारे यहां पढ़ाई का कोई रिवाज न था’’- तीजन ने कहा था-
मैं पढ़ी होती तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती। बहुत दु:ख झेले, लेकिन सरस्वती मैया की कृपा कि पंडवानी मेरी जिंदगी हो गयी। सब उसी का दिया है।
तीजन अपने पति को ‘मिस्टर’ कहती हैं। गोदरेज का ‘डाई’ (खिजाब) उन्हें भाता है। पान के बिना वह रह नहीं पाती थीं। बंगला पान उन्हें पसंद थी, अलबत्ता लवंग-इलायची युक्त सादा पत्ता भी चाव से चबाती थीं। अचार की वह शौकीन थीं। खासकर आम का अचार। वह ठेठ छत्तीसगढ़िया थीं। एक जून बोरे बासी और चटनी उसकी आहारचर्या थी।
तीजन बाई को पुरस्कारों की झड़ी लग गई
तीजन के जीवन-वृत्त में पदकों की लंबी तालिका है। उन्हें देवी अहिल्या सम्मान मिला और संगीत नाटक अकादेमी का पुरस्कार भी। सन् 2016 में उन्हें एस. सुब्बलक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार मिला और 2018 में फुकुओका पुरस्कार। उसे ईसुरी पुरस्कार से भी नवाजा गया। एक चरण के बाद पुरस्कार और सम्मान गौण हो जाते हैं। मुझे याद आता है श्याम बेनेगल का धारावाहिक ‘भारत : एक खोज’। पं. जवाहरलाल नेहरू की कालजयी कृति ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ पर आधारित इस सीरियल में बेनेगल ने ‘महाभारत’ को साकार करने के लिये तीजनबाई को चुना था। यह तीजन की उपलब्धि थी और पुरस्कार भी।
तीजन निरक्षर थीं, लेकिन वह जीवन और जगत के आखरों को बखूबी चीन्हती और सस्वर बांचती थीं। उन्होंने लोककला को क्लासिकी ऊंचाइयां दीं। चीरहरण के प्रसंग से वह दर्शाती थीं कि नारी के अपमान में गौरवशाली वंशों का भी पतन या विनाश निहित है। मिथकों की शैली में बात करें तो तीजन बाई को विधि ने पंडवानी के लिये ही रचा था।
आज जब तीजन बाई की यात्रा पर नजर डालते हैं, तो साफ दिखता है कि उन्होंने सिर्फ एक कला को नहीं जिया, बल्कि उसे नई पहचान दी। संघर्ष, साधना और समर्पण के बल पर उन्होंने पंडवानी को गांव की चौपाल से उठाकर विश्व मंच तक पहुंचाया। उनकी कहानी न केवल लोककला की शक्ति को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कोई भी सीमाएं पार की जा सकती हैं।