'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो' जैसे मशहूर शेर लिखने वाले दिग्गज उर्दू शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से बीमार थे। उनके निधन पर मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर ने कहा है, 'बशीर बद्र के जाने से हमारी उर्दू ज़ुबान थोड़ी और गरीब हो गई।'
देश के मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 91 साल के थे। उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि गुरुवार दोपहर करीब 12:15 से 12:30 बजे के बीच भोपाल में उन्होंने आखिरी साँस ली।
उनके बेटे सैयद बद्र ने कहा, 'बशीर बद्र साहब आज दोपहर में गुजर गए। उनके जाने का दुख शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उन्होंने मेरे जीवन पर बहुत गहरा असर छोड़ा है। आज वो हमारे बीच नहीं रहे। मैं सब से गुजारिश करता हूं कि उनके लिए दुआ करें।'
उर्दू साहित्य जगत में शोक की लहर
बशीर बद्र उर्दू शायरी के सबसे लोकप्रिय नामों में से एक थे। उनकी शायरी में ग़ज़ल, नज़्म और इश्क-मोहब्बत के साथ-साथ समाज पर असर डालने वाले मुद्दे भी होते थे। उनकी कई नज़्में जैसे 'उम्र भर ग़म-ए-ख़याल से गुज़रा…' और 'दोस्ती की बुनियाद पर…' आज भी लोगों के दिलों में बसती हैं। वह अपनी सरल, गहरी और दिल को छूने वाली शायरी के लिए पूरे देश में जाने जाते थे।
उनकी रचनाएं न सिर्फ उर्दू प्रेमियों बल्कि आम लोगों के बीच भी बहुत लोकप्रिय रहीं। बशीर बद्र के निधन से उर्दू साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। साहित्यकारों, शायरों और उनके प्रशंसकों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।हमारी उर्दू ज़ुबान थोड़ी और गरीब हो गई: जावेद अख़्तर
मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर ने बशीर बद्र साहब के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा, 'आज हमारी ज़बान उर्दू थोड़ी और ग़रीब हो गई है। बशीर बद्र- एक बेहद सुरीले शायर- हमेशा के लिए हमारी महफ़िल से रुख़सत हो गए हैं। यह शायर और इनकी शायरी हमारी यादों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।'रेख़्ता ने पोस्ट किया है, 'डॉ. बशीर बद्र के निधन के साथ ही, आधुनिक उर्दू ग़ज़ल का एक गौरवशाली अध्याय ख़त्म हो गया है। वे जन-जन के कवि थे; उन्होंने उर्दू शायरी को जटिल रूपकों के दायरे से बाहर निकालकर आम लोगों के धड़कते दिलों तक पहुँचाया। प्रेम से लेकर गहन दर्शन तक- उन्होंने हर विषय पर बेजोड़ नज़ाकत के साथ लिखा। स्वास्थ्य संबंधी लंबी जद्दोजहद के बाद आज बद्र साहब का निधन हो गया। हमारी संवेदनाएँ और प्रार्थनाएँ उनके परिवार, मित्रों और प्रशंसकों के साथ हैं।'
कवि और राजनेता कुमार विश्वास ने लिखा है, "'मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी…।' रेशमी लहजे और सहज कहन के शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र जी को ईश्वर के लोक की यात्रा मोक्षदा हो। ओम शांति।"
'कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता', 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में' जैसे ये शेर सोशल मीडिया पर ख़ूब साझा किए जा रहे हैं। साहित्य और पत्रकारिता जगत के लोगों ने उन्हें 'मुहब्बत और इंसानियत का शायर' बताया। कई लोगों ने कहा कि उनकी ग़ज़लों ने उर्दू शायरी को आम लोगों तक पहुँचाया।
उनके निधन पर यह भी याद किया गया कि 1972 के शिमला समझौते के दौरान उनका मशहूर शेर सुनाया गया था-
'दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।'
यह शेर बशीर बद्र साहब ने देश के बंटवारे के दर्द और भारत-पाकिस्तान संबंधों को देखते हुए लिखा था। 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौते के दौरान इंदिरा गांधी और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बैठक में यह शेर चर्चा में आया। यह शेर कूटनीति और मानवीय संदेश का प्रतीक बन गया। बशीर बद्र साहब की ये पंक्तियाँ आज भी भारत-पाकिस्तान संबंधों पर सबसे ज्यादा उद्धृत शेरों में से एक हैं। उनके निधन पर यह किस्सा फिर से सोशल मीडिया पर खूब घूम रहा है।
एक युग के महान शायर हमेशा के लिए चले गए। उनकी रचनाएं हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगी।