अट्ठाईस फरवरी 2026 की भोर का समय था। तेहरान अभी नींद और सन्नाटे के बीच ठहरा हुआ था। उसी घड़ी शहर के एक सुरक्षित परिसर पर आसमान से एक नपा तुला वार हुआ। अंधेरा पूरी तरह छँटा भी नहीं था कि ख़बर फैलने लगी। लगभग चार दशक से ईरान की इस्लामी सल्तनत का चेहरा रहे अली ख़ामेनेई अब इस दुनिया में नहीं रहे।
न कोई फौज सीमा पार आई। न किसी संसद में जंग का एलान हुआ। आसमान में बस उपग्रह थे। कुछ ऐसे लड़ाकू जहाज थे जो दिखाई नहीं देते। और एक ऐसा प्रहार था जो पूरी समझ और हिसाब से किया गया था। जो क़दम ईरान के परमाणु इरादों को थामने के लिए उठाया गया था वह अब शायद एक बड़े दौर की शुरुआत का इशारा देता है। लगता है कि बड़ी ताक़तों को यह यक़ीन हो गया है कि वे किसी विरोधी हुकूमत का सिर ऊपर से ही काट सकती हैं और इसके लिए लंबी पाबंदियों और थकी हुई कूटनीति की राह पर चलना ज़रूरी नहीं रहा।
सात दिन गुजर चुके हैं। फारस की खाड़ी के ऊपर उठी धूल और धुआं अभी बैठा नहीं है। फिर भी पश्चिम एशिया की बदलती हुई सूरत अब धीरे-धीरे सामने आने लगी है।
मिसाइल, ड्रोन हमलों की रफ्तार
अमेरिका और इसराइल के अधिकारी कहते हैं कि पहले ही दिनों में मिसाइल और ड्रोन हमलों की रफ्तार कम हो गई। नतांज के पास मौजूद कुछ अहम परमाणु ठिकानों पर चोट पहुंची। मगर निरीक्षक ठहर कर बात करने की सलाह देते हैं। जमीन के बहुत नीचे बने संवर्धन केंद्र ऐसे ही हमलों को सहने के लिए बनाए जाते हैं। नुक़सान ज़रूर हुआ है। लेकिन पूरी तरह मिटा देने की बात अभी कहना जल्दबाजी होगी।
ईरान की जवाबी कार्रवाई उम्मीद से कहीं ज्यादा फैली हुई थी। मिसाइल और ड्रोन ने कतर, कुवैत, बहरीन और अमीरात में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। कुछ नागरिक हवाई अड्डे और तेल से जुड़ी अहम संरचनाएं भी इसकी चपेट में आईं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य जो दुनिया की ऊर्जा की बड़ी नस माना जाता है अब तनातनी का इलाक़ा बन गया है। तेल टैंकरों की आवाजाही अचानक बहुत कम हो गई है।
इन दिनों ने दो सच्चाइयों को एक साथ सामने रख दिया। अमेरिका और इसराइल ने अपनी दूर तक पहुंचने वाली ताकत दिखा दी। दूसरी ओर ईरान ने भी यह जता दिया कि वह पूरे इलाके को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है।
मगर लंबी थकान वाली जंग अक्सर उसी के पक्ष में जाती है जिसके पास ज्यादा हथियार हों और जिसका आसमान बेखौफ रहे। तेहरान की हुकूमत अचानक अपने सबसे असरदार रहनुमा को खोने के बाद नए निजाम की सूरत बनाने में लगी है।
लक्षित हत्याएं नया औजार!
सियासत के मैदान में भी यह घटना एक नए मोड़ की तरह है। 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद लक्षित हत्याएं अब कोई अजूबा नहीं रहीं। वे धीरे धीरे ताकतवर देशों के औजार बनती जा रही हैं। अमेरिका की संसद में जंग के अधिकार पर खुली बहस कराने की कोशिशें जल्दी ठंडी पड़ गईं। कभी यह समझा जाता था कि किसी देश के सबसे बड़े रहनुमा को मार देना मर्यादा की आखिरी हद पार करना है। अब लगता है वह हद धुंधली पड़ती जा रही है।
अब हिफाजत की गारंटी नहीं
इसका असर ईरान की सरहदों से बहुत दूर तक जाएगा। प्योंगयांग से लेकर मॉस्को तक बैठे हाकिम अब यह सोचने को मजबूर होंगे कि गहरे बंकर और दूरियाँ भी पूरी हिफाजत की गारंटी नहीं रहीं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का वह उसूल जो किसी देश की अखंडता के ख़िलाफ़ बल प्रयोग को रोकता है हमेशा पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। लेकिन जब दुनिया की सबसे ताकतवर फौज किसी बैठे हुए रहनुमा को बिना अंतरराष्ट्रीय मंजूरी के खत्म कर देती है तब जंग और हत्या के बीच की लकीर बेहद महीन रह जाती है।
दुनिया की प्रतिक्रिया भी अपने आप में बहुत कुछ कहती है। खाड़ी के वे मुल्क जिन पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की आंच आई उन्होंने बहुत संभल कर बयान दिए। वे वाशिंगटन को नाराज नहीं करना चाहते। यूरोप ने तनाव घटाने की गुजारिश की, मगर टकराव का रास्ता नहीं चुना।
चीन और रूस ने हमले की आलोचना की पर कदम आगे बढ़ाने से बचे रहे। हर कोई अपने अपने हितों का लिहाज करता दिखा। यह खामोशी खुद एक बयान है। बहुत कम सरकारें इस मिसाल का खुला समर्थन करना चाहती हैं। उससे भी कम वे हैं जो इसे चुनौती देने का हौसला रखती हैं।
लेकिन मिसालें ठहरती नहीं। वे दूर तक जाती हैं। बीजिंग पहले ही अमेरिकी क़दम को इस तरह पेश कर रहा है कि दुनिया में नियम सब पर बराबर लागू नहीं होते। वैश्विक दक्षिण के कई देशों के लिए संदेश साफ़ है। वैधता क़ानून से नहीं निकलती। वैधता ताक़त से निकलती है। यह सोच दुनिया की मौजूदा व्यवस्था को और टुकड़ों में बांट सकती है और नए विकल्प तलाशने की रफ्तार तेज कर सकती है।
अब यह टकराव किस राह जाएगा, यह कहना अभी मुश्किल है। कुछ लोग उम्मीद करते हैं कि तेहरान आखिरकार बातचीत की मेज तक आएगा। यथार्थवादी मानते हैं कि सीमित टकराव जारी रहेगा। परोक्ष लड़ाइयां होंगी। तेल के बाजार में झटके लगेंगे। सियासी दबाव बढ़ेगा। सबसे ख़तरनाक सूरत वह होगी जब यह आग और ताक़तों को अपनी तरफ़ खींच ले और दुनिया की अर्थव्यवस्था तक को हिला दे।
फ़िलहाल वाशिंगटन और यरूशलम साथ खड़े नज़र आते हैं। खुफिया सहयोग है। हथियारों की मदद है। कूटनीतिक सहारा भी है। लेकिन तेहरान पर हुआ यह वार सिर्फ एक जंग की कहानी नहीं कहता। यह उस उसूल को चुनौती देता है जिसके सहारे इक्कीसवीं सदी की दुनिया को समझा गया।
अगर दुनिया ने यह मान लिया कि ताक़त ही वैधता का फ़ैसला करती है तब इसके असर पश्चिम एशिया से बहुत दूर तक जाएंगे। जिस वार ने एक रहनुमा का दौर ख़त्म किया वही शायद उस पल की शुरुआत है जब नियमों पर टिकी नाजुक व्यवस्था बिखर गई और उसकी जगह एक बहुत पुराना उसूल लौट आया। ताकतवर का उसूल।