अरविंद मोहन का विश्लेषण: 2011 की जातिगत जनगणना की कोशिश हुई, लेकिन आंकड़े खराब गुणवत्ता और विवाद के डर से जारी नहीं हुए। अब राहुल गांधी के दबाव से बीजेपी भी सहमत हुई। अब स्व-घोषणा से ओबीसी आंकड़े गड़बड़ हो सकते हैं, 2011 जैसा फेल होने का खतरा।
माना जाता है कि 2011 की जनगणना में जाति की सूचना जोड़ने का फ़ैसला जिस राजनैतिक दबाव में लिया गया उसे बनाने में शरद यादव की भूमिका सबसे बड़ी थी। मंडल की राजनीति से देश में चर्चित हुए शरद यादव को इस मुहिम की हवा कमजोर होते जाने का अंदाजा था और उसके कारणों को दूर करना उनके वश में न था। एक बड़ा कारण तो मंडल का राजनैतिक लाभ गिनती के परिवारों में सिमट जाना था। लेकिन उनको भरोसा था कि एक बार जब जातिवार गिनती के आँकड़े सामने आएंगे तो फिर से जाति का विमर्श राजनीति के केंद्र में आ जाएगा।
यह गिनती हुई भी लेकिन ऐसा नतीजा नहीं निकाला। उसकी वजह जातिवार आँकड़े कभी जारी ही न हो पाना है। पहले यह लगता रहा कि कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार की इच्छा न थी और वह शुरू से टाल मटोल कर भी रही थी। उसने मुख्य जनगणना के सवालों में जाति वाली सूचना मांगी भी नहीं थी। यह सर्वे बाद में हुआ। लेकिन बाद में यह जाहिर हुआ कि आंकड़े बहुत ही खराब स्वरूप में आए हैं और अगर उनको जारी किया गया तो झगड़े बढ़ेंगे और जातियों का आपसी संबंध कलह में बदल सकता है। योजना बनाने, संसाधनों के बंटवारे और सत्ता में हिस्सेदारी के बंटवारे के जिस उद्देश्य से इसे कराने का आग्रह किया गया था वह कोई भी लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा था।
फिर न आँकड़े जारी हुए न कारण बताया गया। मनमोहन सरकार अपनी आदत के अनुसार आलोचना सुनकर भी चुप रही और विपक्ष, जिसमें बीजेपी भी शामिल थी, इस चूक या गलती का ठीकरा सरकार के सिर फोड़कर अपनी राजनीति चमकाता रहा। इसमें मंडल वाला खेमा तो निरंतर कमजोर पड़ता गया और दो राज्यों तथा परिवारों की राजनीति तक सिमट गया लेकिन दिन-ब-दिन ताक़तवर होती गई बीजेपी भी इस सवाल से कांग्रेस को पीटने में पीछे नहीं रही।
राहुल ने बनाया दबाव
लेकिन अचानक पाला पलटा क्योंकि राहुल गांधी जातिवार जनगणना के पक्ष में हो गए। उन्होंने कांग्रेसी सरकारों द्वारा लगाई गई देरी को गलत कहना भी शुरू किया। यह शुरुआत तब हुई जब बिहार सरकार ने अपने यहाँ जातिवार जनगणना का फैसला किया और कांग्रेस उस सरकार में शामिल थी। सहमति तो बिहार बीजेपी ने भी दी थी लेकिन केंद्र सरकार ने इसे रोकने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने से लेकर हर उपाय किए। लेकिन जब राहुल गांधी और उनके पीछे पूरी मंडलवादी धारा ने जातिवार जनगणना को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया तो बीजेपी को भी पक्ष में दिखने की मजबूरी हो गई। राहुल को अब यह अपना एक नया हथियार लगने लगा।
लेकिन बीजेपी जातिवार जनगणना तो छोड़िए, सामान्य जनगणना कराने से भी हिचकती रही है। इसके क्या कारण हो सकते हैं, इसका अनुमान भर लगाया जा सकता है लेकिन उसकी चर्चा यहां करने का मतलब नहीं है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नागरिकता के सवालों पर उसका रवैया भी समझ में नहीं आता।
संघ परिवार और वर्ण व्यवस्था
संयोग से 2020 के आसपास फैले कोविड ने उसे एक बहाना भी दे दिया। यह ज़रूर है कि संघ परिवार जिस दर्शन को मानकर आगे बढ़ा है और केंद्र की सरकार तक पर अपना कब्जा करने में सफल हुआ है उसमें वर्ण व्यवस्था को उचित मानना, औरत, अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी का स्थान समाज में सबसे नीचे मानना शामिल है। संघ में तो आज तक कोई दलित, कोई औरत, कोई आदिवासी या ओबीसी शीर्ष के पद तक नहीं पहुंचा है, जबकि संघ सौ साल से ज़्यादा से काम कर रहा है। उसने बहुत बाद में आरक्षण के पक्ष में बयान दिए और चुनावी मजबूरियों के चलते पिछड़ों को स्थान देना शुरू किया लेकिन यह उनका हक मानना उसे स्वीकार नहीं है। नरेंद्र मोदी का पिछड़ा होना सिर्फ वोट की राजनीति के लिए सुविधा बढ़ाने वाला साबित हुआ है, नज़रिया बदलने वाला नहीं। पर जब राहुल की अगुआई में लगभग पूरे विपक्ष और बीजेपी के अंदर के पिछड़े तबके ने दबाव बनाया तो उसने देर से शुरू हुई जनगणना के साथ जातिवार गणना का प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया था।
पर एक बार जनगणना का शुरुआती हिसाब हो जाने के बाद जाति की गिनती जब शुरू होने वाली थी तो ख़बर आई कि जनगणना के फार्म में सीधे वही सूचना दर्ज कर ली जाएगी जो सामने वाला व्यक्ति अपनी जाति को लेकर कहेगा। इसमें न तो उससे कोई प्रमाण देने को कहा जाएगा और ना ही सरकार अपने वर्गीकरण के हिसाब से उसकी जाति दर्ज करने की कोशिश करेगी। दलितों के मामले में ऐसा नहीं है। वहां उनकी जाति अनुसूचित जातियों की सूची के हिसाब से दर्ज हो रही है।
ऐसी गड़बड़ी खास तौर से ओबीसी वर्ग के साथ हो रही है जिनकी संख्या का हिसाब ही राजनीति, अर्थनीति और समाज नीति के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण है। यह समाज का सबसे बड़ा जमात है और राजनैतिक बदलाव को इसी जमात के लोग नेतृत्व दे रहे हैं। और यह स्थिति तब है जबकि केंद्र सरकार और हर राज्य सरकार ने अपने यहां के ओबीसी जमात की जातियों की आधिकारिक सूची तय कर रखी है। मंडल वाले आरक्षण के लिए यह बुनियादी ज़रूरत है। और लग रहा है कि बात 2011 वाले अनुभव पर ही जाकर रुकेगी और जातियों का हिसाब साफ़ नहीं हो पाएगा।
2011 में 46.7 लाख जातियां निकल आईं
2011 में जब लोगों को अपनी मर्जी से जाति बताने और उसी सूचना को दर्ज करने का काम हुआ तो देश में 46.7 लाख जातियां निकल आईं और इनमें कौन अगड़ा है, कौन पिछड़ा इसका कोई हिसाब सामने नहीं आया। जब अंग्रेज़ी राज में जातिवार जनगणना होती थी तब हर बार अनेक पिछड़ी जातियों की तरफ से खुद को क्षत्रिय या ब्राह्मण होने का दावा पेश होता था और इसे निपटाना ज्यादा मुश्किल नहीं होता था। और अनेक लोगों का मानना है कि जातियों का मौजूदा स्वरूप इन्हीं जनगणनाओं के ऐसे विवादों से हुई है, उससे पहले उनका स्वरूप ऐसा न था। लेकिन अब तो ऊंची जाति वाले भी खुद को पिछड़ा और दलित बताने की होड़ में हैं जिससे आरक्षण का लाभ मिल जाए। सरकारी नौकरी पाने के लिए बेइमानी होना आम है, अब तो विधायक बनने के लिए लोग झूठी जाति बताते हैं। ऐसे में वह निर्णय तो करना होगा। दिलचस्प है कि 1931 में जब आखिरी जातिवार जनगणना हुई थी तब 4147 जातियां गिनी गई थीं। 1980 के दशक में समाजशास्त्री कुमार सुरेश सिंह के नेतृत्व में भारतीय समाज के व्यापक सर्वेक्षण में भी करीब 3800 जातियां गिनी गई थीं। यह सर्वेक्षण रिपोर्ट 43 खंडों में उपलब्ध है। पर सरकार चाहेगी तब ये हिसाब हैं। अगर वही टालना चाहती है तो जातिवार जनगना के सवाल को दफन ही मानिए।