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शी का 'चीनी सपना' और पीएम मोदी का 'नया भारत' 

चीन और भारत के शिखर नेताओं के बीच अनौपचारिक शिखर बैठक इन नई उम्मीदों के साथ सम्पन्न हुई है कि दोनों देश अपने मतभेदों को दूर करने के लिये उच्चस्तरीय वार्ताएं जारी रखेंगे। शिखर बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सार्वजनिक बयान में कहा कि दोनों देश एक-दूसरे की संवेदनशीलता और चिंताओं का ध्यान रखें लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऐसा कोई भरोसा नहीं दिया। 

शी जिनपिंग ने केवल इतना ही कहा कि दोनों देश आपसी चिंता के मसलों पर बातचीत जारी रखेंगे और इसके लिये राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीनी स्टेट काउंसलर की सीमा मसले पर होने वाली आगामी बैठक को हरी झंडी दे दी गई। इसके अलावा भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को चीन दौरे का निमंत्रण दिया गया और व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिये और सेक्टर वार बातचीत के लिये वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और चीनी उप प्रधानमंत्री के बीच बातचीत का एलान किया गया है।

महाबलिपुरम या मम्मलापुरम में 11 और 12 अक्टूबर को हुई दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक के दौरान शी जिनपिंग और नरेन्द्र मोदी के बीच पांच घंटे तक जो आपसी गुफ्तगू अकेले में हुई, उस दौरान दोनों ने क्या कहा इसका खुलासा नहीं हो सकता। पिछले साल 28 अप्रैल को चीन के वुहान शहर में जो पहली अनौपचारिक शिखर बैठक हुई थी, उस दौरान भी दोनों ने छह घंटे से अधिक समय तक अकेले में गुफ्तगू की थी और इसके बाद वुहान भावना यानी वुहान स्पिरिट के पैदा होने की बात कही गई थी। 

वुहान भावना के बावजूद भारत और चीन के रिश्ते पिछले साल काफ़ी बुरे दौर से गुजरे हैं। इस दौरान चीन ने आतंकवाद के मसले पर संयुक्त राष्ट्र में मसूद अज़हर को आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव का विरोध किया और जम्मू-कश्मीर पर भारत की संप्रुभता को चुनौती दी।

इस बार महाबलिपुरम या मम्मलापुरम भावना जैसी बात पैदा होने का जिक्र किसी भी पक्ष से नहीं किया गया लेकिन चीनी राष्ट्रपति ने अनौपचारिक शिखर बैठकों को काफी उपयोगी बताते हुए इसका अगला संस्करण अगले साल चीन में करने का एलान किया जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार कर लिया। यानी कि अगले साल तक यह सिलसिला जारी रहेगा। 

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भारत के पड़ोसी देश चीन के, जो भारत के ख़िलाफ़ हर मंच पर दुश्मन की तरह व्यवहार करता हो, इस बर्ताव के बाद यह भी ठीक नहीं होता कि भारतीय नेता चीनी नेता से मुंह फुला कर बैठ जाएं और आपसी मेल-मुलाक़ात भी बंद कर दें। इस नजरिये से शी जिनपिंग का चेन्नई के निकट मम्मलापुरम का दौरा बहुत ज़रूरी माना जाएगा क्योंकि हम पड़ोसी की अमीरी और ताक़त के घमंड की वजह से उससे मुंह नहीं फेर सकते।

नहीं पिघला शी का दिल! 

हमारा पड़ोसी यदि प्यार से रास्ते पर आ जाए तो  इससे बेहतर क्या हो सकता है। इसी प्यार की भावना को महाबालिपुरम में भारत ने दर्शाया जिससे राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अभिभूत हो गए और इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी किया। लेकिन लगता है कि इसके बावजूद शी का दिल नहीं पिघला, हालांकि उन्होंने अपने बयान में ज़रूर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी दिल खोलकर बात हुई है।

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लेकिन चीन की मजबूरी यह है कि वह भारत से दोस्ती की ख़ातिर अपनी राष्ट्रीय सामरिक महत्वाकांक्षाओं को नहीं छोड़ सकता। शी ने 2013 में सत्ता हासिल करने के बाद 'चाइनीज ड्रीम' की बात की थी जिसका उद्देश्य था चीन को दुनिया का सबसे प्रभावशाली और समृद्ध देश बनाना। इधर, भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी एक मुखर भारत की तसवीर दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं। हर कोई इसका स्वागत करेगा कि भारत को विश्व रंगमंच पर अपनी भूमिका बढ़ानी होगी और अपनी राष्ट्रीय सामरिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये एक नये भारत का विकास करना होगा। 

‘उग्र राष्ट्रवाद’ बनाम ‘चाइनीज ड्रीम’

प्रधानमंत्री मोदी का नया भारत बनाने का सपना,  जिसे ‘उग्र राष्ट्रवाद’ कहा गया है, राष्ट्रपति शी के ‘चाइनीज ड्रीम’ से सीधा टकराता है क्योंकि भारत हिंद महासागर में चीन की सागरीय सैनिक गतिविधियों को पसंद नहीं करता और दूसरी ओर  दक्षिण चीन सागर पर प्रभुत्व स्थापित करने की चीन की कोशिश को भारत का चुनौती देना चीन को नागवार गुजरता है। 

विश्व प्रशासन वाले वैश्विक मंचों न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भारत को स्थाई सदस्यता का चीन इसलिये विरोध कर रहा है कि वह भारत को एक विश्व ताक़त के तौर पर इन मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाते देखना नहीं चाहता है।

भारत को रोकने की कोशिश में चीन

इसके अलावा ‘बेल्ट एंड रोड’ की चीन की महत्वाकांक्षी ढांचागत विकास योजना से चीन की अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया पर हावी होने लगेगी जिसे भारत अपनी जनता के हितों की क़ीमत पर ही स्वीकार कर सकता है। इसलिये हर क्षेत्र में और हर मंच पर चीन भारत के उदय को रोकने की कोशिश कर रहा है और इसके लिये ज़रूरी है कि भारत को पाकिस्तान के फंदे से बाहर निकलने ही नहीं दिया जाए। यही वजह है कि चीन पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ हथकंडे की तरह इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल यह है कि क्या चीन अपने सामरिक हितों की क़ीमत पर भारत से दोस्ती गहरी करेगा और भारत की चिंताएं दूर कर उसे राष्ट्रीय निर्माण में आगे बढ़ने देगा।

चीन की कोशिश यही होगी कि भारत को उच्चस्तरीय वार्ताओं में उलझाए रख कर भ्रम में रखे और भारत को चीन विरोधी गुटों में शामिल होने या सक्रिय भूमिका निभाने से रोके। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत द्वारा स्थापित क्वाड्रीलेटरल डायलॉग में भारत यदि खुलकर सक्रिय भूमिका निभाएगा तो पूरे प्रशांत सागर में चीन की दादागिरी पर आंच आएगी। इसलिये भारत के साथ कभी-कभी मीठी बातें करते रह कर भारत को मायाजाल में फांस कर रखने की चीन की रणनीति है। 

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लेकिन भारत की मजबूरी यह है कि वह कोई वैसी उकसाने वाली कार्रवाई नहीं कर सकता जैसी कि जम्मू-कश्मीर के बारे में चीन ने अपना रुख बदलकर की है। भारत भी चाहे तो इसी तरह का रुख चीन के हांगकांग और शिन्च्यांग प्रदेशों के मौजूदा घटनाक्रम पर अपनी तीख़ी प्रतिक्रिया दे कर चीन को मानवाधिकारों के सम्मान की नसीहत दे सकता है लेकिन चीन और भारत के बीच सैन्य और आर्थिक ताक़त का जो अंसतुलन है, वह भारत को एक सीमा तक ही चीन विरोधी रुख अपनाकर चीन को चिढ़ाने की इजाजत देता है।
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रंजीत कुमार
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