अच्छा हुआ कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने तुच्छ याचिकाएं डालने और सोशल मीडिया पर न्यायपालिका की आलोचना करने वालों को अंग्रेजी में ‘काकरोच और परजीवी’ कहा वरना हिंदी के निरंतर गिरते स्तर को और गहरी ठेस लगती। मैं लंबे समय तक इस गलतफहमी में रहा कि हमारी हिंदी फिल्में अपने मारधाड़ वाले डॉयलाग के माध्यम से हिंदी का प्रचार और विकास कर रही हैं। और इससे गैर हिंदी भाषी लोग हिंदी सीख रहे हैं। भले ही वे हिंदी की गालियां ही हों। फिर हिंदुत्ववादी संगठन और उसके प्रचार प्रसार से भी यह गलतफहमी बनी कि वे और कुछ भले न करें लेकिन गैर- हिंदी क्षेत्रों में अपनी विचारधारा के साथ हिंदी फैला रहे हैं। यह गलतफहमी एक हद तक हिंदी के इलेकट्रॉनिक चैनलों की बढ़ती दर्शक संख्या को देखकर भी हुई। लगा कि उनके परदे पर तू-तू मैं-मैं और मारधाड़ वाली स्थितियां आखिरकार हिंदी इलाके का गौरव बढ़ा रही हैं और राष्ट्रीय राजनीति के सारे विमर्श को राष्ट्रीय भाषा में केंद्रित कर रही हैं। जो काम दयानंद सरस्वती, भारतेंदु हरिश्चंद्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, महात्मा गांधी, पुरुषोत्तम दास टंडन, डॉ राममनोहर लोहिया और पंडित जवाहर लाल नेहरू नहीं कर पाए वह काम इस दौर के नेता बखूबी कर रहे हैं।
लेकिन यह गलतफहमी पिछले महीने हुए पश्चिम बंगाल के चुनावों में काफी कुछ उतर गई। वहां दोनों ओर से जितने हिंसक सांस्कृतिक विमर्श चले वे सब हिंदी में ही चल रहे थे। उल्टा करके सीधा कर देंगे, मार... को वगैरह वगैरह। बल्कि जो बंगाली कभी हिंदी वालों को छातू वाला, मेड़ो बोल रहे थे वे भी हिंदी में ही उतर आए। स्त्रियों से संबंधित जितनी अभद्र टिप्पणियां हिंदी में उभरी उन सभी ने नारी वंदन के नारे की सारी हवा निकाल दी। चुड़ैल, ताड़का और सूर्पनखा जैसे शब्द इतने धड़ल्ले से प्रयोग हो रहे हैं कि जैसे आप की बात न मानने वाला मनुष्य ‘दैत्य और राक्षस’ कुल का ही है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने का जैसा गौरव हमारे चुनावों में हासिल हुआ वैसा अभी न तो सरकारी दफ्तरों में हासिल हुआ है और न ही अदालतों में और न ही विश्वविद्यालयों में ज्ञान विज्ञान की भाषा के तौर पर। गाली गलौज के लिए हिंदी का प्रयोग अधिक प्रभावशाली होता जा रहा है और राष्ट्रीय स्तर पर यही स्वीकृत आचरण होता जा रहा है। पुलिस को तो इसमें महारत हासिल है। ऐसे में धन्य हैं हमारे गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के हिंदी भाषी राष्ट्रीय नेता जिन्होंने अपनी मातृ भाषा को इस कलंक से बचाकर उसे हिंदी के माथे थोप दिया।
‘कॉकरोच और परजीवी’ पर सीजेआई की सफाई
हालांकि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने वकील, पत्रकार और आरटीआई एक्टविस्ट बने बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच और परजीवी’ कहने वाले बयान पर अपनी सफाई दे दी है और इस विवाद को शांत हो ही जाना चाहिए लेकिन इससे भाषा में संयम बरतने और मर्यादित आचरण करने का जो सवाल पैदा हुआ है उसे न तो शांत होना चाहिए और न ही उस पर कार्रवाई रुकनी चाहिए। वरिष्ठ वकील का दर्जा मांग रहे थे संजय दुबे जी और लानत भेजी गई देश के युवाओं पर। हालांकि उस लानत के बाद मुख्य न्यायाधीश ने युवाओं की मिजाज पुर्शी भी की लेकिन घाव तो इतने जल्दी भरेगा नहीं। इस प्रसंग पर एक युनानी कथा याद आती है।
सिकंदर महान के पिता फिलिप्स द्वितीय जो एक सैन्य रणनीतिकार थे और जिन्होंने युनानी साम्राज्य को सुदृढ़ किया था, एक बार अपने दरबार में बैठे थे। उनके समक्ष एक फरियादी आया। जब उसने राजा की हालत देखी तो उसने अपनी फरियाद वापस ले ली। जब दूसरे दिन उसने फिर अपनी फरियाद पेश की तो राजा ने पूछा कि तुमने कल अपनी फरियाद वापस क्यों ले ली थी। उसने कहा कि महराज कल आप दोहरे नशे में थे। एक तो सत्ता का नशा दूसरे शराब का नशा। इसलिए न्याय होने की उम्मीद नहीं थी। वैसे ही संजय दुबे को भी समझना चाहिए था। एक ओर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दक्षिणपंथी विचार का नशा है तो दूसरी ओर उनके पद का नशा है। ऐसे में उनसे न्याय की उम्मीद न तो एसआईआर के मामले में हो सकती है न ही चुनाव के मामले में, न वकीलों की वरिष्ठता के मामले में, न नीट परीक्षा के बारे में और न ही मजदूरों के वेतन के बारे में। अच्छा हुआ बाद में संजय दुबे ने अपनी याचिका वापस ले ली और माननीय न्यायमूर्ति ने उसकी इजाजत दे भी दी।
शांति और अहिंसा के प्रमुख विचारक योहान गाल्तुंग ने हिंसा के तीन स्तर बताए हैं। एक हिंसा सांस्कृतिक स्तर पर होती है। जिसमें भाषा और चिंतन के स्तर पर दूसरे व्यक्ति या समुदाय को हीन समझा जाता है और उसके साथ संबोधन से लेकर लेन देन तक में निम्न स्तर का घृणित व्यवहार किया जाता है।
बुलडोजर की कार्रवाई
हिंसा का दूसरा स्तर भौतिक यानी शारीरिक हिंसा का है जिसमें मारपीट, हत्या डकैती और बलात्कार वगैरह शामिल है। तीसरा स्तर व्यवस्था यानी राज्य और समाज की संगठित शक्ति द्वारा की जाने वाली हिंसा है। उसमें बुलडोजर से किसी का मकान गिराना या किसी को जमीन और घर से बेदखल करने से लेकर उस पूरी कौम के नरसंहार की सैन्य कार्रवाई तक शामिल है। जैसे की गज़ा में इजराइल कर रहा है। ईरान में अमेरिका कर रहा है या ईरान की अपनी सत्ता अपने नागरिकों और विशेषकर आजादी चाहने वाली स्त्रियों के साथ करती रहती है। इजराइली बुलडोजर ने भारत के शासकों को भी प्रेरणा दी है। वे अब उसका प्रयोग अपने नागरिकों के एक हिस्से को पराया बताकर उस पर कर रहे हैं। ध्यान रहे भारत में आपातकाल में अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत संजय गांधी ने इसका जब दिल्ली के तुर्कमान गेट पर इसका प्रयोग किया था तो उसकी आलोचना तत्कालीन जनसंघ के नेताओं ने भी की थी।असंयमित भाषा की सांस्कृतिक हिंसा
निश्चित तौर पर असंयमित भाषा गंभीर किस्म की सांस्कृतिक हिंसा करती है और वह बाद में होने वाली भौतिक और संरचनात्मक हिंसा के लिए वातावरण निर्मित करती है। लेकिन अगर आचरण की भाषा में प्रेम और अहिंसा है, मर्यादा है तो इस भाषा का प्रभाव घाव देने के बजाय मलहम लगाने वाला होता है। प्रेम बढ़ाने वाला होता है। सुधारने वाला होता है। कई बार संत महात्मा, समाज सुधारक और साहित्यकार समाज के हित में असंयमित भाषा का उपयोग करते हैं। कई बार महिलाएं शादी विवाह में प्रेम भरी गालियां देती हैं। कई बार ब्रज में अपने ही इष्ट को गालियां दी जाती हैं। इससे इष्ट के प्रति सखा भाव जगता है और वह भक्त के अधिक करीब आता है। श्री मागो ने रामकृष्ण वचनामृत में ठाकुर के चरित्र का जो वर्णन किया है उसमें वे सहज भाव से गालियां देते हैं। जब कृष्ण बिहारी मिश्र ने वचनामृत को आधार बनाकर कल्पतरु की उत्सव लीला शीर्षक से ठाकुर की जीवनी लिखी और उसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन को भेजी तो संपादक ने आरंभिक पंक्तियों में लिखी गालियों पर आपत्ति की। इस पर लेखक का कहना था कि वे नहीं हटाई जाएंगी क्योंकि ठाकुर जी ऐसे ही बोलते थे।
बिजनेस चलाने के लिए सांस्कृतिक हिंसा
एक बार जब काशीनाथ सिंह से किसी ने कहा कि उनके उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में गालियां बहुत हैं तो उनका कहना था कि काशी की गालियां फकीरों की गालियां हैं। लेकिन जब सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे राजनेता या चैनलों के प्रस्तोता और उन पर बहस के लिए बुलाए जाने वाले विशेषज्ञ सत्ता हासिल करने, उसे बनाए रखने और अपना बिजनेस चलाने के लिए 24 घंटे आक्रामक भाषा में सांस्कृतिक हिंसा करते हैं तो समाज की दशा दिशा पर चिंता होती है। गालियों और उनसे संरचनागत हिंसा के माहौल को निर्मित किया जाता है और फिर तानाशाह या फासिस्ट उसे सामान्य घटना बना देता है। विडंबना देखिए कि यहूदियों के लिए जिस भाषा का प्रयोग हिटलर करता था आज उसी भाषा का प्रयोग इजराइल फिलस्तीनियों के लिए करता है। हिटलर ने यहूदियों के लिए परजीवी और चूहा कहा था। इस तरह के साहित्य से जर्मनी का उस समय का विमर्श पटा पड़ा है। आज इजराइल फिलस्तीनियों के लिए जहरीला कीड़ा यानी वर्मिन शब्द का प्रयोग कर रहा है। जुलाई 1994 में रवांडा के सरकारी रेडियो ने तुर्तियों के लिए काकरोच शब्द का प्रयोग किया था उसके बाद सौ दिनों में आठ लाख तुर्ती मार दिए गए। उनकी नस्ल ही समाप्त कर दी गई।निश्चित तौर पर भाषा में संयम जरूरी है लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है आचरण की संयमित भाषा। अगर आप के फैसलों और कार्रवाइयों में श्रेष्ठ आचरण परिलक्षित होता है और कभी कभार भाषा में फिसलन हो जाती है तो चलेगा। लेकिन अगर आप की भाषा में संयम नहीं है और आचरण की भाषा भी हिंसक और अमर्यादित है तो सोचना होगा कि कहीं हमारा समाज गहराई में हिंसा और अराजकता की ओर तो नहीं जा रहा है। कबीर ने चेतावनी दी थी कि ‘आपन आपन मेढ़ संभालों बढ़ो हाथ लो पानी।’ उसी बात को गांधी जी ने पत्रकारिता और लेखन करने वालों (उसे बोलने वालों पर भी लागू कर सकते हैं) को सचेत करते हुए कहा था कि जिस प्रकार बाढ़ का पानी खेत के खेत और गांव के गांव तबाह करता हुआ चला जाता है, उसी प्रकार अनियंत्रित और अमर्यादित भाषा समाज और देश को तबाह कर देती है। यहां कम से कम हिंदी वालों से तो कहा ही जा सकता है कि वे अपनी भाषा को मर्यादा में रखें।