सीजेपी जंतर मंतर प्रोटेस्ट
कॉकरोचों ने मोदी सरकार की नींद उड़ा दी है। ये संदेश दे दिया है कि सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लोगों में नाराज़गी बढ़ती जा रही है। खासतौर पर युवा और छात्र ग़ुस्से में हैं और वो लगातार होते पेपर लीक से परेशान हैं। आजिज़ हैं। उसे बदलाव चाहिए। वो ऐसी सरकार चाहता है जो उसके सवालों के जवाब दे। वो ऐसी सरकार नहीं चाहता जो लगातार उसे नक़ली मुद्दों में उलझा कर असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाती रहे।
अगर मोदी सरकार ने ये समझा था कि कॉकरोचों को एयरपोर्ट पर ही धरना प्रदर्शन की इजाजत दे कर वो उनके ग़ुस्से को खरीद लेंगे तो फिर वो मुग़ालते में थे। और अब यही परमीशन उनके लिये दिक्कत का सबब बन गई है। सोनम वांगचुक का आमरण अनशन और फिर संसद तक छात्रों का मार्च, और उसको मिले समर्थन ने ये बता दिया है कि मोदी सरकार के लिये अब इस ग़ुस्से को थामने के लिये कुछ बड़ा करना पड़ेगा।
मोदी के लच्छेदार भाषण का जादू ख़त्म?
मोदी अच्छा लच्छेदार भाषण दे कर हमेशा लोगों का दिल जीतने की कोशिश करते हैं, अपनी इस शैली में वो कामयाब भी हैं, काफी हद तक। एक तबक़ा उनकी बातों में आकर उनको मसीहा के तौर पर देखने की भयंकर भूल भी कर चुका है। उन्हें भारत की तमाम समस्याओं का एक मात्र इलाज भी मानता है। लेकिन अब वो भ्रम काफी हद तक टूट रहा है। मोदी के समर्थक अब बोलने लगे हैं। पहले मोदी की आलोचना करने का अर्थ था मुसीबत मोल लेना। लोग उग्र हो जाते थे। गाली गलौज पर उतर आते थे। अब पानी उतर चुका है। लोग मायावी भाषणों का खोखलापन देखने लगे हैं और ये इसलिये है कि सरकार की आर्थिक स्तर पर कोई उपलब्धि नहीं है। बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। आम जन की आय बढ़ने की जगह घटती जा रही है।
युवाओं के सामने बेरोजगारी का संकट
वो देख रहा है कि सरकार की नीतियों की वजह से कुछ घरानों की संपत्ति में भयानक उछाल आता जा रहा है। अमीरों की संख्या बढ़ रही है और तमाम दावों के बावजूद ग़रीबों की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा। पढ़े-लिखे युवाओं को या तो रोज़गार नहीं मिल रहा है, और जो मिल भी रहा है वो योग्यता के अनुकूल नहीं। ढेरों ऐसे हैं जो डिलीवरी ब्वाय बन कर रह गये हैं या फिर दिल्ली जैसे महानगर में बड़े-बड़े अपार्टमेंट में गार्ड की नौकरी कर रहे हैं। शहरों में गाँवों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है क्योंकि वहाँ रोजगार है ही नहीं।
मोदी सरकार ने वादा किया था कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जायेगी। पर हुआ उल्टा। आय घट रही है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आजादी के बाद पिछले एक दशक में पहली बार ये हुआ कि किसानों की आय बिल्कुल नहीं बढ़ी।
मनरेगा को ख़त्म किया
मनमोहन सरकार ने गाँव के किसानों के लिये मनरेगा नाम से एक शानदार योजना शुरू की थी। जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई थी। लेकिन इस सरकार की मनरेगा में शुरू से ही कोई रुचि नहीं थी। प्रधानमंत्री ने संसद में खड़े हो कर इस योजना का मजाक उड़ाया था। आगे चल कर उन्होंने इस योजना को ही ख़त्म कर दिया और इसकी जगह एक आधी अधूरी योजना लेकर आये हैं जिसने रोजगार मांगने के अधिकार को ही खत्म कर दिया। पहले सरकार मनरेगा के तहत बजट का इंतजाम करती थी अब उसने राज्य सरकारों पर काफी बोझ डाल दिया है। लिहाजा गाँवों में रोजगार के अवसर और कम हो गये हैं। लोग बड़ी संख्या में शहर की ओर आ रहे हैं और यहाँ भी ठन ठन गोपाल। लिहाजा निराशा बढ़ रही है। ये फ़्रस्ट्रेशन कॉकरोचों के अनशन में दिख रहा है। ऊपर से प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के पेपर लीक ने उनकी समस्या और बढ़ा दी है।
इस सरकार की सबसे बड़ी समस्या ये है कि ये अपने को जनता के प्रति जवाबदेह नहीं मानती। और न उनके मुद्दों को लेकर ईमानदार है। ये हर मामले को अपनी विचारधारा और ईगो के धरातल पर साधने की कोशिश करती है। और ये प्रचार करती है कि जो सरकार का विरोध कर रहे हैं, वो देश विरोधी हैं। पाकिस्तान परस्त हैं।
देश को हिंदू-मुसलमान में बाँट दिया
इस सरकार की पूरी ऊर्जा और ताक़त मुस्लिम तबक़े से लड़ने में लगती है। पिछले बारह साल में समाज और देश को हिंदू-मुसलमान में बांट दिया गया है। एक ऐसी फौज खड़ी हो गई है जो सिर्फ देशभक्ति और देशद्रोह का सर्टिफिकेट बांटती है। मोदी सरकार और बीजेपी के लिये मरने-मारने पर उतारू हो जाती है। घर परिवार और दोस्तों के बीच बात करना मुश्किल हो गया है। ये सरकार के खिलाफ कोई तर्क सुनना नहीं चाहते। जो विरोध करता है उसे धमकाते हैं। जेल भेजने की बातें होती हैं। किसान आंदोलन को तो खालिस्तानी तक घोषित कर दिया था इन लोगों ने।
अन्ना के आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से लोगों को निराश किया, जो भ्रष्टाचार मिटाने की बात करते थे, वो ऐसे भ्रष्टाचार में डूबे, कि ये धारणा पुख़्ता होने लगी थी कि फिर आगे जनता का कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पायेगा। लेकिन कॉकरोच अनशन ने ये भरोसा बढ़ाया है कि उम्मीद अभी भी बाक़ी है। लोग मोदी सरकार से ऊब गये हैं। वो विकल्प देखने लगे हैं।
पेपर लीक पर राहुल को भी काफी समर्थन मिल रहा है। कॉकरोचों ने समर्थन को और बढ़ाया है। अगर सरकार ने जल्दी ही बड़े क़दम नहीं उठाये तो राज्यों में चुनाव जीतने के बाद भी मुसीबत बढ़ेगी। वैसे भी चुनाव जीतना लोकतंत्र और लोकतांत्रिक होने की अंतिम निशानी नहीं है। सबसे बड़ी बात जनता के सवालों, उनके मुद्दों, और आलोचनाओं को धैर्यपूर्वक सुनना और उनका सहानुभूतिपूर्वक समाधान खोजना, और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही को समझना ही असल मायने में लोकतांत्रिक होना है। कॉकरोचों ने सरकार को झकझोर दिया है। अब लोकतांत्रिक और जवाबदेह होने की ज़िम्मेदारी सरकार की है। देखते हैं कि वो भूल सुधार करती है या नहीं।