राजनीति में त्यागपत्र का मतलब आमतौर पर हार होती है। जब कोई नेता इस्तीफा देता है तो या तो उनकी पार्टी ने उन्हें हटा दिया होता है, या फिर जनता ने चुनाव में उन्हें करारी शिकस्त दी होती है। लेकिन मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया की संसद में जो हुआ, उसने राजनीति की इस क्रूर परिभाषा को पूरी तरह बदल कर रख दिया। ऑस्ट्रेलिया की नेशनल पार्टी के नेता डेविड लिटिलप्राउड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके पास संख्याबल कम नहीं था। पार्टी ने उनके खिलाफ कोई साजिश नहीं रची थी। कोई स्कैंडल सामने नहीं आया था। वह सिर्फ ‘थक गए थे।’

वो पल जिसने सबको चुप करा दिया

संसद में प्रश्नकाल ख़त्म होने के बाद डेविड लिटिलप्राउड अपनी पत्नी अमेलिया के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए। 49 साल के इस नेता के चेहरे पर थकावट साफ झलक रही थी। उन्होंने बोलना शुरू किया तो अंदाज़ा हो गया कि यह कोई आम राजनीतिक घोषणा नहीं है। उन्होंने कहा, ‘मैं एक ऐसे मोड़ पर आ गया हूं, जहां मुझे लगता है कि अब समय आ गया है।’
फिर वह क्षण आया। आंखों में नमी लिए लिटिलप्राउड ने कहा, ‘मैं बुरी तरह थक चुका हूँ। मेरा मन भर गया है। मैं नेशनल पार्टी से प्यार करता हूं, मैं इसी में पला-बढ़ा हूं, और मरते दम तक इसके हरे और सुनहरे रंगों के लिए खून बहाऊंगा। मैं इसे प्यार करता हूं, लेकिन अगर मैं कहूं कि मैं ही इसे आगे ले जाने के लिए सही व्यक्ति हूं, तो यह गलत होगा। मुझमें अब ऊर्जा नहीं है।’ एक शब्द जो उन्होंने बार-बार दोहराया - "बगर्ड" यानी बुरी तरह थका हुआ। यह शब्द अब ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में अपनी अलग जगह बना चुका है।

कौन हैं डेविड लिटिलप्राउड?

डेविड लिटिलप्राउड ऑस्ट्रेलिया की नेशनल पार्टी के नेता थे। यह पार्टी ऑस्ट्रेलिया की लिबरल पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन बनाती है - हमारे यहां भाजपा और शिवसेना या जदयू और राजद के गठबंधन की तरह। 2016 में पहली बार संसद पहुंचे लिटिलप्राउड जल्दी ही पार्टी के शीर्ष नेता बन गए। वह कृषि और जल संसाधन मंत्री भी रह चुके हैं।
मई 2022 में जब उन्होंने पार्टी की कमान संभाली, तब पार्टी बुरे दौर से गुजर रही थी। उनके पूर्ववर्ती बरनबी जॉयस का कार्यकाल विवादों से भरा रहा था। लेकिन लिटिलप्राउड के सामने चुनौतियां कम नहीं थीं। एक तरफ पॉलीन हैनसन की वन नेशन पार्टी ग्रामीण इलाकों में उनकी जड़ें काट रही थी, दूसरी तरफ उनके ही पूर्व नेता बरनबी जॉयस ने पार्टी छोड़ दी।
अब बात करते हैं भारत की। यहां एक दिलचस्प तुलना सामने आती है। लिटिलप्राउड महज 49 साल के हैं। ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में यह उम्र किसी नेता के लिए बहुत छोटी मानी जाती है। वह आसानी से अगले 10-15 साल और राजनीति कर सकते थे। लेकिन उन्होंने कह दिया - मैं थक गया हूं, मुझसे नहीं होगा। अब इसकी तुलना भारत से कीजिए। हमारे यहां 75 पार नेताओं की कोई कमी नहीं है। शरद पवार जी की उम्र 85 साल है। नीतीश कुमार जी 75 के हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 17 सितंबर 2025 को 75 साल पूरे किए हैं।

75 साल की उम्र पर बहस क्यों

यह वही उम्र है जिस पर भाजपा ने परंपरा के तौर पर कई वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्त कर दिया था। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी- इन सबको 75 साल की उम्र में पदमुक्त कर दिया गया था। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में तो पार्टी ने अपने 75 से अधिक उम्र के कई नेताओं को मंत्रिमंडल से हटाकर यह संकेत दे दिया था कि यही पार्टी की नीति है।
शरद पवार ने खुद पिछले साल सितंबर में एक इंटरव्यू में कहा था,
मैं 75 साल की उम्र में नहीं रुका, अब मैं 85 साल का हूं और अभी भी काम कर रहा हूं। इसलिए मैं नरेंद्र मोदी को 75 के बाद रुकने के लिए नहीं कह सकता। मेरा कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
शरद पवार

संघ प्रमुख का वक्तव्य और फिर यू-टर्न!

इस पूरे बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान बेहद चर्चित रहा। जुलाई 2025 में नागपुर में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था - "जब लोग आपको शॉल ओढ़ाने लगें तो समझ जाइए कि अब संन्यास लेने का समय आ गया है।" यह बयान उस समय आया था जब मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी दोनों सितंबर 2025 में 75 साल पूरे करने वाले थे - भागवत 11 सितंबर को और मोदी 17 सितंबर को। विपक्ष ने तुरंत इसे प्रधानमंत्री के लिए संकेत बताया। शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी ने आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह को 75 साल में रिटायर कर दिया। अब देखते हैं कि क्या वह यह नियम खुद पर लागू करते हैं।"
कांग्रेस नेता अभिषेक सिंघवी ने भी कटाक्ष किया - "बिना आचरण के उपदेश खतरनाक होता है। मार्गदर्शक मंडल पर जो नियम लागू हुआ, वही अगर वर्तमान नेतृत्व पर लागू नहीं होता तो यह दोहरा मापदंड है।"

कभी नहीं कहा कि किसी को रिटायर होना चाहिए: भागवत ने 75 वर्ष की सीमा पर दी सफाई

लेकिन फरवरी 2026 में आते-आते स्थिति साफ हो गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने साफ कह दिया कि वह तभी पद छोड़ेंगे जब संघ उनसे कहेगा। मुंबई में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "मैंने 75 साल पूरे कर लिए हैं और संघ को इसकी जानकारी दे दी है, लेकिन संघ ने मुझसे काम जारी रखने को कहा है। जब भी संघ कहेगा, मैं पद छोड़ दूंगा, लेकिन काम से कभी रिटायरमेंट नहीं होगा।" यानी वह शॉल ओढ़ाने वाली बात अब पीछे रह गई।

'25 अभी बाकी हैं'

फरवरी 2026 में ही 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी से जब उम्र का सवाल पूछा गया तो उन्होंने एक क़िस्सा सुनाया। उन्होंने कहा, "75वें जन्मदिन पर एक नेता ने मुझे फोन किया। उन्होंने कहा कि आपने 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं, तो मैंने उनसे कहा - 25 अभी बाकी हैं।" उन्होंने आगे कहा, "मैं बीते हुए को नहीं, बचे हुए को गिनता हूं।" यानी साफ संकेत कि वह 2047 तक काम करना चाहते हैं, जब देश आजादी के 100 साल मनाएगा। पार्टी के नेताओं ने भी साफ कर दिया है कि मोदी 2029 का चुनाव भी लड़ेंगे। गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा के संविधान में 75 साल में रिटायरमेंट का कोई प्रावधान नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया में क्या बोले लोग?

लिटिलप्राउड के इस्तीफे के अगले ही दिन नेशनल पार्टी ने अपना नया नेता चुन लिया। क्वींसलैंड के सीनेटर मैट कैनावन पार्टी के नए नेता बने, जबकि विक्टोरिया के सांसद डैरेन चेस्टर उपनेता चुने गए। कैनावन ने अपने पहले ही भाषण में कहा, "हमें और ऑस्ट्रेलियाई बच्चे चाहिए, और ऑस्ट्रेलियाई सबकुछ चाहिए।" उन्होंने पॉलीन हैनसन की वन नेशन पार्टी को निशाने पर लेते हुए कहा कि वह पार्टी को मजबूती से लड़ाएंगे। लिटिलप्राउड के पूर्व प्रतिद्वंद्वी बरनबी जॉयस ने कटाक्ष किया, "उन्हें पार्टी को जिस हाल में छोड़ा है, उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।" लेकिन प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने उनकी तारीफ की - "डेविड और मैं राजनीतिक रूप से अलग-अलग धाराओं से आते हैं, लेकिन हम एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते हैं। उन्होंने जो किया, वह सम्मानजनक है।"

दुनिया में ऐसे और उदाहरण

लिटिलप्राउड अकेले नहीं हैं जिन्होंने सत्ता से ऊपर उठकर सोचा। न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने 2023 में ठीक ऐसे ही इस्तीफा दिया था। उन्होंने कहा था, "मेरे पास टंकी में पर्याप्त ईंधन नहीं बचा है।" वह भी 40 की उम्र में ही पीछे हट गईं। भूटान के राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने लोकतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए खुद सिंहासन त्याग दिया। उरुग्वे के राष्ट्रपति होसे मुहीका ने राष्ट्रपति भवन छोड़कर अपने खेत में रहना चुना और अपना ज्यादातर वेतन दान कर दिया।

हमारे लिए सबक

लिटिलप्राउड का इस्तीफा हम भारतीयों के लिए कई सवाल खड़े करता है। हमारे यहां नेता बनने की होड़ है, लेकिन नेता पद छोड़ने की कला खत्म होती जा रही है। हमारे यहां 60 साल के नेता खुद को 'युवा' कहलवाते हैं और 75 साल के नेता अगले 25 साल का कार्यक्रम बना रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी जब 2014 में सत्ता में आए थे, तब उन्होंने 75 से अधिक उम्र के नेताओं को मंत्रिमंडल से हटाकर एक नई परंपरा शुरू की थी। लेकिन अब जब वह खुद 75 के हो गए हैं, तो वही परंपरा खत्म हो गई। संघ प्रमुख ने भी शॉल वाली बात कही, लेकिन फिर पलट गए।

सवाल यह है कि क्या सत्ता इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लिए हम अपने ही बनाए नियमों को भूल जाएं? क्या 49 साल में "मैं थक गया हूं" कहने वाला ऑस्ट्रेलियाई नेता ज्यादा ईमानदार है, या 75 साल में "25 साल और बाकी हैं" कहने वाले भारतीय नेता?

लिटिलप्राउड ने खुद कहा, "मैंने वह सब किया जो मैं कर सकता था। अब समय है कि मैं फिर से सामान्य महसूस करूं। मैं कैनबरा आना पसंद करता हूं, और मैं वापस उसी जोश के साथ आना चाहता हूं जैसे पहली बार आया था।" यानी वह राजनीति छोड़ नहीं रहे, सिर्फ नेता पद छोड़ रहे हैं। वह सांसद बने रहेंगे। उन्होंने सिर्फ इतना माना कि पार्टी का नेतृत्व करने की ऊर्जा अब उनमें नहीं है। डेविड लिटिलप्राउड का इस्तीफा हमें एक जरूरी सबक सिखाता है। राजनीति में सबसे बड़ी ताकत सत्ता नहीं, बल्कि यह जानना है कि सत्ता छोड़ने का समय कब आ गया है।
49 साल के इस ऑस्ट्रेलियाई नेता ने वह कर दिखाया जो 85 साल के शरद पवार या 75 साल के नीतीश कुमार या फिर खुद 75 साल के प्रधानमंत्री मोदी नहीं कर पाए। उन्होंने कह दिया - मैं थक गया हूं, अब और नहीं। यह कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। यह ईमानदारी है। यह वही ईमानदारी है जो राजनीति में दिन-ब-दिन दुर्लभ होती जा रही है। जैसा कि लिटिलप्राउड के सहयोगी एंगस टेलर ने कहा, "बहुत साल पहले एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा था... लोग यह याद नहीं रखते कि आप घोड़े पर कैसे चढ़े, बल्कि यह याद रखते हैं कि आप कैसे उतरे।" 
एक ऐसी दुनिया में जहां नेता अक्सर खुद को भगवान समझने लगते हैं और 75 साल में भी "25 अभी बाकी हैं" कहकर सत्ता से चिपके रहते हैं, वहां 49 साल में यह स्वीकारोक्ति कि "मैं थक गया हूं" शायद सबसे बड़ी मानवीय और राजनीतिक ईमानदारी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक रणनीतिकार हैं)