रामचंद्र गुहा हमारे समय के सबसे प्रतिष्ठित इतिहासकारों में हैं। इसलिए जब वे यह लिखते हैं कि गांधी परिवार ने अप्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी की सत्ता को मज़बूत करने में मदद की है, तो उस तर्क को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन गंभीरता से लेने का अर्थ उसे अंतिम सत्य मान लेना नहीं है। बल्कि उसके ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक आधारों की जाँच करना भी उतना ही आवश्यक है।

गुहा का तर्क मूलतः यह है कि कांग्रेस का गांधी परिवार पर अत्यधिक निर्भर होना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी रही है और इसी कमजोरी ने बीजेपी को मज़बूत होने का अवसर दिया। पहली नज़र में यह तर्क आकर्षक लगता है। लेकिन जैसे-जैसे हम भारतीय राजनीति के इतिहास में उतरते हैं, यह व्याख्या अधूरी और अत्यधिक सरलीकृत दिखाई देने लगती है।

बीजेपी के उदय की वजह क्या?

सबसे पहले यह समझना होगा कि बीजेपी का उदय केवल कांग्रेस की विफलता की कहानी नहीं है। यदि गांधी परिवार बीजेपी की सफलता का मुख्य कारण होता, तो बीजेपी उन राज्यों में कैसे बढ़ती जहाँ कांग्रेस उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी ही नहीं थी? पश्चिम बंगाल में उसका मुकाबला तृणमूल कांग्रेस से था, तमिलनाडु में द्रविड़ दलों से, उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से, और ओडिशा में बीजू जनता दल से। स्पष्ट है कि बीजेपी का विस्तार केवल कांग्रेस की कमजोरी से नहीं, बल्कि अपने संगठन, वैचारिक नेटवर्क, संसाधनों और दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति के बल पर हुआ।
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बीजेपी की उपलब्धियों को केवल गांधी परिवार की विफलताओं के खाते में डाल देना स्वयं बीजेपी की राजनीतिक क्षमता को कम करके आंकना है।

गांधी परिवार का इतिहास

इसी प्रकार गांधी परिवार के इतिहास को भी अक्सर अत्यधिक सरलीकृत ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु 1964 में हुई थी। उस समय इंदिरा गांधी न प्रधानमंत्री थीं और न कांग्रेस अध्यक्ष। यदि कांग्रेस केवल वंशवादी पार्टी होती तो नेहरू के निधन के तुरंत बाद उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया जाता। ऐसा नहीं हुआ। पहले लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। शास्त्री जी की मृत्यु के बाद कांग्रेस संसदीय दल के चुनाव में इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को पराजित किया और प्रधानमंत्री बनीं। यह कहना उचित होगा कि उन्हें नेहरू की पुत्री होने का लाभ मिला, लेकिन यह लाभ लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के भीतर मिला, किसी गुप्त उत्तराधिकार योजना के तहत नहीं।

सोनिया गांधी का नेतृत्व

सोनिया गांधी का उदाहरण तो और भी दिलचस्प है। राजीव गांधी की हत्या के समय वे कांग्रेस में किसी पद पर नहीं थीं। उन्होंने तत्काल नेतृत्व स्वीकार नहीं किया। 1991 से 1998 तक कांग्रेस का नेतृत्व पी.वी. नरसिंह राव और बाद में सीताराम केसरी के हाथों में रहा। यदि कांग्रेस केवल गांधी परिवार की बंधक पार्टी होती, तो यह सात वर्ष का प्रयोग कभी नहीं होता। 

लेकिन जब कांग्रेस कमजोर होने लगी, तब पार्टी के भीतर से ही सोनिया गांधी को नेतृत्व संभालने के लिए बुलाया गया। यह प्रश्न अहम है कि आखिर कांग्रेस कार्यकर्ता बार-बार उसी परिवार की ओर क्यों लौटते रहे।

यहीं गुहा के तर्क की सबसे बड़ी सीमा दिखाई देती है। वे गांधी परिवार की मौजूदगी का विश्लेषण करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि गांधी परिवार को चुनौती देने वाले लगभग सभी वैकल्पिक कांग्रेसवादी प्रयोग असफल क्यों हुए।

इंदिरा गांधी का दौर

1969 में कांग्रेस विभाजित हुई। एक ओर संगठन के दिग्गज नेता थे— कामराज, निजलिंगप्पा, मोरारजी देसाई और सिंडिकेट। दूसरी ओर इंदिरा गांधी थीं। यदि संगठनात्मक ताकत ही सब कुछ होती, तो सिंडिकेट को जीतना चाहिए था। लेकिन जनता और कार्यकर्ता इंदिरा गांधी के साथ चले गए। कुछ वर्षों बाद सिंडिकेट कांग्रेस इतिहास बन गई।

1977 में जगजीवन राम, बहुगुणा और अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी जनता पार्टी में चले गए। उनके पास अनुभव था, प्रतिष्ठा थी और तत्कालीन जनसमर्थन भी। फिर भी वे कांग्रेस की राजनीतिक जगह नहीं ले सके। 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में लौट आईं।
संजय गांधी की मृत्यु के बाद मेनका गांधी ने संजय विचार मंच बनाया। यदि राजनीति केवल उपनाम से चलती, तो कांग्रेस का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ जाना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। इसका अर्थ है कि केवल “गांधी” नाम पर्याप्त नहीं था। राजनीतिक वैधता और संगठनात्मक स्वीकार्यता अलग चीजें हैं।

नरसिंह राव के दौर में तिवारी कांग्रेस बनी। बाद में शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर अलग पार्टी बनाई। इनमें से कोई भी प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पाया। यदि गांधी परिवार कांग्रेस पर थोपा गया ढाँचा है तो फिर कांग्रेस के भीतर और बाहर बने ये विकल्प बार-बार असफल क्यों हुए?

सोनिया गांधी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनीं?

एक और अहम तथ्य है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। 2004 में सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन सकती थीं। उनके पास संसदीय बहुमत था। उनके पास वैध दावा था। फिर भी उन्होंने प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं किया और मनमोहन सिंह को आगे किया। जो लोग गांधी परिवार को केवल सत्ता-केंद्रित परियोजना के रूप में देखते हैं, उन्हें इस घटना की भी व्याख्या करनी चाहिए।

आज भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में हर कोई राहुल गांधी की प्रतिक्रिया चाहता है। बीजेपी भी, मीडिया भी, समर्थक भी और आलोचक भी। यदि गांधी परिवार कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है, तो भारतीय राजनीति उसे बार-बार अपना केंद्रीय संदर्भ बिंदु क्यों बना देती है? यह प्रश्न केवल संगठनात्मक नियंत्रण से नहीं, बल्कि राजनीतिक वैधता और प्रतीकात्मक स्वीकार्यता से जुड़ा है।
विचार से और
यहाँ एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी है। भारत अभी भी एक संक्रमणशील समाज है। हमें स्वतंत्र हुए केवल आठ दशक हुए हैं। हमारा समाज परिवार, समुदाय और ऐतिहासिक स्मृतियों से गहराई से प्रभावित है। पश्चिमी लोकतंत्रों की अवधारणाओं को ज्यों का त्यों भारतीय समाज पर लागू नहीं किया जा सकता है। भारत में राजनीतिक विरासत को मतदाता अक्सर निरंतरता और भरोसे के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं। इससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इसे समझे बिना भारतीय राजनीति की व्याख्या अधूरी रहेगी।

और अंत में वह प्रश्न, जिसकी अनुपस्थिति गुहा के लेख में सबसे अधिक खटकती है।

अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन

1991 के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हुए। उदारीकरण ने नई संभावनाएँ पैदा कीं, लेकिन इसके साथ राजनीति और पूँजी के संबंध भी बदल गए। चुनावों की लागत बढ़ी। मीडिया संरचना बदली। बड़े कॉर्पोरेट समूहों का प्रभाव बढ़ा। चुनावी वित्त का केंद्रीकरण हुआ। राजनीतिक दलों के बीच संसाधनों की असमानता अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच गई।

पिछले तीन दशकों की भारतीय राजनीति को समझना हो तो केवल नेताओं और परिवारों को नहीं, बल्कि पूँजी, मीडिया, चुनावी संसाधनों और संस्थागत शक्ति के वितरण को भी समझना होगा। बीजेपी की वर्तमान शक्ति को केवल गांधी परिवार की उपस्थिति से नहीं समझा जा सकता है। उसके पीछे संगठनात्मक क्षमता के साथ-साथ संसाधनों का विशाल संकेन्द्रण भी है।
यही कारण है कि गांधी परिवार की आलोचना उचित हो सकती है, कांग्रेस में अधिक आंतरिक लोकतंत्र की मांग भी पूरी तरह वैध हो सकती है, लेकिन भारत की राजनीतिक कहानी को केवल गांधी परिवार की कहानी बना देना एक गंभीर सरलीकरण है।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि गांधी परिवार क्यों मौजूद है।

वास्तविक प्रश्न यह है कि उसे चुनौती देने वाले लगभग सभी वैकल्पिक शक्ति केंद्र क्यों विफल हुए, और 1991 के बाद भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तनों ने सत्ता के संतुलन को किस प्रकार बदला।

जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए जाते, तब तक यह कहना कि गांधी परिवार ने मोदी को मजबूत किया, भारतीय राजनीति की एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया को एक परिवार की कहानी में समेट देना होगा। इतिहास उससे कहीं अधिक जटिल है, और शायद अधिक दिलचस्प भी।