2025 बैच के 60,244 कांस्टेबल्स की ट्रेनिंग ख़त्म होने के बाद पासिंग आउट परेड का मौक़ा था। मतलब मौक़ा था इन हजारों नए पुलिस कर्मियों को आधिकारिक रूप से सेवा में लिए जाने का। परेड में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद थे। अपनी पीठ थपथपाने के अंदाज़ में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह यूपी पुलिस की अबतक की सबसे बड़ी भर्ती है। इसके बाद योगी अपनी पीठ थोड़ा और ज़ोर से थपथपाते हुए कहते हैं कि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश पुलिस ‘क्राइसिस’ में थी लेकिन अब यह देश की सबसे बेहतर पुलिस में से एक है।

यूपी में कस्टोडियल मौतें

भले ही मुख्यमंत्री दावा करें कि यूपी में ‘गुंडा टैक्स’ ख़त्म हो गया है, ‘माफिया राज’ ख़त्म हो गया है लेकिन यह उत्तर प्रदेश की पुलिस की पूरी तस्वीर नहीं है। यूपी पुलिस की असली तस्वीर नागरिकोन्मुख नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम ‘क्राइम इन इंडिया-2023’ रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश ‘कस्टोडियल डेथ’ यानी हिरासत में मौत के मामलों में भारत में पहले स्थान पर है। भारत के गृह मंत्रालय द्वारा लोकसभा को सूचित किया गया कि 2020-2022 के बीच यूपी में 955 कस्टोडियल मौतें हुई। इसमें 935 मौतें न्यायिक हिरासत में हुईं और 20 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं। 2025-26 के अब तक के आँकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक इस वित्त वर्ष में 15 मौतें कस्टडी में हो चुकी हैं। हो सकता है कि किसी के मन में सवाल आए कि न्यायिक हिरासत (जेल) में हुई मौतों का राज्य की पुलिस से क्या संबंध? संबंध योगी आदित्यनाथ के प्रशासन से है। उसके तौर तरीकों और उसकी असफलता से है। यह बताना इसलिए जरूरी है ताकि लोगों को पता चल सके कि मुख्यमंत्री जिस ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का दम भरते हैं वह यूपी में बुरी तरह धराशायी है। भारत के संविधान की 7वीं अनुसूची के अनुसार ‘जेल’ और ‘उसमें बंद व्यक्ति’ राज्य सूची के अंतर्गत आता है। मतलब यह कि इस विषय पर कानून बनाने और उसका प्रशासन करने का पूर्ण अधिकार राज्य सरकार का है। इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
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पुलिस हिरासत में हाल में हुई मौतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हाथरस की 13 अप्रैल 2026 की ही घटना देखिए। 24 वर्षीय चंद्रपाल को एक लड़की के अपहरण के संदेह में पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत में लिया गया। हिरासत में चंद्रपाल की मौत हो गई। पुलिस ने कहा कि चंद्रपाल शौचालय के बहाने बाहर गया और वहाँ जाकर उसने फाँसी लगा ली। कोई भी सामान्य आदमी पुलिस की इस कहानी पर भरोसा नहीं कर सकता। ऐसा ही मामला लखनऊ के मोहित पांडे का था। मोहित को पुलिस हिरासत में बुरी तरह पीटा गया था। यही यूपी पुलिस का असली चरित्र है जिस पर मुख्यमंत्री नहीं चाहते कि ध्यान भी दिया जाये। कस्टडी में होने वाली मौतों में सर्वाधिक संख्या- अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़ा वर्ग की है। इसलिए यह विषय और भी चिंतनीय है। ये सिर्फ़ मुट्ठीभर मामले नहीं हैं और इन्हें अपवाद समझकर भूल जाना भी बड़ी भूल होगी। उत्तर प्रदेश भारत का वह राज्य है जिसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से सर्वाधिक नोटिस प्राप्त हुए हैं। क्या ऐसी पुलिस को ‘सर्वश्रेष्ठ’ पुलिस बोला जा सकता है?

उत्तर प्रदेश पुलिस की स्थिति

मुख्यमंत्री अपनी और अपनी पुलिस की पीठ थपथपा रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की संख्या, पुलिस सुधार और राज्य में हो रहे अपराधों के मामले में बेहद ख़राब स्थिति में है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट, भारत में न्याय प्रणाली के वितरण का आकलन करती है। यह रिपोर्ट मुख्य रूप से 4 पिलर्स के माध्यम से राज्यों को रैंकिंग प्रदान करती है पुलिस, न्यायपालिका, जेल और क़ानूनी सहायता। अब चूँकि सीएम योगी ने यूपी पुलिस को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हैं तो इंडिया जस्टिस रिपार्ट के माध्यम से यह जानना ज़रूरी है कि सीएम योगी के दावे में कितना दम है। इस रिपोर्ट के हालिया 2025 के संस्करण के अनुसार, न्याय वितरण के पुलिस क्षेत्र में यूपी 18 राज्यों में से 17वें स्थान पर है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र बेहतर पुलिस व्यवस्था के लिए प्रति लाख आबादी के लिए कम से कम 222 पुलिसकर्मियों की अनुशंसा करता है। लेकिन भारत का राष्ट्रीय औसत 153 है, जबकि उत्तर प्रदेश इस औसत से भी नीचे 90 से 133 के बीच में है। जोकि ख़तरनाक रूप से कमजोर अनुपात है। इसकी वजह से पुलिस के काम करने के घंटे बढ़ रहे हैं, उनकी छुट्टियाँ कम हो रही हैं, उनपर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ रहा है। जिसका असर पुलिस की कार्यदक्षता पर दिख रहा है। यूपी पुलिस में अभी भी अनुसूचित जाति के अधिकारियों का कोटा भरा नहीं है, महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

पुलिस के काम करने के घंटे बढ़ रहे हैं, उनकी छुट्टियाँ कम हो रही हैं, उनपर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ रहा है। जिसका असर पुलिस की कार्यदक्षता पर दिख रहा है। यूपी पुलिस में अभी भी अनुसूचित जाति के अधिकारियों का कोटा भरा नहीं है, महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले (2006) में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधार को लेकर व्यापक दिशानिर्देश दिए थे जिनके अनुपालन के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे बदतर राज्यों में से एक है। ‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ (CHRI), 1987 में बना एक NGO है जो प्रकाश सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों के अनुपालन की नियमित समीक्षा करता है। 2024-25 की अपनी समीक्षा में CHRI ने पाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस सुधारों को लागू करने के मामले में सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में से एक है। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि राज्यों में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति यूपीएससी के पैनल के माध्यम से होनी चाहिए लेकिन राज्य एक स्वतंत्र DGP की नियुक्ति से बचने के लिए ‘कार्यकारी’ DGP नियुक्त करते हैं जिससे उन्हें अपने ‘मनपसंद’ का DGP नियुक्त करने में मदद मिल सके। उत्तर प्रदेश की ‘लॉ एंड ऑर्डर’ वाली योगी सरकार ने पिछले 4 सालों से कोई स्थायी DGP ही नियुक्त नहीं किया था। योगी ‘कार्यकारी’ DGP से ही काम चला रहे थे। जरा सोचकर देखिए 22 करोड़ जनसंख्या वाले प्रदेश में एक स्थायी DGP का 4 वर्षों तक ना होना क्या प्रभाव डालता होगा? तमाम बार कोर्ट द्वारा फटकार लगाए जाने के बाद अब यूपी सरकार ने मार्च 2026 में एक स्थायी DGP नियुक्त किया है।

यूपी का PCA बुरी हालत में

प्रकाश सिंह मामले में ‘पुलिस शिकायत प्राधिकरण’(PCA) को बनाने को लेकर भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं। PCA का उद्देश्य पुलिस द्वारा किए जाने वाला दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार और टॉर्चर की शिकायत की जाती है। CHRI की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यूपी का PCA बुरी हालत में है। यह संस्था स्वतंत्र नहीं है और इसमें रिटायर्ड जजों की बजाय अधिकारियों का प्रभुत्व है। मतलब यह हुआ कि योगी जी की ‘सर्वश्रेष्ठ’ पुलिस के ख़िलाफ़ कोई भी निर्णायक कार्यवाही करना बहुत कठिन है। शायद यही कारण है कि यूपी पुलिस बेलगाम हो गई है। ‘वर्ल्ड ऑर्गेनाइज़ेशन अगेंस्ट टॉर्चर’ (OMCT) जिनेवा स्थित 200 से अधिक ग़ैर-सरकारी संगठनों का एक समूह है जिसकी स्थापना 1985 में हुई थी। यह गठबंधन मुख्य रूप से टॉर्चर यानी यातना, बिना मुक़दमे के मिलने वाले मृत्युदंड, जबरन गायब किए जाने और अवैध हिरासत जैसी समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाता है। 90 से अधिक देशों में फैला यह नेटवर्क पीड़ितों की मदद करने के साथ-साथ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और कानूनी सुधारों के लिए भी समर्पित है। इसके अनुसार, भारत पुलिस ‘टॉर्चर’ के मामले में उच्च ख़तरे वाले देशों में शामिल है। भारत टॉर्चर को लेकर पाकिस्तान जैसे देशों के समांतर आकर खड़ा हो गया है। भारत की इस छवि को ख़राब करने के लिए वैसे तो तमाम राज्यों की पुलिस ज़िम्मेदार है लेकिन उत्तर प्रदेश और असम उनमें सबसे आगे हैं। यह रिपोर्ट जो कहती है उससे मिलता-जुलता उत्तर राज्य का कोई भी समान्य इंसान देख सकता है।
विचार से और
‘ऑपरेशन लंगड़ा’, एनकाउंटर, हाफ-एनकाउंटर जैसे शब्द उत्तर प्रदेश में आम हो चुके हैं। सीएम योगी के कार्यकाल में अबतक लगभग 15,000 एनकाउंटर किए जा चुके हैं जिनमें लगभग 10,000 लोग घायल (हाफ-एनकाउंटर) हुए और लगभग 256 लोगों की मौत हुई है। सिर्फ़ 2025 में ही एनकाउंटर से होने वाली मौतों की संख्या 48 रही है। न्यायपालिका के परिक्षेत्र के बाहर होने वाली उन मौतों को एमनेस्टी इंडिया जैसे संगठन ‘फेक’ और ‘ग़ैर-न्यायिक हत्याएं’ मानते हैं। यह सब तब है जबकि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के यातना विरोधी कन्वेंशन पर 1997 में हस्ताक्षर किए हैं।
हिंसा यूपी का कल्चर बन चुका है। भारत में बंदूक हिंसा के सबसे ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज होते हैं। अवैध हथियारों का सर्वाधिक इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में किया जाता है। उत्तर प्रदेश में ‘आर्म्स एक्ट’ के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है।

यूपी में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध

भले ही यूपी के सीएम योगी, यूपी पुलिस को सर्वश्रेष्ठ पुलिस मानते हों लेकिन तथ्य यह है कि यूपी में अपराध की दर और उसकी प्रकृति भयावह है। उत्तर प्रदेश अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के मामलों में भारत में पहले स्थान पर है। दलितों के ख़िलाफ़ भारत में होने वाले कुल अपराधों में से लगभग 28% अकेले उत्तर प्रदेश में होते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि प्रदेश की पुलिस, दलितों की सुरक्षा में नाकाम है। आज भी (NCRB-2023) महिलाओं के ख़िलाफ़ सर्वाधिक अपराध उत्तर प्रदेश में ही दर्ज किए गए हैं। प्रतिशत में भले ही यूपी को थोड़ी राहत मिली हो लेकिन महिलाओं के ख़िलाफ़ जिस तरह के अपराध यूपी में हो रहे हैं वो राज्य के नेतृत्व पर भी सवाल उठाते हैं। 2025 का बुलंदशहर का वो मामला कैसे भुलाया जा सकता है जब 28 साल की एक बलात्कार पीड़िता शिकायत दर्ज कराने पुलिस थाने पहुँचती है और थाने में दो पुलिसकर्मी उसका फिर से बलात्कार करते हैं और उससे 50,000 रुपए भी वसूल लेते हैं। 2022 में ललितपुर की 13 साल की बच्ची जब पुलिस थाने में गैंग-रेप का मामला दर्ज कराने पहुँचती तो थाने में पुलिस अधिकारी ही उसका बलात्कार कर डालता है। 
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2020, हाथरस में किस तरह 19 साल की बलात्कार पीड़िता जिसकी हत्या कर दी गई थी उसका दाह संस्कार पुलिस जबरन करवा देती है। सिद्दीक कप्पन जैसे पत्रकार जो इसे कवर करने पहुंचते हैं इन पर UAPA थोप दिया जाता है। हाथरस की पीड़िता का बयान नहीं माना जाता है, बार बार कहने पर भी बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया जाता है। अथाह पीड़ा से गुज़र रही दलित लड़की को प्रशासन सुनने से इनकार कर देता है। बाद में सरकार को शर्म आती है और पुलिस अधीक्षक विक्रांत वीर को सस्पेंड किया जाता है। लेकिन तब तक पीड़िता मर चुकी थी। पीडिता के मर जाने के बाद लाठी पीटने, लाठी भांजने से क्या फ़ायदा? मैं बस ये कहना चाहता हूँ कि यह कोई पुलिसिंग नहीं है।
एक असंवेदनशील पुलिस प्रशासन आसमान से उतरी हुई चीज नहीं है। यह राजनैतिक नेतृत्व के आसपास ही पनपता है और बढ़ता है। एक कमजोर नेतृत्व बेलगाम पुलिसबल को तैयार करता है। और इस तरह कानून का शासन ख़ुद ब ख़ुद ढह जाता है। शोर, दावे, वादे और भाषण कानून के शासन को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष पुलिस तंत्र अभय और विकास का माहौल बनाता है। दुर्भाग्य से यह माहौल यूपी में अनुपस्थित है, जिसके जिम्मेदार प्रदेश के मुख्यमंत्री को ही माना जाना चाहिए।