प्रतीकात्मक तस्वीर (एआई जेनरेटेड)
अनेक यूरोपीय देश आज अभूतपूर्व खाद्य-संकट की दहलीज पर हैं। इनमें भी यूनाइटेड किंगडम के लिये संकट कुछ अधिक गहरा है। घटनाक्रम ने उसे संकट के ऐसे मुहाने पर खड़ा कर दिया है कि सन 1940 के दशक की यादें ताज़ा हो आई हैं। इस संकट की जड़ में रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका जंग के साथ-साथ मौसम और कृषि संबंधी प्रकरण निहित हैं।
इसी वर्ष जून माह में बैरोमीटर में पारा इस तरह उठा कि यूरोप बिलबिला उठा। बड़ी मात्रा में जन-धन की क्षति हुई। ग्रीष्म के प्रकोप से दो बिलियन यूरो की क्षति का अनुमान है, वहीं खाद्यान्न उत्पादन में 90 लाख टन की गिरावट आई। इस वर्ष सन 2018 के बाद महाद्वीप में न्यूनतम उत्पादन दर्ज किया गया। फलत: यूरोपीय यूनियन को अपने नागरिकों को अन्न के भंडारण का परामर्श देना पड़ा।
संकट के बड़े कारण
इस अभूतपूर्व संकट के तीन प्रमुख कारण बताये जा रहे हैं: प्रथम चरम मौसम, द्वितीय मुद्रा स्फीति और तृतीय अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन जंग। शुष्क बसंत के बाद उच्च तापमान से उत्पादन को तो क्षति पहुंचा दी, दावानल का भी खतरा उत्पन्न हो गया। उल्लेखनीय है कि यूरोप के अधिक उपज के राष्ट्रों में जहां तुर्की, रूस, आयरलैंड, लक्जमबर्ग, बोस्निया, पोलैंड, पुतर्गाल और साइप्रस शुमार हैं, वहीं निम्न खाद्य उत्पादन सूचकांक के राष्ट्रों में क्रमश: यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड, ऑस्ट्रिया, स्पेन, फिनलैंड, इटली, फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम का स्थान है। निम्न सूचकांक की तालिका में सबसे नीचे हंगरी स्थित है।
यह दिलचस्प बात है कि निम्न सूचकांक तालिका में होने के बावजूद खाद्य सुरक्षा सूचकांक में फिनलैंड सर्वोच्च पायदान पर है। उत्पादन की क्षमता, उपलब्धता और गुणवत्ता के आधार पर आँके गये सूचकांक के मान से फिनलैंड, आयरलैंड और नॉर्वे पहली, दूसरी और तीसरी पायदान पर हैं।
उत्पादन और सुरक्षा सूचकांकों के मान से यूनाइटेड किंगडम की स्थिति दिनोंदिन बद से बदतर होती जा रही है। गत दिसंबर में वहां उपभोक्ता वस्तुओं के दाम दस फीसद बढ़े और खाद्य शृंखला की टूटी हुई कड़ियां उजागर होने लगीं।
जून तक ब्रिटेन में सुपर मार्केटों में चिकेन और सुअर के गोश्त की कमी दिखने लगी। उपलब्धता और क्रय शक्ति में एक साथ कमी आना चिंताजनक था।
1940 के संकट की याद ताज़ा हो आई
विशेषज्ञों को सन 1940 के दशक की यादें ताज़ा हो आईं। एक वक्त था कि ब्रिटेन अपने घरेलू स्रोतों को लेकर आश्वस्त था, लेकिन अब वह 50 फीसद आयात पर निर्भर है। उसका 45 से 50 प्रतिशत आयात स्पेन, फ्रांस, नीदरलैंड, कोलंबिया, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील से है। वहां 85 फीसद फल और 55 फीसद तरकारियां बाहर से आती हैं। उन देशों की फेहरिस्त लंबी है, जहां से यूके जरूरी चीजें मंगाता है। इस सूची में नीदरलैंड, फ्रांस आयरलैंड, बेल्जियम, जर्मनी, स्पेन, इटली, पोलैंड, अमेरिका, ब्राजील, चीन, डेनमार्क, थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, भारत, नॉर्वे, अर्जेंटीना, कनाडा और न्यूजीलैंड का समावेश है। युद्धग्रस्त यूक्रेन आज भी गेंहू का कटोरा (व्हीट बाउल) है और प्रमुख सूरजमुखी तेल उत्पादक राष्ट्र है। उसके बंदरगाहों की तबाही ने यूरोप को निर्यात पर असर डाला है। शीतयुद्ध में अनाज के हथियार की तरह उभरने में भी यूरोप के माथे पर शिकन पैदा की है। ईरान-अमेरिका युद्ध से आपूर्ति अब निरापद नहीं रही। यूक्रेन और होर्मुज संकट से आपूर्ति संकट में है और तेलों तथा वस्तुओं के दाम बढ़ना तय है। 'जस्ट इन केस' के लेखक प्रो. टिम लांग का कहना है कि ब्रिटेन में जरूरत का आधा से अधिक खाद्य हवाईअड्डों, बंदरगाहों व सड़कों से आता है और वे भेद्य हैं। यकीनन संकट आसन्न है। यह खाद्य प्रत्यास्थता की परीक्षा की घड़ी है। आज से चार दशक पहले विश्व मुद्रा कोष ने ईंधन संकट के मद्देनज़र अनाज पकाने के लिए अनाज उगाने की नौबत की चेतावनी दी थी। अब यूरोप में यत्र-तत्र खाद्य संकट उभर सकता है और समय रहते स्थिति से निपटा नहीं गया तो निवाले के लाले पड़ सकते हैं।