2026 के इंडिया एआई इंपैक्ट समिट में जो कुछ हुआ, वह किसी एक विश्वविद्यालय या एक प्रोफेसर की भूल भर नहीं था। यह उस बीमारी का ताज़ा लक्षण था, जो पिछले एक–दो दशक से भारतीय अकादमिक और शोध संस्थानों को भीतर से खोखला कर रही है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा मंच पर ‘इन-हाउस इनोवेशन’ बताकर दिखाया गया रोबोट डॉग—जिसे “ओरियन” नाम दिया गया—असल में चीन की Unitree Robotics का रेडी-मेड कमर्शियल मॉडल निकला। यह घटना सिर्फ एक “फेक डेमो” नहीं थी; यह बताती है कि कैसे प्लेजरिज्म और मिसरिप्रेजेंटेशन अब प्रयोगशालाओं से निकलकर पब्लिक स्पेस और राष्ट्रीय आयोजनों तक पहुंच चुके हैं।

इनोवेशन का दिखावा, सच्चाई का अभाव

किसी विदेशी कंपनी का उत्पाद खरीदकर उसे अपना बताना—और वह भी राष्ट्रीय मंच पर—दोहरी समस्या को उजागर करता है। पहली, संस्थागत सत्यापन की कमी; दूसरी, उस संस्कृति का सामान्यीकरण जिसमें “दिखना” ज़्यादा अहम है, “होना” नहीं। जब प्रोफेसर टीवी कैमरे के सामने बिना जाँच-पड़ताल के ऐसे दावे करते हैं, तो सवाल सिर्फ व्यक्तिगत नैतिकता का नहीं रहता—यह पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर चोट है।

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चीन के मीडिया ने इस प्रकरण को ‘embarrassing plagiarism’ कहा। यह तंज नहीं, चेतावनी है। क्योंकि जब हम तकनीकी आत्मनिर्भरता का दावा करते हैं और मंच पर खरीदी हुई मशीन को “स्वदेशी नवाचार” बताकर पेश करते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय भरोसा टूटता है।

परेशान करने वाला ट्रैक रिकॉर्ड

भारत में प्लेजरिज्म और रिसर्च मिसकंडक्ट का इतिहास छोटा नहीं है। अकादमिक जगत में PubPeer जैसे प्लेटफॉर्म पर भारतीय शोधकर्ताओं के सैकड़ों पेपरों पर सवाल उठे हैं—इमेज डुप्लिकेशन, डेटा मैनिपुलेशन, फिगर री-यूज़ जैसे आरोप आम हो चुके हैं। कई मामलों में जर्नल्स को पेपर वापस लेने पड़े, लेकिन संस्थागत कार्रवाई या तो हुई ही नहीं, या बहुत हल्की रही।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और वाइस चांसलर रहे अविनाश चंद्र पांडे के दर्जनों पेपरों पर सवाल उठे; कुछ रिट्रैक्ट भी हुए। इसके बावजूद वे आज भी प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े हैं। यही पैटर्न अन्य नामों में भी दिखता है—IIT धनबाद, पेरियार यूनिवर्सिटी, और Saveetha Institute से जुड़े शोधकर्ताओं के बड़े पैमाने पर रिट्रैक्शन इसका उदाहरण हैं।

CSIR और “राष्ट्रीय प्रतिष्ठा” का भ्रम

कभी-कभी तर्क दिया जाता है कि “ये तो इक्का-दुक्का मामले हैं।” लेकिन जब CSIR जैसी शीर्ष संस्था की लैब्स से जुड़े सैकड़ों पेपरों पर सवाल उठते हैं तो यह तर्क ढह जाता है। 2019 में ही 100 से अधिक पेपर रिट्रैक्ट हुए; 2023 तक यह संख्या हज़ारों में पहुंच गई। यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं—यह उस शोध संस्कृति का आईना है जिसमें आउटपुट की संख्या गुणवत्ता से ऊपर रख दी गई।

पूर्व CSIR वैज्ञानिक अशोक पांडे के दर्जनों पेपरों का रिट्रैक्ट होना, एडिटोरियल मिसकंडक्ट के आरोप—ये सब बताते हैं कि समस्या “जूनियर बनाम सीनियर” की नहीं है। यहां पद, पुरस्कार और नेटवर्क कई बार जवाबदेही से ढाल बन जाते हैं।
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जब बड़े नाम भी नहीं बचे

प्लेजरिज्म का मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है जब देश के सबसे सम्मानित वैज्ञानिकों में शुमार नाम भी घेरे में आते हैं। आर. ए. माशेलकर—CSIR के पूर्व प्रमुख और पद्म विभूषण सम्मानित—पर 2007 में पेटेंट कानून पर तैयार रिपोर्ट में प्लेजरिज्म के आरोप लगे। रिपोर्ट वापस ली गई; उन्होंने “अनजाने में हुई गलतियों” की बात कही। लेकिन सवाल यह है: जब शीर्ष स्तर पर भी परिणाम इतने सीमित हों, तो नीचे तक क्या संदेश जाता है? The Times of India जैसी मुख्यधारा मीडिया में यह खबर छपी, बहस हुई—पर संरचनात्मक सुधार नहीं हुए।

“पब्लिश ऑर पेरिश”: दबाव का दुष्चक्र

भारत में इस प्रवृत्ति के पीछे सबसे बड़ा कारण वही है जिसे अकादमिक दुनिया “Publish or Perish” कहती है। प्रमोशन, ग्रांट, रैंकिंग—सब कुछ पेपरों की संख्या से जोड़ा गया। गुणवत्ता की जांच के लिए समय, संसाधन और इच्छाशक्ति—तीनों की कमी रही। परिणामस्वरूप:
  • जल्दबाज़ी में शोध: पर्याप्त रिप्लिकेशन या वेरिफिकेशन के बिना निष्कर्ष।
  • इमेज और डेटा मैनिपुलेशन: क्योंकि “पॉज़िटिव रिज़ल्ट” चाहिए।
  • पेपर मिल्स का उदय: पैसे देकर तैयार पांडुलिपियाँ।
  • संस्थागत चुप्पी: शिकायत आए तो “आंतरिक समिति” बनाकर मामला ठंडे बस्ते में।

गलगोटिया का रोबोडॉग दिखाता है कि यही मानसिकता अब “इन्वेंशन” के दावों तक फैल चुकी है—खरीदो, नाम बदलो, तालियाँ बटोर लो।

अंतरराष्ट्रीय छवि और घरेलू नुकसान

इसका असर सिर्फ प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रभावित होते हैं—विदेशी यूनिवर्सिटीज़ और फंडिंग एजेंसियाँ सावधान हो जाती हैं। घरेलू प्रतिभा का मनोबल टूटता है—ईमानदारी से काम करने वाले शोधकर्ता हाशिये पर चले जाते हैं। नीतिगत फैसले कमजोर होते हैं—जब वैज्ञानिक सलाह संदिग्ध डेटा पर आधारित हो।
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क्या किया जाए?

  • कठोर और स्वतंत्र जांच: संस्थानों से स्वतंत्र राष्ट्रीय रिसर्च इंटेग्रिटी अथॉरिटी, जिसके फैसले बाध्यकारी हों।
  • दंड का वास्तविक अर्थ: रिट्रैक्शन के साथ पद, ग्रांट और प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर असर।
  • मेट्रिक्स का सुधार: संख्या नहीं, पुनरुत्पादकता (reproducibility) और ओपन डेटा को महत्व।
  • व्हिसलब्लोअर संरक्षण: शिकायत करने वालों को सुरक्षा, न कि प्रताड़ना।
  • पब्लिक डेमो में सत्यापन: “इन-हाउस इनोवेशन” के दावों के लिए थर्ड-पार्टी ऑडिट।

क्या हम कोई सबक लेंगे?

रोबोडॉग प्रकरण एक आईना है—हम चाहें तो उसमें खुद को देखकर सुधार कर सकते हैं, या फिर आईना तोड़ सकते हैं। सवाल यह नहीं कि गलतियाँ हुईं; सवाल यह है कि क्या हम उन्हें स्वीकार कर सुधारेंगे?

अगर नहीं, तो “वैश्विक ज्ञान शक्ति” बनने का सपना खोखला रहेगा—तालियों की आवाज़ में सच्चाई दबती रहेगी, और अगला रोबोडॉग फिर किसी मंच पर मुस्कुराता हुआ खड़ा होगा।

सबक साफ है: विज्ञान में शॉर्टकट नहीं चलते। ईमानदारी ही असली इनोवेशन है।