loader

कांग्रेस के लिए गांधी परिवार मजबूरी या मुसीबत!

कांग्रेस को यह समझना होगा कि भारतीय जनता पार्टी गांधी-नेहरू परिवार पर जितना तीखा हमला बोलती है तो उसका मतलब परिवारवाद या वंशवाद पर हमला बोलना नहीं होता। यह बीमारी तो उसके अपने भीतर भी है। सच्चाई तो यह है कि बीजेपी जानती है कि कांग्रेस को मृत्युशैया से वापस देश की मुख्यधारा की दौड़ में शामिल कराने की क्षमता इसी परिवार ने दिखाई है। 
राजेश बादल

राजनीति अब सेवा नहीं रही। इसने पेशे का रूप ले लिया है। ऐसे में संसार की सबसे पुरानी पार्टियों में से एक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं खोज पाना हैरत में डालता है। इन दिनों मौजूदा सियासत चेहरों पर चलती है। जिस दल के पास जितने अधिक और चमकदार चेहरे होंगे, वह अन्य दलों पर भारी पड़ जाएगा। 

यह दृश्य अस्सी के दशक की भारतीय हिंदी फ़िल्मों का स्मरण कराता है। कहानी और गीत कमज़ोर होते, तो निर्माता-निर्देशक बहु सितारा फ़िल्म बनाते थे। यानी सारे बिकने वाले अभिनेता-अभिनेत्री फ़िल्म में नज़र आते थे। फ़िल्म अपना ख़र्चा निकाल लेती और कुछ मुनाफ़ा भी कमा लेती थी। इस तरह वैतरणी पार हो जाती थी। आज सियासत भी ऐसी ही है। चेहरों के भाव लगाइए और स्थिति मज़बूत बनाइए। 

ताज़ा ख़बरें

विडंबना है कि कांग्रेस चेहरे के अकाल का सामना कर रही है। एक चेहरा नहीं होने से सारे देश की ज़मीन भी चेहरों की फसल नहीं उगल पा रही है।

शिखर चेहरे का ही वर्चस्व?

लेकिन क्या अकेले इसी राष्ट्रीय दल की ऐसी दुर्दशा है? शायद नहीं। कमोबेश हर प्रादेशिक राजनीतिक दल में यही मंज़र है। उनमें भी एक ही चेहरा खूँटा गाड़े बैठा है। जिस दिन यह चेहरा विलुप्त हो जाएगा, उस दिन इन पार्टियों का महल भरभरा कर नहीं गिरेगा, इसकी क्या गारंटी है। तो क्या पार्टियों का शिखर चेहरा ही अपने दल में अन्य चेहरों को पनपने नहीं दे रहा है? इसका यह अर्थ क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए कि बाड़ अब खेत को ही खाने पर उतारू हो गई है। इसे आप उस पेड़ की तरह भी मान सकते हैं, जो अपनी छाँव तले अन्य पौधों को बढ़ने नहीं देता। 

हक़ीक़त तो यही है कि भारतीय लोकतंत्र में एक बार प्रादेशिक और क्षेत्रीय सियासी पार्टियाँ तो अपने चेहरे के खो जाने का जोख़िम उठा सकती हैं, मगर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस जैसी पार्टी के चेहरा विहीन हो जाने का मतलब प्रतिपक्ष के पाँव उखड़ जाने जैसा है।

ऐसे में लोकतंत्र के क़िले पर तानाशाही के घुड़सवारों को चढ़ाई करने से आप कैसे रोक सकते हैं। ख़ासतौर पर उस हाल में, जबकि भारतीय जनता पार्टी के शिखर नेतृत्व ने कांग्रेस का अस्तित्व शून्य पर लाने के लिए आक्रामक अभियान छेड़ रखा हो। 

अगर, अँग्रेज़ भारत पर लंबे समय तक राज कर सके तो यह उनकी क़ाबिलियत तो थी ही, पर भारत का अंदरूनी तंत्र भी लुंज-पुंज था। इसलिए कांग्रेस को अपना गढ़ गिराने के लिए बीजेपी पर दोषारोपण करते रहने से ही कुछ हासिल नहीं होगा। उसे अपनी सेहत भी सुधारनी होगी। 

कई बार आई मुसीबत 

वैसे, आज़ादी के बाद यह कोई पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस इस तरह के दुर्दिनों का सामना कर रही है। नेहरू युग के बाद पाँच साल में पार्टी के दिग्गजों ने 1969 आते-आते इस दल का भुर्ता बना दिया था। इंदिरा गांधी ने कायाकल्प नहीं किया होता तो आज कांग्रेस को खोजने के लिए बड़ी मशक़्क़त करनी होती। इसके बाद 1979 में भी कांग्रेस के बचे-खुचे नेताओं ने फिर पार्टी की नैया डुबोई। विभाजन हुआ और इंदिरा की बदौलत एक बार फिर संगठन देश का राज सँभालने के लिए आगे आया। 

कांग्रेस में नेतृत्व संकट के मुद्दे पर देखिए, वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का वीडियो- 

इस विराट दल के समक्ष अपने को बचाने का तीसरा संकट 1996 के चुनाव के बाद आया। नरसिंह राव ने बेशक देश को वित्तीय बदहाली से निकाला, मगर उन्होंने अपने दल के उन सारे नेताओं को उखाड़ फेंका, जो उनके लिए सियासी संकट उत्पन्न कर सकते थे। पार्टी अपने सबसे दुर्बल स्वरूप में थी। इस दरम्यान सोनिया संकटमोचक बनीं और कुछ साल की संगठनात्मक क़वायद के बाद पार्टी ने दस बरस तक राज किया। 
इन उदाहरणों से आप यह सन्देश निकाल सकते हैं कि कांग्रेस जब-जब भी इतिहास के अपने सबसे निर्बल और महीन आकार में दिखाई दी है, उसके ठीक बाद वह वापसी करती है। पर इस आशावाद के भरोसे लोकतंत्र को आसरा नहीं मिल सकता।

गांधी-नेहरू परिवार का नेतृत्व

कांग्रेस को यह समझना होगा कि भारतीय जनता पार्टी गांधी-नेहरू परिवार पर जितना तीखा हमला बोलती है तो उसका मतलब परिवारवाद या वंशवाद पर हमला बोलना नहीं होता। यह बीमारी तो उसके अपने भीतर भी है। सच्चाई तो यह है कि बीजेपी जानती है कि कांग्रेस को मृत्युशैया से वापस देश की मुख्यधारा की दौड़ में शामिल कराने की क्षमता इसी परिवार ने दिखाई है। 

विचार से और ख़बरें

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के अनेक राष्ट्रीय अध्यक्ष इस परिवार से बाहर के रहे हैं लेकिन संगठन में प्राण फूँकने का उनका कोई करिश्मा नहीं दिखाई दिया। यदि परिवार की नौजवान पीढ़ी ने एक बार मज़बूती से कमान सँभाल ली तो बीजेपी की चुनौतियाँ बढ़ जाएँगी।

भारतीय जनता पार्टी का प्रोपेगेंडा प्रकोष्ठ राहुल गांधी को जब-तब पप्पू साबित करने की मुहिम छेड़ता है तो उसके पीछे यह भी एक कारण है। 

आंतरिक द्वंद्व से उबरे पार्टी 

कांग्रेस को जल्द से जल्द अपने आंतरिक द्वंद्व से उबरना होगा। यदि यह पार्टी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका का श्रेय लेती रही है तो आत्मघाती क़दमों से अपने विलुप्त होने की पटकथा लिखकर भारतीय लोकतंत्र पर करारा प्रहार करने की वजह भी उसे देश को बतानी होगी।  

'सत्य हिन्दी'
की ताक़त बनिए

गोदी मीडिया और विशाल कारपोरेट मीडिया के मुक़ाबले स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ दीजिए और उसकी ताक़त बनिए। 'सत्य हिन्दी' की सदस्यता योजना में आपका आर्थिक योगदान ऐसे नाज़ुक समय में स्वतंत्र पत्रकारिता को बहुत मज़बूती देगा। याद रखिए, लोकतंत्र तभी बचेगा, जब सच बचेगा।

नीचे दी गयी विभिन्न सदस्यता योजनाओं में से अपना चुनाव कीजिए। सभी प्रकार की सदस्यता की अवधि एक वर्ष है। सदस्यता का चुनाव करने से पहले कृपया नीचे दिये गये सदस्यता योजना के विवरण और Membership Rules & NormsCancellation & Refund Policy को ध्यान से पढ़ें। आपका भुगतान प्राप्त होने की GST Invoice और सदस्यता-पत्र हम आपको ईमेल से ही भेजेंगे। कृपया अपना नाम व ईमेल सही तरीक़े से लिखें।
सत्य अनुयायी के रूप में आप पाएंगे:
  1. सदस्यता-पत्र
  2. विशेष न्यूज़लेटर: 'सत्य हिन्दी' की चुनिंदा विशेष कवरेज की जानकारी आपको पहले से मिल जायगी। आपकी ईमेल पर समय-समय पर आपको हमारा विशेष न्यूज़लेटर भेजा जायगा, जिसमें 'सत्य हिन्दी' की विशेष कवरेज की जानकारी आपको दी जायेगी, ताकि हमारी कोई ख़ास पेशकश आपसे छूट न जाय।
  3. 'सत्य हिन्दी' के 3 webinars में भाग लेने का मुफ़्त निमंत्रण। सदस्यता तिथि से 90 दिनों के भीतर आप अपनी पसन्द के किसी 3 webinar में भाग लेने के लिए प्राथमिकता से अपना स्थान आरक्षित करा सकेंगे। 'सत्य हिन्दी' सदस्यों को आवंटन के बाद रिक्त बच गये स्थानों के लिए सामान्य पंजीकरण खोला जायगा। *कृपया ध्यान रखें कि वेबिनार के स्थान सीमित हैं और पंजीकरण के बाद यदि किसी कारण से आप वेबिनार में भाग नहीं ले पाये, तो हम उसके एवज़ में आपको अतिरिक्त अवसर नहीं दे पायेंगे।
राजेश बादल
सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें

अपनी राय बतायें

विचार से और खबरें

ताज़ा ख़बरें

सर्वाधिक पढ़ी गयी खबरें