एक ओर भारत सरकार देश में भारतीय ज्ञान प्रणाली कायम करने का दावा कर रही है तो दूसरी ओर भारतीय विश्वविद्यालयों में विद्वता का वातावरण निरंतर पतित होता जा रहा है। अभी हाल में विलासपुर के घासीराम केंद्रीय विश्वविद्यालय में मध्य प्रदेश के कहानीकार मनोज रूपड़ा के साथ कुलपति महोदय ने जो अशोभनीय व्यवहार किया उससे पूरा सोशल मीडिया गूंज रहा है। स्वाभिमानी रचनाकारों ने इसे हिंदी समाज की पूरी लेखकीय बिरादरी का अपमान बताकर राज्यपाल और राष्ट्रपति को पत्र भी भेजा है। गुजराती पृष्ठभूमि और संपर्कों के माध्यम से कुलपति बने कथित साहित्यकार प्रोफेसर आलोक कुमार चक्रवाल महोदय साहित्य अकादमी और विश्वविद्यालय के तत्वावधान में हिंदी कहानी पर आयोजित एक सेमिनार में अपने बहके हुए विचार व्यक्त कर रहे थे। उस दौरान मोबाइल पर लगे एक कहानीकार मनोज रूपड़ा से उन्होंने पूछ ही लिया कि क्या आप बोर हो रहे हैं? मनोज रूपड़ा ने बेबाक तरीके से कह दिया कि आप विषय पर आएं। रूपड़ा जी का बस इतना कहना था कि कुलपति महोदय दुर्वासा हो गए। उन्होंने उन्हें बेइज्जत करते हुए कार्यक्रम से बाहर कर किया।

एक ओर लोग कुलपति के इस व्यवहार की आलोचना कर रहे हैं तो दूसरी ओर ऐसा कहने वाले भी हैं कि कांग्रेसी दौर में वामपंथी कुलपति होते थे। वे लोग दूसरी विचारधारा के लोगों की उपेक्षा करते थे। आज जब भाजपा की सरकार है तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विद्यार्थी परिषद के लोग कुलपति हो रहे हैं और परिषद वाले ही तय करते हैं कि कौन कुलपति हों। इसलिए जैसे तब संघ जैसे दक्षिणपंथी और दूसरे विचारों के लोग सहते थे वैसे आज वामपंथी और कांग्रेसी विचार वालों को सहना चाहिए। ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि तब साहित्यकारों की एक गरिमा होती थी और आंख मूंदकर भेदभाव नहीं होता था।
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जब मुख्यमंत्री को हटा दिया गया था

बात 1981 की है। जयपुर में कोई साहित्यिक कार्यक्रम था जिसमें महान कवयित्री महादेवी वर्मा गई हुईं थीं। संयोग से उस कार्यक्रम में राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया भी थे। महादेवी जी ने अपने व्याख्यान में राजनेताओं की थोड़ी सी आलोचना की तो नाराज पहाड़िया जी ने कह दिया कि वे पता नहीं कैसी कविता लिखती हैं जो उनके कभी समझ में नहीं आई। यह टिप्पणी दूसरे दिन सभी अखबारों में रिपोर्ट हुई। बात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंची। उन्होंने पहाड़िया को बुलाया और यह कहते हुए मुख्यमंत्री पद से हटा दिया कि आपको महादेवी की कविता समझने की क्या जरूरत आन पड़ी। यहां यह बताने की जरूरत है कि तमाम दक्षिणपंथी साहित्यकार जिनमें विष्णुकांत शास्त्री, कृष्ण बिहारी मिश्र या विद्यानिवास मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है, ने अपनी रचनाशीलता और सफलता के झंडे उसी समय गाड़े जब पश्चिम बंगाल या उत्तर प्रदेश और दिल्ली में क्रमश: वाम मोर्चा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की सरकारें थीं।

संघ के प्रभाव में शैक्षणिक संस्थाओं की हालत यह हो गई है कि तमाम विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्तियां और पाठ्यक्रमों का निर्धारण अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता और संघ के पदाधिकारी कर रहे हैं। राजस्थान के चार विश्वविद्यालयों के कुलपति इसलिए बदले गए क्योंकि एबीवीपी के पदाधिकारी उन्हें चाहते नहीं थे। एबीवीपी के एक कार्यकर्ता को वर्धा विश्वविद्यालय का कुलपति बनाने का परिणाम विश्वविद्यालय भुगत चुका है। 
दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थिति यह है कि वहां जिस संदेहास्पद और पक्षपाती तरीके से शिक्षकों की नियुक्तियां हो रही हैं उनसे विद्यार्थी परेशान हैं। क्योंकि उन शिक्षकों को पढ़ाना ही नहीं आता। आखिरकार सारा भार पुराने शिक्षकों पर आ पड़ा है। इसके अलावा विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रमों का निर्धारण कठिन होता जा रहा है। ज्यादातर विदेशी विद्वानों की पुस्तकें और वैश्विक ज्ञान को पाठ्यक्रम से बाहर किया जा रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर हड़बड़ी में तैयार की गई किताबें कोर्स में लगाई जा रही हैं। जिन पुराने शिक्षकों को ज्ञान के प्रति थोड़ी बहुत ललक बची है वे किसी प्रकार से उसे बचाने में लगे हैं। 

निशाने पर जवाहर लाल नेहरू और गांधी ही नहीं हैं, वह हर राष्ट्रीय और वैश्विक व्यक्तित्व है जो धार्मिक कट्टरता और जाति वर्ण व्यवस्था का विरोधी है।

जेएनयू निशाने पर क्यों?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तो 2014 से ही निशाने पर है। एक तरह से उस विश्वविद्यालय के अस्तित्व पर ही हमला किया जा रहा है। पता नहीं जवाहर लाल नेहरू का नाम कब बदलेंगे लेकिन उनके उदार और लोकतांत्रिक समाजवादी विचार को डुबोने की पूरी तैयारी हो चुकी है। वह विश्वविद्यालय आज भी अपनी रैंकिंग में भारत का श्रेष्ठ विश्वविद्यालय है लेकिन कब तक रहेगा, कहा नहीं जा सकता। शायद ऐसा कुछ श्रेष्ठ शिक्षकों और विद्यार्थियों में बचे खुचे वामपंथी और लोकतांत्रिक प्रभावों के कारण है। विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं पर बाहरी गुंडों के माध्यम से हमला तो करवाया ही जाता है परिसर के भीतर छात्रों के लोकतांत्रिक प्रतिरोध के अधिकारों को हर समय देशद्रोह बता दिया जाता है। लगभग पूरे देश में यह प्रचार कर दिया गया है कि जेएनयू में देशद्रोही लोग पढ़ते और पढ़ाते हैं और सबके सब चरित्रहीन हैं।

हाल में ये खबरें आई हैं कि भारत पर अध्ययन करने वाले विदेशी विद्वानों को हतोत्साहित किया जा रहा है। हिंदी की विदेशी विद्वान फ्रैंचेस्का ओसनी को इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से वापस लौटा दिया गया। अगर यह सिलसिला चलता रहा तो कैसे कोई माइरन वीनर, पाल आर ब्रास, डेविड सी लारेंजन, क्रिस्टोफ जैफ्रलां, मार्जिया कारसोलारी, आंद्रे बेते, लुई दुमां, मैक्स मुलर, ज्यां द्रेज, विलियम क्रुक, ए.एल. बासम, पर्सिवल स्पीयर, लोथार लुत्से गेल आम्बेट, एलीनर जीलियट आगे बढ़कर भारत के बारे में शोध कर कोई नया दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकेगा।
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अमर्त्य सेन को एसआईआर पर नोटिस

विद्वानों की बेकद्री का आलम यह है कि हाल में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के घर पर चुनाव आयोग ने इस बात का नोटिस भिजवा दिया कि उनकी और उनकी मां की उम्र में महज 15 साल का अंतर क्यों है। विडंबना यह है कि अमर्त्य सेन स्वयं 92 साल के हैं। हालांकि बाद में आयोग ने उस नोटिस को वापस लिया और कहा कि चूंकि वे 85 वर्ष से अधिक अवस्था के हैं इसलिए आयोग के कर्मचारियों ने ही उनके घर जाकर इस विसंगति को दूर कर लिया। विडंबना देखिए कि भारतीय ज्ञान परंपरा और विऔपनिवेशीकरण पर काम करने का दावा करने वाली सरकार ने दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में चल रही गंभीर शोध परियोजना को ही ठप कर दिया। दो साल तक चली इस परियोजना के तहत काफी काम हुआ था और एक प्रोफेसर के साथ नौ फेलो इस काम में जुटे थे। काम के प्रकाशन की तो बात दूर उस परियोजना के लिए आए हुए बजट को वापस कर दिया गया और लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने अध्येताओं का वेतन ही रोक दिया।

स्वाधीन भारत में महान कुलपतियों की लंबी परंपरा रही है। जिनमें आचार्य नरेंद्र देव का भी नाम शामिल है जो लखनऊ विश्वविद्यालय (1947-1951) के साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय (1951-54) के भी कुलपति रहे। उनकी दार्शनिकता और बहुभाषी विद्वता के समक्ष बड़े बड़े नतमस्तक होते थे और उनकी इज्जत प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू तक करते थे। उन्होंने छात्रों को राजनीति के लिए हतोत्साहित करने के बजाय तमाम छात्र नेता तैयार किए। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और लाल बहादुर शास्त्री जैसे लोग उनकी विद्वता और नैतिकता से प्रभावित थे। राधाकमल मुखर्जी जैसे विद्वान समाजशास्त्री और अर्थशास्त्री लखनऊ विश्वविद्यालय के (उप) कुलपति थे। गंगा नाथ झा जैसे संस्कृत, हिंदी, मैथिली और अंग्रेजी के विद्वान और दार्शनिक कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति हुआ करते थे। लेकिन ज्ञान की यह परंपरा इसलिए विकसित हो पाई क्योंकि उन संस्थानों में प्रशासनिक पदक्रम यानी हाइरार्की नहीं होती थी। अगर होती थी तो ज्ञान की हाइरार्की। अगर ऐसा न होता तो आजीवन प्रवक्ता के पद पर रहने वाले फिराक गोरखपुरी का हर कुलपति सम्मान न करता।
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मौजूदा सरकार भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर विश्वविद्यालयों में भारतीय अज्ञान परंपरा और भारतीय चाटुकार परंपरा का विकास कर रही है। इसका संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय दिया था जब उन्होंने नोटबंदी लागू की थी। पूर्व प्रधानमंत्री और विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि इससे अर्थव्यवस्था दो प्रतिशत नीचे जाएगी। इसके उत्तर में मोदी ने कहा कि उन्हें हार्वर्ड रिटर्न नहीं हार्ड वर्क चाहिए। ज्ञान के प्रति गहरी हिकारत की भावना मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान में भरी पड़ी है। पत्रकारिता को नष्ट करने के बाद अब उसने शैक्षणिक संस्थाओं को निशाने पर लिया है। देखना है कि ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के इस युग में अज्ञान पर आधारित कथित भारतीय ज्ञान परंपरा इस देश को कहां ले जाएगी?