चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि संबंधी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट आने के बाद से आयोग भले आम लोगों को और संबंधित पक्षों के सामने अपनी बात रखने से बचना चाहता था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सरकार और आयोग के सभी संबंधित लोगों को अदालत के सामने सारे सवालों का जबाब देना पड़ेगा। और फिर इस सफाई का कोई मतलब नहीं है कि अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील के इस तर्क को नहीं माना कि मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित किया जाए और उनको काम करने से रोका जाए। अदालत यह फैसला नहीं कर सकती और बिना संबंधित पक्ष को सुने ऐसा फैसला न्यायोचित होता भी नहीं। लेकिन अदालत ने जिस तरह हर बात सफाई से पूछी है और फार्म 6 के विवाद में खुद को घसीटे जाने से अपना पाला झटका है वह इस बात का संकेत है कि ज्ञानेश कुमार मुश्किल में हैं।
अगर 14 फैसलों पर शेष दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को उन्होंने दरकिनार किया था तो यह गंभीर दोष है और सरकार द्वारा चुनाव कानून में बदलाव करने की जगह खुद से फार्म 6 में बदलाव कर लिए तो यह अपराध की श्रेणी में ही आएगा। अगर वे आपत्तियों के बाद भी शेष दोनों आयुक्तों द्वारा सभी फ़ैसलों पर दस्तखत करने का प्रमाण ला देते हैं, जैसा कि बीजेपी की तरफ़ से कहा जा रहा है तो फिर अदालत उनके पक्ष में फैसला देगी।
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बीजेपी के जबाब देने पर भी उठे सवाल

पर सवाल बीजेपी के जबाब देने पर भी उठे हैं और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण पर बीजेपी और एनडीए के लोग ही लगातार जबाब देते रहे हैं। उस हिसाब से इंडिया गठबंधन द्वारा चुनाव आयोग की घेरेबंदी और देश भर में विरोध प्रदर्शन का आयोजन करना अहम है। कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी लगातार इस सवाल को उठाते रहे हैं लेकिन उनका व्यवहार मुद्दे के अनुरूप पर्याप्त गंभीर नहीं दिखता। सारी गड़बड़ बोलकर भी चुनाव में भागीदारी करना और जीतने पर सरकार बनाने से लेकर खुशियां मनाना और हारने पर इवीएम और आयोग पर दोष मढ़ना गंभीरता को खत्म करता है। लेकिन अदालती लड़ाई और राजनैतिक लड़ाई का फर्क हमको भी समझना होगा। अदालत तथ्यों और तर्कों के आधार पर फैसला करती है, राजनीति में हवा बनने बनाने की भी बड़ी भूमिका है। और चुनाव आयोग की घेरेबंदी से लेकर सड़कों पर उतरना उसका हिस्सा है। जब बीजेपी खुलकर आयोग का साथ दे रही है तो ज्ञानेश कुमार के फ़ैसलों के साथ केंद्र सरकार और बीजेपी को जोड़ना बहुत मुश्किल नहीं है।

मतदाता सूची के पुनरीक्षण को एक सामान्य प्रशासनिक अभियान की जगह घुसपैठिया विरोधी मुहिम, अल्पसंख्यक विरोधी मुहिम और कमजोर तथा कम पढ़े-लिखे या दस्तावेजों को संभालने और प्रस्तुत करने के मामले में कमजोर या लाचार लोगों के ख़िलाफ़ अभियान बना देना चुनाव आयोग भर का काम न था। यह बीजेपी का एजेंडा था।

SIR को विदेशी नागरिक ढूँढने का अभियान बना दिया!

और जो अभियान भारतीय मतदाता सूची को दुरुस्त करने पर केंद्रित होना चाहिए था वह जाने कब विदेशी नागरिक ढूँढने वाला बना दिया गया। फॉर्म 6 में बदलाव भी वोटर के माँ-बाप की तलाश और उनसे जुड़े दस्तावेज तक इसी चलते पहुंचा। और नतीजा क्या निकला? बांग्लादेशी या रोहिंग्या घुसपैठियों के पकड़े जाने का शायद ही कोई मामला सामने आया लेकिन मतदाता सूची से तेरह करोड़ नाम काट दिए गए। यह सब तब हुआ जब बिहार के बाद हर राज्य में नए मतदाता सूची में नाम जोड़वाने और कटवाने का अभियान सा चलाया गया। मृत लोगों या पता बदलने वालों और दो जगह नाम वालों का नाम हटाना जरूरी था लेकिन उसके लिए कई राज्यों में तीस फीसदी से भी ज्यादा नाम काट देना सिर्फ बीएलओ जैसे कर्मचारियों के वश का नहीं है। यह निर्देश आयोग और संभव है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से गया हो। इसी संभावना को पुख्ता राजनैतिक विमर्श बनाने की कोशिश कांग्रेस और विपक्ष कर रहे हैं। अब यह उनके पुरुषार्थ पर निर्भर करता है कि वे इस काम को कहां तक पहुंचाते हैं।
बीजेपी और केंद्र सरकार अगर अभी तक ज्ञानेश कुमार के पीछे खड़ी है तो यह उनके फायदे का सौदा रहा होगा। लेकिन इतना तय मानिए कि अगर ज्ञानेश कुमार फँसते हैं तो यह मेल बहुत दूर तक नहीं जाएगा। केन्द्रीय सत्ता इतनी आसानी से ऐसे मसलों से घिर जाए यह होता नहीं है। वह ज्ञानेश या किसी भी ऐसे अति महत्वाकांक्षी और कैरियर के छोटे लाभों के लिए कायदे क़ानून को दरकिनार करने वालों से किनारा करने में देर नहीं लगाएगी। लेकिन इसके लिए ज़रूरी होगा कि कांग्रेस और विपक्ष का सड़क का आन्दोलन इतना दबाव बनाने में सफल हो जिसे बीजेपी का नेतृत्व अपने लिए नुकसानदेह मानने लगे। यह दूर की बात लगती है लेकिन अदालती फ़ैसला इस स्थिति को जल्दी भी लाने में मदद करेगा। अगली सुनवाई की तारीख ज्यादा दूर नहीं है। और वहां आया जबाब काफी सारे संकेत देने लगेगा।

सीजेपी ने भी बनाया मुद्दा

विपक्ष इस बात पर भी खुश हो सकता है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर सीधे ज्ञानेश कुमार की विदाई को मुद्दा बनाया है। उसका अभियान दस अक्टूबर से चलेगा। इसके पहले उसने दो अक्टूबर को जो कार्यक्रम किया उसमें मुंबई का कार्यक्रम काफी सफल रहा जबकि दिल्ली में पुलिस ने आंदोलनकारियों को लगातार खदेड़ा। इसमें सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी के लोग ही नहीं, वाम छात्र संगठन और योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण जैसे लोग भी थे। उसे और इस मांग को जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज समेत काफी सारे प्रबुद्ध और नामी लोगों का समर्थन मिल रहा है उसे भी विपक्ष अपने आंदोलन का सहारा बना सकता है।
विचार से और
पिछली बार कॉकरोच जनता पार्टी ने ही मोदी सरकार की और उनकी मजबूत छवि को तार तार कर दिया था और धर्मेन्द्र प्रधान को जाना पड़ा। लेकिन इसके लिए विपक्ष को बहुत सावधानी और समझ से काम करना होगा। पर उससे ज्यादा मुश्किल काम बीजेपी के लिए है। अभी तक तो वह ज्ञानेश कुमार के हर काम का समर्थन कर दिया करती थी और सुप्रीम कोर्ट तक ने बंगाल चुनाव के समय लाखों मतदाताओं को निराश करते हुए अगले चुनाव में वोट डालने का मजाक कर दिया। इस बार ऐसा लगता नहीं। ज्ञानेश कुमार फंस गए हैं लेकिन बीजेपी फंसी है या नहीं यह आने वाले वक्त में जल्दी ही पता चल जाएगा।