5 मार्च 2020 से ले कर 11 अप्रैल 2020 तक विश्वविद्यालयों को जारी पत्रों ने यह साफ़ किया है कि भारतीय विश्वविद्यालयों को शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि सरकार की मात्र एजेंसी समझा जा रहा है।
यह कितना हास्यास्पद और अपमानजनक है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यह बता रहा है कि शिक्षकों को अपने समय का उपयोग कैसे करना चाहिए?
शिक्षकों ने न तो यह सोचा और न ही माँग की कि सांस्थानिक स्तर पर उन्हें और विद्यार्थियों को ‘ऑनलाइन शिक्षण’ के लिए कोई भी सुविधा नहीं दी गई है। अगर रोज़ चार या पाँच कक्षाएँ संचालित होंगी तो उसके लिए ज़रूरी इंटरनेट कहाँ से विद्यार्थियों और उनको उपलब्ध होगा?
इसका मतलब तो यही हुआ कि शिक्षण जो सामूहिक एवं संस्थागत तौर पर होना चाहिए था वह शिक्षक - विद्यार्थी के व्यक्तिगत ‘त्याग’ पर निर्भर कर दिया गया है। और ऊपर से यह भी कि निगरानी भी की जा रही है।
ऊपर – ऊपर सब स्वाँग,कहीं कुछ नहीं सार,केवल भाषण की लड़ी।