किसी भी मुल्क के लिए सबसे ख़तरनाक वक़्त वह नहीं होता जब वह हार जाता है। हार तो सामने दिख जाती है- जैसे खेत में खड़ी फसल पर अचानक ओले पड़ जाएँ। हार इंसान और समाज दोनों को सोचने पर मजबूर करती है। वह बताती है कि कहाँ चूक हुई और आगे क्या सुधारना है। असली ख़तरा तब आता है जब मुल्क लंबे समय की कामयाबी में डूबने लगता है- जब उसे अपनी बढ़ती ताक़त का स्वाद इतना भाता है कि वह यह भूलने लगता है कि कौन‑सी ताक़त उसने खुद कमाई है और कौन‑सी उसे विरासत में मिली थी। यही भूल कई साम्राज्यों, बड़ी कंपनियों, राजनीतिक दलों और सभ्यताओं को डुबो चुकी है। विदेश नीति भी इससे अलग नहीं।

एक परिवार अगर सिर्फ़ बाप‑दादों की छोड़ी हुई दौलत खर्च करता रहे, तो उसे लगता है कि बैंक में पड़ा पैसा उसकी अपनी कमाई है। असलियत तब सामने आती है जब विरासत खत्म हो जाती है और जेब में कुछ नहीं बचता। मुल्कों के साथ भी यही होता है। देश भी विरासत में बहुत कुछ पाते हैं—भरोसा, रिश्ते, इज़्ज़त, संस्थाएँ, और वह साख जो पीढ़ियों की समझदारी, संयम और क़ुर्बानी से बनती है। यह सब GDP में नहीं दिखता, पर अक्सर यही चीज़ें तय करती हैं कि दुनिया आपको कितनी गंभीरता से लेती है, आपकी चेतावनी को कितना महत्व देती है, और आपको अपने फ़ैसले कितनी आज़ादी से लेने देती है।

पचहत्तर साल की जमा पूँजी

भारत ने पिछले पचहत्तर साल में यही पूँजी जमा की। यह किसी एक नेता या एक पार्टी की देन नहीं थी। यह धीरे‑धीरे, कई ग़लतियों और कई सुधारों के बीच, अलग‑अलग सरकारों ने मिलकर बनाया। इन सरकारों में बहुत मतभेद थे, पर एक बात पर सब सहमत थे—भारत अपने फ़ैसले दिल्ली में करेगा, किसी और राजधानी में नहीं। नेहरू ने समझ लिया था कि एक ग़रीब, नए‑नए आज़ाद देश के लिए महाशक्तियों की दौड़ में कूदना समझदारी नहीं। उन्होंने असर कमाने का रास्ता आज़ादी में देखा। ग़ैर‑पक्षपात कोई नैतिक प्रदर्शन नहीं था; यह किसी भी बाहरी ताक़त की पकड़ से बचने की रणनीति थी। इंदिरा गांधी ने उसी सोच को और ठोस रूप दिया। 1971 के बांग्लादेश संकट में दुनिया ने देखा कि भारत दबाव झेल सकता है और अपने फ़ैसले खुद कर सकता है। संदेश साफ़ था—भारत न किसी के खिलाफ़ है, न किसी के साथ बँधा हुआ; भारत अपने हिसाब से चलेगा।

शीत युद्ध के बाद भी यही रूह बची रही। राव ने अर्थव्यवस्था खोली, पर कूटनीतिक लचीलापन नहीं छोड़ा। वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण किया, पर अमेरिका से रिश्ते भी बनाए। मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक परमाणु समझौता किया, पर भारत की स्वतंत्र राय को नहीं छोड़ा। इन सबने ग़लतियाँ कीं—कुछ बड़ी—पर सबने मिलकर एक ऐसी विरासत छोड़ी जिसकी क़ीमत शब्दों में नहीं मापी जा सकती।

सदी के मोड़ तक भारत के पास वह चीज़ थी जो कई अमीर और ताक़तवर देशों के पास नहीं थी—साख। दुनिया भारत से असहमत होती थी, पर यह मानती थी कि भारत की राय उसकी अपनी है। दोस्त भारत को हल्के में नहीं लेते थे।

विरोधी भारत की चाल नहीं पढ़ पाते थे। किसी को यह भरोसा नहीं था कि भारत किसी और की लाइन पर चलेगा। यह भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक पूँजी थी।

मज़बूत विरासत

इसी दौरान दुनिया भर में भारतीय प्रवासी चुपचाप एक और पूँजी बना रहे थे— मेहनत, हुनर और भरोसे की पूँजी। डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, वैज्ञानिक, उद्यमी—उन्होंने वह इज़्ज़त कमाई जो कोई सरकार आदेश देकर नहीं दिला सकती। इस तरह भारत के पास दोहरी विरासत आ गई—कूटनीतिक साख और वैश्विक भारतीयों का असर। इतनी मज़बूत विरासत किसी पीढ़ी को पहले नहीं मिली थी।

विरासत पर नई ताक़त बनाई या सिर्फ़ खर्च किया?

अब असली सवाल उठता है—क्या हमने इस विरासत पर नई ताक़त बनाई है, या सिर्फ़ विरासत को खर्च किया है और उसे अपनी उपलब्धि समझ लिया है? पिछले दशक में भारत की मौजूदगी दुनिया में बढ़ी है। भारत ज़्यादा दिख रहा है। दुनिया ध्यान दे रही है। सम्मेलनों में भारत केंद्र में है। यह सब सच है। पर सवाल यह नहीं कि दुनिया देख रही है। सवाल यह है कि दुनिया मानने पर मजबूर है या नहीं। दिखना और असर—दोनों अलग चीज़ें हैं। तवज्जो और ताक़त—दोनों एक नहीं। हेडलाइन और हैसियत—दोनों का हिसाब अलग है। कई देश दुनिया की नज़रों में थे, पर अपने हित नहीं बचा पाए। असली इम्तिहान यह है कि दुनिया को आपके हिसाब से चलना पड़ता है या नहीं, या वह सिर्फ़ आपकी मौजूदगी नोट कर लेती है।

भारत की बढ़ती अहमियत में बहुत कुछ वह है जो पहले से जमा था—चीन का उभार, सप्लाई चेन की चिंता, भारत का बाज़ार, प्रवासी भारतीयों की साख। यह सब असली है, पर यह सब विरासत भी है। अक़्लमंद सरकार विरासत को बढ़ाती है। कम अक़्ल सरकार विरासत को अपनी उपलब्धि समझ लेती है। और विरासत खर्च हो सकती है—साख घट सकती है, लचीलापन कम हो सकता है, दोस्तों का भरोसा ढीला पड़ सकता है, और सबसे ख़तरनाक—हक़ीक़त से नज़र हट सकती है।

आज की राजनीति में कहानी जीत जाती है, हिसाब हार जाता है। सम्मेलन सफल इसलिए कहलाता है कि तस्वीरें अच्छी आईं। यात्रा ऐतिहासिक इसलिए बनती है कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड हुई। रिश्ता रणनीतिक इसलिए कहलाता है कि बयान में ऐसा लिखा गया। धीरे‑धीरे प्रदर्शन और नतीजे का फ़र्क़ मिटने लगता है। विदेश नीति राज्यकला से निकलकर प्रचार की दुनिया में पहुँच जाती है। कवर पेज बैलेंस शीट पर भारी पड़ जाता है।

भारत आज पहले से मज़बूत है—अर्थव्यवस्था बड़ी, फ़ौज सक्षम, तकनीक गहरी, दुनिया में पहचान ज़्यादा। पर असली सवाल वही है—क्या भारत की आज़ादी और असर भी उतनी ही तेज़ी से बढ़े हैं? क्या भारत सिर्फ़ कमरों में मौजूद है, या उन कमरों के फ़ैसलों को मोड़ भी सकता है? क्या भारत अपने दोस्तों को नाख़ुश कर सकता है—बिना डर के? क्या भारत दबाव बढ़ने पर भी अपनी राय बचा सकता है?
यही सवाल बताते हैं कि हम पूँजी बना रहे हैं या खर्च कर रहे हैं। और यही सवाल सबसे कम पूछे जाते हैं—क्योंकि इनके जवाब प्रचार से नहीं, नतीजों से मिलते हैं। इतिहास बहुत सीधा है। वह न भाषण गिनता है, न यात्राएँ, न तस्वीरें, न घोषणाएँ। इतिहास बस एक किताब खोलता है—हिसाब की किताब। वह पूछता है—क्या मिला था? क्या खर्च हुआ? क्या नया बनाया गया? और फिर वह फ़ैसला लिख देता है।

इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि भारत उठ रहा है—यह तो साफ़ है। सवाल यह है कि क्या भारत की विदेश नीति उस विरासत में कुछ जोड़ रही है—या चुपचाप उसी को खर्च कर रही है। एक रास्ता भारत को बड़ी ताक़त बनाएगा। दूसरा सिर्फ़ बड़ी ताक़त जैसा दिखाएगा। फ़र्क़ सालों तक दिखता नहीं। फिर अचानक साफ़ हो जाता है—जैसे धूप में रखा पानी एक पल में भाप बन जाए।