डोनाल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग, नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन
इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारत की गिनती उन चुनिंदा देशों में होती थी जो अंतरराष्ट्रीय मामलों में रणनीतिक स्वायत्तता के सबसे सुलझे हुए पैरोकार माने जाते थे।
दिल्ली का दस्तूर था— बोलो तो तोल-मोल कर, चलो तो ठहर-ठहर कर, और हर मोड़ पर अपने लिए राह बचाकर रखो। यह साख आसानी से नहीं बनी थी — दशकों की मशक्कत और सधे हुए कदमों से गढ़ी गई थी। लेकिन पिछले दस बरसों में इस साख पर असाधारण दबाव आया है।
आज भारत की विदेश नीति पर सवाल उठ रहे हैं — उसकी स्पष्टता पर भी, उसकी विश्वसनीयता पर भी — और ऐसे सवाल पहले कम ही उठे थे। मुसीबत केवल बाहर से नहीं है, न केवल बड़ी ताकतों के दबाव से, न केवल वैश्विक राजनीति की उथल-पुथल से।
असली चिंता यह है कि नई दिल्ली की कूटनीति ने वह संतुलित अनुशासन खो दिया है जो कभी उसकी पहचान थी। देश अभी भी महाशक्ति बनने की भाषा बोलता है, लेकिन उसकी रणनीतिक चाल अब उद्देश्यपूर्ण कम, प्रतिक्रियात्मक ज़्यादा दिखती है।
आकांक्षा और वास्तविकता के बीच की यह खाई अब बड़ी-बड़ी राजधानियों में साफ़ नज़र आने लगी है। वाशिंगटन के साथ रिश्ता अब लेन-देन का हो गया है। मॉस्को की यूरेशियाई कूटनीति बिना भारत की भागीदारी के चल रही है। बीजिंग एशिया और अफ्रीका में अपना संस्थागत जाल फैलाता जा रहा है और भारत के क्षेत्रीय प्रभाव को घेरता जा रहा है।
भारत हर बड़ी भू-राजनीतिक बहस में शामिल रहना चाहता है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि वह एजेंडा तय करने की जगह अपना पक्ष स्पष्ट करने में उलझा रहता है।
यह गिरावट इसलिए और चुभती है क्योंकि भारत की आर्थिक बुनियाद अभी भी उसकी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुपात में कमज़ोर है। विकास हुआ है, तकनीकी क्षमता भी बढ़ी है, पर यह अभी भी एक विकासशील अर्थव्यवस्था है जो भीतर से कई गहरी चुनौतियों से जूझ रही है।
दशकों तक भारत ने इन संरचनात्मक कमज़ोरियों की भरपाई बौद्धिक स्पष्टता और कूटनीतिक कुशलता से की। जब वह स्पष्टता धुंधलाती है तो क्षमता और आकांक्षा के बीच की खाई छिपाना मुश्किल हो जाता है। इससे भारत की दीर्घकालीन संभावनाएं कम नहीं होतीं। लेकिन एक असुविधाजनक सच्चाई ज़रूर सामने आती है — पिछले दशक ने भारतीय विदेश नीति की सुसंगतता को शीत युद्ध के बाद किसी भी दौर से अधिक संदिग्ध बना दिया है।
विडंबना यह है कि एक अधिक आत्मविश्वासी रणनीति की बौद्धिक नींव पहले से मौजूद है। रणनीतिकार सी. राजा मोहन ने 'क्रॉसिंग द रुबिकॉन' में भारत के शीत युद्धोत्तर परिवर्तन का सार पकड़ा था। उनका तर्क था कि नई दिल्ली को कठोर वैचारिक गठबंधनों को त्याग कर स्वतंत्रता बरकरार रखते हुए शक्ति के कई केंद्रों से व्यावहारिक ढंग से जुड़ना होगा।
बाद में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने 'चॉइसेज़' और 'इंडिया एंड एशियन जियोपॉलिटिक्स' में इस दृष्टिकोण को और परिष्कृत किया। उन्होंने रणनीतिक स्वायत्तता को निष्क्रिय तटस्थता नहीं, बल्कि एक सक्रिय संतुलन-कला बताया — स्वतंत्रता खोए बिना साझेदारी बनाए रखना और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को पलटे बिना उन्हें ढालना।
इन दोनों विचारकों ने मिलकर जो रणनीतिक परंपरा बुनी, वह विकासशील दुनिया से निकली सबसे परिष्कृत सोच में से एक थी। लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास सिद्धांत से भटकता गया। 'इंडो-पैसिफिक' जैसी अवधारणाएं, जो शुरू में लचीले भू-राजनीतिक ढांचे के रूप में थीं, अब गठबंधन की उम्मीदें लेकर चलती हैं।
सुरक्षा साझेदारियां घरेलू तकनीकी क्षमता से तेज़ रफ़्तार से बढ़ी हैं। और वैश्विक संकटों में — ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव हो या पश्चिम एशिया में संघर्ष — भारत की कूटनीतिक आवाज़ अक्सर तब भी सतर्क सुनाई दी जब नेतृत्व की दरकार थी।
नतीजा यह हुआ कि जो देश खुद को रणनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानता था, वह अब मज़बूत ध्रुवों के बीच राह निकालता नज़र आता है — अपना कोई ध्रुव परिभाषित करने की बजाय। इतिहास यह भी बताता है कि जब कोई राष्ट्र प्रभाव के सही स्रोत पहचान ले तो ऐसी धारणाएँ तेज़ी से बदल सकती हैं।
इसराइल का अनुभव देखिए। जनसंख्या में छोटा, रणनीतिक गहराई में सीमित — फिर भी इसराइल ने दशकों में असाधारण वैश्विक प्रभाव बनाया। यह प्रभाव आकार से नहीं, विशेषज्ञता से आया — ऐसी तकनीकी क्षमताएं, खुफिया तंत्र और नवाचार की पारिस्थितिकी जिन पर शक्तिशाली सहयोगी निर्भर होने लगे।
आज भी, प्रधानमंत्री नेतन्याहू की नीतियों की कड़ी आलोचना के बावजूद, इसराइल वाशिंगटन और उससे आगे उल्लेखनीय प्रभाव बनाए हुए है। सबक यह नहीं कि भारत इसराइल के तरीके अपनाए। सबक यह है कि टिकाऊ अंतरराष्ट्रीय वज़न तब बनता है जब दूसरे देश उन क्षमताओं पर निर्भर हों जो केवल आप ही दे सकते हों।
भारत के पास इसराइल की कमज़ोरियों के बिना ऐसा प्रभाव बनाने का विस्तार है। ज़रूरत है एक सचेत प्रयास की — अपनी जनसांख्यिकीय ताकत, तकनीकी प्रतिभा और लोकतांत्रिक वैधता को ऐसे नेतृत्व के रूप में ढालने की जिसे दूसरे स्वयं खोजें।
अवसर इसलिए केवल कूटनीतिक प्रतिष्ठा की मरम्मत का नहीं — बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को फिर से परिभाषित करने का है। इसके लिए एक रूपरेखा को 'सौम्य अग्रदूत सिद्धांत' कहा जा सकता है — एक स्वायत्त नेतृत्व की रणनीति जो भारत को विकासशील विश्व में सार्वजनिक भलाई का सबसे विश्वसनीय प्रदाता बनाए और साथ ही प्रतिस्पर्धी महाशक्तियों के बीच स्वतंत्रता सुरक्षित रखे।
आधार सीधा है। आज का युग कठोर गठबंधनों का नहीं, तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्रों और संस्थागत नेटवर्क का है। इस युग में प्रभाव उन्हें मिलता है जो ऐसे मंच और समाधान दे सकें जिन्हें दूसरे स्वेच्छा से अपनाएं। देश उन भागीदारों की ओर झुकते हैं जो उनकी स्वायत्तता बढ़ाएं, न कि उसे सीमित करें। चार स्तंभों पर यह रणनीति खड़ी हो सकती है।
पहला — डिजिटल शासन को वैश्विक सार्वजनिक वस्तु बनाना। भारत ने यह सिद्ध किया है कि बड़े पैमाने की डिजिटल प्रणालियां वित्तीय समावेश बढ़ा सकती हैं, कल्याण वितरण सुधार सकती हैं और राष्ट्रीय स्तर पर शासन का आधुनिकीकरण कर सकती हैं। इन प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैनात करने योग्य खुले मंचों में बदलकर — प्रशिक्षण संस्थाओं, तकनीकी सहायता और अंतर-संचालनीय मानकों के साथ — भारत विकासशील देशों को एक विश्वसनीय विकल्प दे सकता है — न निगरानी वाली तकनीकी संरचनाओं का, न एकाधिकारवादी निजी मंचों का।
दूसरा — जलवायु परिवर्तन में नेतृत्व की मुद्रा। टिकाऊ ऊर्जा की ओर वैश्विक बदलाव दशकों तक विकास की दिशा तय करेगा। भारत की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पहले से साख है क्योंकि वह उन्हीं जैसी विकासात्मक बाधाओं से जूझता है। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, जलवायु-अनुकूल कृषि और कमज़ोर देशों के लिए वित्त पोषण में सहयोगी पहल बढ़ाकर नई दिल्ली ग्लोबल साउथ में जलवायु समाधानों का प्रमुख सूत्रधार बन सकती है।
तीसरा — ग्लोबल साउथ के लिए संस्थागत नेतृत्व। वैश्विक शासन की वास्तुकला अभी भी 1945 की शक्ति-वितरण को दर्शाती है। सुधार रुका हुआ है क्योंकि बड़ी ताक़तें छोटे देशों का भरोसा नहीं जीत पाईं। भारत एक अनूठी स्थिति में है — व्यवस्था को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त बड़ा, लेकिन विकासशील देशों की चिंताओं से ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ। दक्षिणी आवाजें बुलंद करने वाले मंचों को संस्थागत रूप देकर और विकास वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन तथा व्यापार नियमों में व्यावहारिक सुधार आगे बढ़ाकर भारत ग्लोबल साउथ का कूटनीतिक सूत्रधार बन सकता है।
चौथा — समुद्री और क्षेत्रीय सार्वजनिक भलाई। भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद महासागर के केंद्र में रखती है — जो इक्कीसवीं सदी का सबसे निर्णायक रणनीतिक गलियारा है।
मानवीय सहायता, आपदा राहत, समुद्री डकैती रोधी गश्त और तटीय देशों के साथ टिकाऊ बुनियादी ढांचे की साझेदारी बढ़ाकर भारत क्षेत्र का सबसे भरोसेमंद सुरक्षा भागीदार बन सकता है। यह प्रयास स्पष्ट रूप से सहयोगात्मक दिखना चाहिए, दबदबे वाला नहीं — मक़सद वर्चस्व नहीं, भरोसेमंदी है।
इनमें से कोई भी महत्वाकांक्षा घरेलू क्षमता मज़बूत किए बिना पूरी नहीं हो सकती। भारत को अपना तकनीकी आधार गहरा करना होगा, उन्नत विनिर्माण और अनुसंधान में निवेश करना होगा, और उन संरचनात्मक निर्भरताओं को कम करना होगा जो रणनीतिक चुनाव सीमित करती हैं। बाहर की स्वायत्तता अंततः भीतर की क्षमता पर टिकी होती है।
यदि इस रणनीति को निरंतरता के साथ अपनाया जाए, तो यह धीरे-धीरे बदल सकती है कि दुनिया भारत से कैसे जुड़ती है। पश्चिमी लोकतंत्रों के लिए — ग्लोबल साउथ में विकास पहल समन्वित करने वाला एक आत्मविश्वासी भारत वैश्विक चुनौतियों से निपटने में एक विश्वसनीय भागीदार बनेगा। चीन के लिए — उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत का बढ़ता प्रभाव जुड़ाव को अपरिहार्य बनाएगा। अन्य मध्यम शक्तियों के लिए — भारत तेज़ी से बिखरती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक स्थिरकारी मध्यस्थ बन सकता है।
और सबसे महत्वपूर्ण — विकासशील देश भारत में एक ऐसा भागीदार देखेंगे जिसका उदय उनके विकल्प संकुचित नहीं करता, बल्कि विस्तृत करता है।
पिछले दशक ने शायद भारतीय कूटनीति की दिशा पर सवाल खड़े किए हों। लेकिन इसने दांव भी साफ़ किए हैं। दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहां नेतृत्व केवल सबसे मज़बूत देशों का नहीं होगा — बल्कि उन देशों का होगा जो ऐसे सहयोग के नेटवर्क बना सकें जिनमें दूसरे स्वेच्छा से शामिल हों।
भारत के पास वह विस्तार है, वह संस्थागत स्मृति है, और वह बौद्धिक परंपरा है जो इस भूमिका के लिए चाहिए। चुनौती अब यह है कि जो स्पष्टता कभी उसकी विदेश नीति की पहचान थी — उसे फिर से पाया जाए — और नए सिरे से हासिल विश्वसनीयता को रचनात्मक वैश्विक नेतृत्व में बदला जाए।
मौका अभी भी है। सवाल यह है कि क्या भारत उसे थामने का हौसला रखता है।
(सतीश झा, पूर्व संपादक, इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह। फ्लेचर स्कूल ऑफ लॉ एंड डिप्लोमेसी से अंतरराष्ट्रीय संबंध में अध्ययन। मैरीलैंड विश्वविद्यालय में विदेश नीति में फोर्ड फेलो।)