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जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ में शामिल रहे नेता आज किस ‘क्रांति’ में लीन हैं?

‘संपूर्ण क्रांति : सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ पाँच जून, 1974 को पटना के गाँधी मैदान में विशाल जन सैलाब के समक्ष जयप्रकाश नारायण ने जब यह नारा दिया तो किसी ने उम्मीद भी नहीं की होगी कि यह एक नए इतिहास की बुनियाद बनेगा। लेकिन कुछ ही दिनों बाद यह नारा चरितार्थ हुआ और दिल्ली के सिंहासन पर जनता पार्टी का शासन हो गया। लेकिन जो जेपी चाहते थे वह नहीं हुआ।

दरअसल, जेपी सत्ता के विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे। और शायद वह पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत में सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात सबसे पहले उठाई थी। जेपी ने 1950 के दशक में ‘राज्यव्यवस्था की पुनर्रचना’ नामक एक पुस्तक भी लिखी। कहा जाता है कि इसी पुस्तक को आधार बनाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ‘मेहता आयोग’ का गठन किया था, जिसने देश में सत्ता के विकेन्द्रीकरण का मार्ग प्रशस्त किया था। और जब देश में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की सीमाएँ तेज़ी से ध्वस्त होने लगीं उन्होंने उन्हें बचाने के लिए संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूँका। लेकिन उनकी सम्पूर्ण क्रांति के रथ के पहिये सत्ता की दलदल में फँस गए और आगे का मार्ग अवरुद्ध हो गया। संपूर्ण क्रांति एक सपना ही रह गयी।

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जयप्रकाश नारायण सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन ही नहीं चाहते थे, बल्कि ‘भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोज़गारी दूर करना, शिक्षा में क्रान्ति’ लाना भी चाहते थे। और वे तभी पूरी हो सकती थीं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए। और इसीलिए उन्होंने सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति- ‘सम्पूर्ण क्रान्ति आवश्यक है’ की बात पाँच जून, 1974 की विशाल सभा में कही थी। उस दौर में जय प्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था।
बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। 
लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे। लेकिन ये सभी नेता आज भी बिहार की राजनीति के मुख्य सूत्रधार हैं।
एक आंदोलन से जन्मे इन तमाम नेताओं की कर्मस्थली बिहार का पिछड़ापन यह सोचने को विवश कर देता है कि सम्पूर्ण क्रांति की फ़सल ऐसी हो सकती है क्या? 

सत्ता का मोह नहीं

जयप्रकाश और पंडित जवाहर लाल नेहरू में बहुत अच्छे संबंध थे। बताया जाता है कि वह नेहरू को अपना बड़ा भाई मानते थे और नेहरू ने उन्हें उनके साथियों के साथ अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव भी दिया था। लेकिन लोकनायक के बेमिसाल राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्हें सत्ता का मोह नहीं था, शायद यही कारण है कि नेहरू की कोशिश के बावजूद वह उनके मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए। वह सत्ता में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहते थे। 

दरअसल, अमेरिका से पढ़ाई करने के बाद जेपी 1929 में जब स्वदेश लौटे, उस वक़्त वह घोर मा‌र्क्सवादी हुआ करते थे। वह सशस्त्र क्रांति के ज़रिए अंग्रेज़ी सत्ता को भारत से बेदखल करना चाहते थे, लेकिन बाद में बापू और नेहरू से मिलने और आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने पर उनके इस दृष्टिकोण में काफ़ी बदलाव आया। 

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नेहरू के कहने पर जेपी कांग्रेस के साथ जुड़े, हालाँकि आज़ादी के बाद वह आचार्य विनोबाभा भावे से प्रभावित हुए और उनके ‘सर्वोदय आंदोलन’ से जुड़ गए। वह लंबे वक़्त तक ग्रामीण भारत में इस आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे। उन्होंने आचार्य भावे के भूदान के आह्वान का पूरा समर्थन किया था। जयप्रकाश नारायण का नाम जब भी जुबाँ पर आता है तो यादों में दिल्ली रामलीला मैदान की वह तसवीर उभरती है जब पुलिस जयप्रकाश को पकड़ कर ले जाती है और वह हाथ ऊपर उठाकर लोगों को क्रांति आगे बढ़ाए रखने की अपील करते हैं।
जयप्रकाश नारायण ही वह शख्स थे जिनको गुरु मानकर आज के अधिकतर नेताओं ने मुख्यमंत्री पद तक की यात्रा की लेकिन सत्ता के लोभ ने उन्हें जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से बिलकुल अलग कर दिया।
यही नहीं, वह जिस विकेन्द्रीकरण के पैरोकार थे आज उसी पर देश में सबसे बड़ा संकट खड़ा है। एक एक कर संस्थाओं को कुचला जा रहा है और देश के समक्ष एक अधिनायकवाद का संकट खड़ा हो रहा है। इस अधिनायकवाद को चुनौती देने के लिए क्या फिर से देश में वैसा कोई आंदोलन खड़ा हो पायेगा?

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संजय राय
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