अंतत: धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हो गया, लेकिन यह जेन-जी प्रणीत आंदोलन के प्रथम चरण की समाप्ति है। यह युवा वर्ग के आंदोलन के कथानक का अल्पविराम है। प्रथम और आगामी चरण के मध्यवर्ती अंतराल में स्वाभाविक तौर पर हमें यह सोचना होगा कि हम इसे क्या कहें- आक्रोश का अपूर्व उत्सव अथवा प्रतिरोध का कार्निवाल? बिलाशक यह बापू के दिये 'यंत्र' और 'मंत्र' (जंतर-मंतर) की ऐतिहासिक जीत है, लेकिन इसका अपूर्व चरित्र इसके लिये नयी संज्ञा की मांग करता है।

गौर करें तो शब्दकोश में इसके लिये कोई उपयुक्त शब्द नहीं है। यह आंदोलन भी है और आक्रोश की अभिव्यक्ति भी। मगर इसका अंदाज अलग है। इसका चरित्र औपनिवेशिक युग और स्वांत्रयोत्तर काल के इस तरह के सामूहिक उपक्रमों से सर्वथा भिन्न है। यकीनन जेन-जी आंदोलित और उद्वेलित है। उसकी मुष्ठियां भिंची हुई हैं, लेकिन उसके भीतर किसी के लिये घृणा, बैर अथवा वैमनस्य नहीं है। जंतर-मंतर पर उसका हुजूम मतवालों की अलमस्त टोलियों सा नजर आता है। आंदोलन का यह पैटर्न विश्व में नया है। दिल्ली का जेन-जी आंदोलन ढाका या काठमांडू और बरसों पहले के बीजिंग के थ्येन-आनमन आंदोलन से अलहदा है। वह हिंसक या अराजक नहीं है। जंतर-मंतर का आंदोलन गांधीवादी मूल्यों की महत्ता और प्रभाव की दिलचस्प मिसाल है। इसकी रगों में अन्याय के प्रतिकार के साथ ही सत्य और अहिंसा की भावना प्रवाहमान है। मजेदार बात है कि इसका अंदाज या चरित्र कुछ ऐसा है कि शब्दकोश न्यून हो गया है। क्या इसे आक्रोश का उत्सव कहें? नहीं, उत्सव या जश्न तो अंतिम चरण की सफलता के बाद का प्रसंग होता है। तो क्या हम इसे प्रतिरोध का कार्निवाल कह सकते हैं?
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जंतर मंतर आंदोलन की खासियत

आंदोलन को पहली सफलता छत्तीस दिन बाद मिली। छत्तीस दिन कम नहीं होते। कैलेंडर के पन्नों के फड़फड़ाने के साथ ही आंदोलन हाँफने लगता है। धैर्य चुकने से आंदोलन बेपटरी भी हो सकता है, लेकिन जंतर-मंतर का संघर्ष डिगा नहीं, इस दौर में मेन स्ट्रीम मीडिया फिर कर्तव्यच्युत दिखा, किंतु सोशल मीडिया सशक्त अवतार के रूप में सामने आया। गैर-पेशेवर किरदारों ने पल-पल की तस्वीरें जुटायीं और हर कोण से चीजों को पेश किया। इस आंदोलन से मुझे जेपी आंदोलन और अपने भूमिगत दिनों की याद हो आयी। मुझे राष्ट्रकवि दिनकर की 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' और डॉ. धर्मवीर भारती की 'मुनादी' कविता की याद आई। मुझे ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां याद आईं, लेकिन जंतर-मंतर आंदोलन से मुझे नये सबक मिले। यह पाठ रगों में रक्त का संचार करता है कि जेन-जी या युवा पीढ़ी सचेत है। एक बारगी दृश्यों को याद करें। कोई झंडा या बैनर नहीं, मगर बच्चे हैं कि चले आ रहे हैं। 

स्वतंत्र-भारत में यह पहला आंदोलन...

स्वतंत्र-भारत के इतिहास में यह पहला आंदोलन है, जिसमें लड़कियों ने इतनी तादाद में स्वयं स्फूर्त शिरकत की। कोई 'इंसेंटिव' नहीं, कोई फंडिंग नहीं। वे अभिभावकों को बिना बताये छिपकर आईं। निडर और निश्चिंत। गांधी ने और क्या किया था। उन्होंने अमीर-गरीब, मजदूर-किसान सबको योद्धा में बदल दिया था। उनकी जंग सत्य और सत्ता की जंग थी। गांधी जिसे आत्मबल कहते थे, वह इस आंदोलन में सतत देखने को मिला। जाति-धर्म, जेंडर, छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं। कोई छीनाझपटी, छेड़छाड़ का प्रसंग नहीं। देखें तो लगे कि बच्चे दिलजोई या तफरीह करने चले आ रहे हैं। लेकिन नहीं, वे खोट और खुरंटग्रस्त शिक्षा व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। आंदोलन की तासीर देखिये। दमन, प्रताड़ना और बेरूखी के बावजूद पुलिसकर्मियों तक को गुलाब के फूल, पानी बाटलें और फूड पैकेट ऑफर किये गये और ऐसे संबोधन व नारे सुने गये, जिससे वे शर्मसार हो जायें। प्रदर्शनकारियों के लिये फूड, पानी बॉटल्स, डस्टबीन और प्री सेफ के दूर-दूर यहां तक कि विदेशों से ऑर्डर किये गये। धरना स्थल पर गाने-बजाने, पैरोडी मिमिक्री और कोरस-गान के दृश्य थे। 

बापू से जब एक विदेशी संवाददाता ने पूछा था कि बापू आपका अपने दुश्मनों के लिये क्या संदेश है, तो बापू ने कहा था -"मेरा तो कोई दुश्मन हीं नहीं है।" आंदोलन ने लोगों के मन से डर या हौवा निकाल दिया।

इस आंदोलन ने तस्दीक कर दी कि गांधी इस महोदश की रगों में है। बापू ने कोटि-कोटि जनों में जो लौ जलाई थी, वह अभी बुझी नहीं है। सत्ता ने गलतियां कीं। उसने संवाद की अहमियत को बिसरा दिया। 20 जुलाई को पुलिस की बर्बरता ने सत्ता की छवि कलुषित की और आग में घी का काम किया। बच्चों की साहसिक सहनशीलता ने माँ-पिताओं और बड़े-बूढ़ों को जंतर-मंतर पहुंचने को प्रेरित किया। बेटे-बेटियों का आचरण धिक्कार का हेतु बना। इस आंदोलन ने कइयों की कलई खोल दी। इसमें अव्वल रहे सोनम वांगचुक। निजी अस्पताल में सत्तापक्ष के हाथों जूस पीकर उन्होंने जिस प्रकार अनशन तोड़ा, उससे उनकी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को क्षति पहुंची। राहुल और अखिलेश के बारे में वांगचुक-दंपत्ति के बयान भी गैर जरूरी थे। जहां तक सीजेपी का प्रश्न है, सीजेआई की टिप्पणी से यकबयक जनमी सीजेपी और उसके नेताओं को अभी और इम्तहान देने होंगे।
जेपी और अन्ना आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में उसके बारे में प्रतिपक्ष और बौद्धिकों के मन में ढेर सारे संशय है। यह अकारण नहीं है कि केजरीवाल को आंदोलनकारियों की ओर से कोई भाव नहीं मिला, जबकि जेएनयू की नेहा बोरा संघर्षचेता नेत्री बनकर उभरीं। राहुल गांधी, जिन्होंने पूरे दौर में साहस और सतर्कतापूर्वक कदम उठाये, से उनका सार्थक संवाद उन्हें भविष्य में जमीन मुहैया कर सकता है। राहुल सुर्खियों में रहे, अलबत्ता उन्होंने औरों को 'स्पेस' दिया और फ्रेम में अकेले रहने से परहेज बरता। वह आगे आंदोलन के हिमायती हैं। मोदी को भारत का अतीत बताते हुये उनकी यह टिप्पणी आगे भी कौंधती रहेगी कि पास्ट कैन नेवर फाइट द' फ्यूचर। क्या अतीत भविष्य का मुकाबला कर सकता है?

जंतर-मंतर आंदोलन की सफलता

यह जंतर-मंतर आंदोलन की सफलता है कि उसने सारे देश को उद्वेलित कर दिया है। प्रदर्शन की आंच विदेशों तक में पहुंच गयी है। बौद्धिक प्राय: जेन-जी के साथ हैं। सुप्रीम कोर्ट की बार कौंसिल उनके साथ है। दिल्ली के वेधशाला ने भारतीय राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। दिल्ली पुलिस की किरकिरी हुई है। प्रसंग अवांतर है। पुणे में एसपी कांबले ने पुलिस बल को युवकों पर कतई बल प्रयोग नहीं करने का ऐलान किया तो छात्रों ने 'दिल्ली पुलिस हाय-हाय, पुणे पुलिस आई लव यू' के नारे लगाये। यह 'फ्यूजन' का दौर है। जेन-जी के आंदोलन में भी कई चीजें घुलमिल गयी हैं। जंतर-मंतर के असमाप्त आंदोलन का चरित्र भी इसी 'सायुज्य' की देन है। उसमें सत्य भी है, सविनय अवज्ञा भी है, अन्याय के प्रतिकार का संकल्प है और प्रेम और अहिंसा भी। जेन-जी भारत का भविष्य है। उसके सपने, आशाएं और उसकी चिंताएं सारे भारत के लिए मायने रखती हैं। रिश्तों का यह कथानक मुझे मक्सीम गोर्की की कहानी 'सीला मातिरी' (मातृशक्ति) की याद दिलाता है। सत्य और सत्ता की मुसलसल जंग में अभी यह देखा जाना शेष है कि आंदोलन के आगे के चरणों में सत्ता क्या रवैया अख्तियार करती है?