सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और मोदी सरकार
नरेन्द्र मोदी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को शुरू से ही विशेष तवज्जो देते रहे हैं। प्रधानमंत्री के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में भले ही उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस न की हो, लेकिन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स उनकी आँखों के तारे बने हुए हैं। ये इन्फ्लुएंसर्स कभी प्रधानमंत्री से सवाल नहीं करते, बल्कि उनके हर कार्यक्रम का प्रचार करते रहते हैं।
केंद्र सरकार समय-समय पर इन इन्फ्लुएंसर्स को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न आयोजन करती रहती है। कई राज्य सरकारों ने तो सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को हर महीने वजीफा (स्टाइपेंड) देना भी शुरू कर दिया है। ये लोग सरकार और सरकार से जुड़े लोगों की तारीफ़ ही करते रहते हैं। ये वे आधुनिक दरबारी हैं, जिन्होंने सरकारी आयोजनों में पारंपरिक पत्रकारों को काफी हद तक रिप्लेस कर दिया है।
मोदी सरकार का ‘नेशनल क्रिएटर्स अवार्ड्स’
8 मार्च 2024 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ‘नेशनल क्रिएटर्स अवार्ड्स’ का आयोजन किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन इन्फ्लुएंसर्स को ‘नए भारत का राजदूत’ बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि ‘आप लोग वह आवाज़ हैं जो युवा पीढ़ी सुनती है।’ भारत मंडपम में प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच पर बैठने वालों में बीयरबाइसेप्स वाले रणबीर अल्लाहबादिया जैसे लोग भी थे, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने 14 जुलाई 2026 को तीन लाख रुपये का जुर्माना लगाया और गंभीर चेतावनी दी कि आगे लापरवाही हुई तो जुर्माने की राशि दस गुना बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी जाएगी।पीएम मोदी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स
प्रधानमंत्री मोदी खुद इन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के साथ अनौपचारिक चर्चाएँ करते रहते हैं- कभी चाय पर चर्चा, कभी नीतियों पर ब्रेनस्टॉर्मिंग। स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों को प्रमोट करने के लिए इन्फ्लुएंसर्स को बार-बार आमंत्रित किया जाता है। बीजेपी अलग से भी इनके साथ कार्यक्रम आयोजित करती रहती है।
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने 18 राज्यों में इन्फ्लुएंसर्स के साथ दर्जनों मीटिंग्स की थीं। इन राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, असम, त्रिपुरा आदि शामिल थे। G20 इंडिया समिट (2023) में तो सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था। पर्यटन, स्टार्टअप और सांस्कृतिक मंत्रालय के विभिन्न डिजिटल अभियानों में कई राज्यों के ट्रैवल ब्लॉगर्स और सोशल मीडिया क्रिएटर्स को सरकार नियमित रूप से बुलाती है।
कई राज्यों में सरकार ने डिजिटल क्रिएटर्स को पारंपरिक पत्रकारों से ज़्यादा महत्व देना शुरू कर दिया है, क्योंकि ये लोग सवाल नहीं पूछते- केवल अपना रीच बढ़ाने की कोशिश करते रहते हैं।
कभी दिल्ली की पावर गैलरी में प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब संपादकों, राजनीतिक संवाददाताओं और कैमरा टीमों की औपचारिक उपस्थिति हुआ करता था। लेकिन आज उसी ‘प्रेस गैलरी’ या सरकारी कार्यक्रमों में रील बनाने वाले, यूट्यूब पर लाखों सब्सक्राइबर्स वाले और सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने वाले ‘इन्फ्लुएंसर्स’ की मौजूदगी सामान्य दृश्य बन गई है।
कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर यह सरकार संसद भवन में प्रेस/मीडिया गैलरी की तरह ‘इन्फ्लुएंसर्स गैलरी’ भी बना दे।
पत्रकार बनाम इन्फ्लुएंसर: विश्वसनीयता vs वायरलिटी
यह मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि मीडिया की उस पुरानी परिभाषा को चुनौती है जो दशकों से ‘तथ्य’ और ‘विश्वसनीयता’ पर टिकी थी। एक पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका ‘तथ्य’ होता है। वह पूरी जिम्मेदारी के साथ गहन शोध, फैक्ट-चेक और सत्यापन की लंबी प्रक्रिया से गुजरता है। पत्रकारिता में खबर का मूल्य उसकी सत्यता से तय होता है, भले ही छपने में देरी हो जाए।इन्फ्लुएंसर की दुनिया में चतुराई की भाषा
इन्फ्लुएंसर की दुनिया ‘कनेक्शन’ और ‘एंगेजमेंट’ पर चलती है। उनका मुख्य लक्ष्य ‘लाइक’ और ‘व्यूज’ हासिल करना होता है। वे भावनात्मक जुड़ाव की भाषा में बात इतनी चतुराई से परोसते हैं कि लोग बिना सोचे-समझे उसे शेयर कर देते हैं। इन्फ्लुएंसर्स के पास बिना किसी फिल्टर के सीधे दर्शकों तक पहुँचने की स्वतंत्रता होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रभाव, सत्य का विकल्प हो सकता है?
पत्रकार तथ्यों, दस्तावेजों, स्रोतों और जमीनी अनुभव के आधार पर अपनी साख बनाता है। उसका लिखा शब्द मायने रखता है। वह कानूनों, संस्थागत सीमाओं, संपादकीय दबाव और आचार संहिता से बंधा होता है। एक खबर सरकारें हिला सकती है, नीतियाँ बदल सकती है और इतिहास का हिस्सा बन सकती है। इन्फ्लुएंसर कितना भी बड़ा हो जाए, वह राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, रघुवीर सहाय, मार्क टाली, एस.पी. सिंह या विनोद दुआ जैसी विश्वसनीयता शायद ही कभी हासिल कर पाए। ये केवल कुछ नाम हैं, ऐसे सैकड़ों नाम हैं।पत्रकार इतिहास लिखता है, जबकि इन्फ्लुएंसर ट्रेंड बनाता है। भले ही भुवन बाम को मिलियन्स में व्यूज मिलते हों या अजय नागर उर्फ केरी मिनाती को लाखों लोग देखते हों, उनकी गंभीरता और विश्वसनीयता संदिग्ध ही बनी रहेगी। इनकी जवाबदेही ‘एल्गोरिदम’ के सामने दंडवत करती है, क्योंकि इनके लिए सच से ज़्यादा ज़रूरी आज का ट्रेंड क्या है।
सत्ता का नया ‘मीडिया’ समीकरण
2023 से 2026 के बीच केंद्र सरकार और भाजपा ने इन्फ्लुएंसर्स के लिए 50 से अधिक बड़े आयोजन और सैकड़ों छोटी मुलाकातें कीं। ‘विकसित भारत एम्बेसडर’ अभियान से लेकर G20 तक, सरकार ने उन लोगों को चुना जिनकी आवाज़ युवा पीढ़ी सुनती है।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने ‘ब्रांड यूपी’ कैंपेन में इन्फ्लुएंसर्स को मुख्यधारा के पत्रकारों के समकक्ष खड़ा कर दिया है। अयोध्या और काशी जैसे पर्यटन स्थलों के प्रचार में इनकी भूमिका अहम रही है। गुजरात और महाराष्ट्र में इन्फ्लुएंसर्स को अक्सर सरकारी कार्यक्रमों में वीआईपी ट्रीटमेंट और मंत्रियों तक सीधा एक्सेस मिलता है।
मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ट्रैवल व्लॉगर्स को विशेष आमंत्रण और सुविधाएँ दी जा रही हैं। कई मौकों पर यूट्यूबर को मंच पर वरिष्ठ अखबार के संवाददाता से ज़्यादा तवज्जो दी जा रही है। कारण साफ है- पत्रकार सवाल पूछ सकता है, जबकि इन्फ्लुएंसर ज्यादातर मामलों में बिना सवाल के सरकारी नैरेटिव का प्रसार कर देता है। सरकार को ऐसे इन्फ्लुएंसर्स की जरूरत हमेशा रहेगी जो उनके पक्ष में नैरेटिव फैला सकें, लेकिन समाज को उन पत्रकारों की जरूरत रहेगी जो सत्ता से असुविधाजनक सवाल पूछ सकें। लोकतंत्र को ‘लोकप्रियता’ की नहीं, बल्कि ‘सत्य’ की आवश्यकता होती है। जब तक सत्ता के सामने सवाल पूछने वाले बचे रहेंगे, तब तक पत्रकारिता प्रासंगिक बनी रहेगी।