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मुक़ाबला बीजेपी से, वाम मोर्चे से क्यों घबरा रही हैं ममता?

बंगाल में बीजेपी के पक्ष में जो उभार क दिख रहा है, उसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है - हिंदुत्व का उभार और मुसलिम-विरोधी दुष्प्रचार। बीजेपी लोगों में यह भावना पैदा करने में सफल हो गई है कि राज्य सरकार मुसलमानों के साथ पक्षपात करती है और हिंदुओं के साथ भेदभाव। बंगाल में ऐसी सांप्रदायिक सोच रखने वाले कितने हैं, यह दिल्ली में बैठकर नहीं कहा जा सकता। 
नीरेंद्र नागर

हिंदुस्तान टाइम्स में आई एक रिपोर्ट के अनुसार तृणमूल कांग्रेस को यह अंदरूनी जानकारी मिली है कि इन चुनावों में लेफ़्ट समर्थकों का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में वोट कर चुका है और कर रहा है। यह अच्छा-ख़ासा हिस्सा कितना है, इसी पर निर्भर करता है कि बीजेपी बंगाल में कितनी सीटें लाएगी। यदि 5-10% हुआ तो बहुत अंतर नहीं पड़ेगा क्योंकि बीजेपी और तृणमूल के पिछले वोट शेयर में 23% का गैप है। लेकिन यदि एक-तिहाई लेफ़्ट वोटर ने इस बार बीजीपी को वोट डाला हो तो बीजेपी का वोट शेयर 17 से बढ़कर कम-से-कम 27% हो जा सकता है और उसकी सीटें 10 से ज़्यादा हो सकती हैं।

लेकिन यह पहली बार नहीं होगा कि लेफ़्ट का वोटर बीजेपी को वोट कर रहा है। अगर हम पिछले 20 सालों का रिकॉर्ड देखें तो हमें पता चलेगा कि लेफ़्ट का वोटर पिछले दस सालों में तृणमूल की तरफ़ भी खिसका है और बीजेपी की तरफ़ भी मुड़ा है। कब मुड़ा है और क्यों मुड़ा है, यह समझने के लिए हमें नीचे के चार्ट की मदद से सभी पार्टियों के उत्थान और पतन का ट्रेंड देखना होगा।

पश्चिम बंगाल में इन पार्टियों के प्रति ऐसा रहा है मतदाताओं का रुझान।

पहले हम लेफ़्ट और तृणमूल की लाइनों की तुलना करते हैं। आप देखेंगे कि इन बीस सालों में लेफ़्ट और तृणमूल की जगहें अदल-बदल गई हैं। जिस शिखर पर लेफ़्ट 1999 में था (46%), वहाँ आज (2016 में) तृणमूल है और जिस जगह पर तृणमूल कांग्रेस तब थी (26%), वहाँ तक आज लेफ़्ट का पतन हो चुका है। एक तरह से जैसे-जैसे लेफ़्ट का सपोर्ट कम होता गया, वैसे-वैसे तृणमूल का सपोर्ट बढ़ता गया। बस एक अपवाद था - 2004 का जब लेफ़्ट ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और तृणमूल ने (1998 में अपने जन्म के बाद का) सबसे ख़राब प्रदर्शन।

यह वह साल था जब तृणमूल कांग्रेस का एनडीए के साथ गठबंधन था। इससे पहले भी जब तृणमूल ने 2001 में एनडीए को छोड़कर राज्य में कांग्रेस का हाथ थामा था तो उसका वोट शेयर 5% बढ़ गया था।

यह संकेत था ममता बनर्जी के लिए कि एनडीए के साथ रहेंगी तो आगे बढ़ना और लेफ़्ट को उखाड़ना मुश्किल है। उन्हें समझ में आ गया कि लेफ़्ट को उखाड़ने के लिए उसी के वोट बैंक में सेंध लगानी होगी। और इसके लिए उनको लेफ़्ट से भी ज़्यादा लेफ़्टिस्ट होना होगा।

वे ऐसा करने में सफल रहीं, यह इसी से पता चलता है कि 2004 के बाद हर चुनाव में लेफ़्ट का वोट शेयर घटा है और क़रीब-क़रीब उसी अनुपात में तृणमूल का वोट शेयर बढ़ा है - केवल एक अपवाद को छोड़कर जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे। लेफ़्ट का वोट घटना और उसी अनुपात में तृणमूल का वोट बढ़ना यही बताता है कि लेफ़्ट के वोटर लगातार तृणमूल के ख़ेमे में जा रहे थे। क्यों जा रहे थे, इसके दो कारण थे। एक तो सीपीएम के पास ज्योति बसु जैसा लोकप्रिय नेता नहीं रह गया था। दूसरे, बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में सरकार की उद्योग समर्थक दमनपूर्ण भूमि अधिग्रहण नीति से राज्य के किसान नाराज़ हो गए और सिंगूर और नंदीग्राम के बाद वे तृणमूल के साथ हो लिये।

2014 : पहली बार लेफ़्ट का वोट बीजेपी को

ऊपर के पैरे में हमने एक अपवाद की बात की है जब लेफ़्ट का वोट गिरा लेकिन तृणमूल का उस हिसाब से नहीं बढ़ा। वह साल था 2014 का जब 2009 के मुक़ाबले लेफ़्ट का शेयर 13% गिरा (43 से 30) लेकिन तृणमूल का शेयर केवल 9% बढ़ा (31 से 40)। इसका मतलब क्या हुआ? बाक़ी का 4% कहाँ गया? उस साल कांग्रेस का वोट शेयर भी पहले के मुक़ाबले 3% कम हुआ। स्पष्ट है कि लेफ़्ट और कांग्रेस का यह मिलाजुला 7% वोट जो तृणमूल में नहीं गया, बीजेपी में गया जिसका वोट शेयर उस साल पहले के मुक़ाबले 11% बढ़ गया।

कहने का अर्थ यह कि बीजेपी के पक्ष में लेफ़्ट के वोट का पलायन 2014 से ही शुरू हो चुका है।

लेफ़्ट और कांग्रेस से वोटों का यह पलायन बीजेपी की तरफ़ क्यों हुआ, इसके तीन कारण हो सकते हैं। एक, मोदी की लहर जिसमें कई लोगों को लगा कि मोदी के रूप में अब देश का उद्धारक आ गया है। दूसरा, तब तक तृणमूल को सत्ता में आए तीन साल हो चुके थे और लेफ़्ट के जो लोग तृणमूल के प्रतिशोधात्मक आतंक और रोज़ की दादागिरी से परेशान थे, उनको बीजेपी में सहारा दिखा। तीसरा, लेफ़्ट के वे समर्थक जो विचारधारा के कारण फ़्रंट के साथ नहीं थे, वे तृणमूल की कथित मुसलिमपरस्ती की प्रतिक्रिया में बीजेपी से जुड़े।

लेफ़्ट के वोटों का पलायन 2016 के विधानसभा चुनाव में भी जारी रहा जब उसका वोट शेयर और 4% गिरकर केवल 26% रह गया। उधर बीजेपी का वोट शेयर भी लोकसभा चुनावों के 17% से घटकर 10% रह गया। दिलचस्प बात यह कि तृणमूल का वोट शेयर पहले के मुक़ाबले 5% बढ़ गया और यह शायद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि किसी सत्तारूढ़ दल का वोट शेयर पहले के मुक़ाबले बढ़ा हो और इतना अधिक बढ़ा हो।

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तृणमूल फ़ायदे में कैसे रही?

तृणमूल को यह अतिरिक्त वोट कहाँ से मिला? लेफ़्ट से या बीजेपी से? शायद दोनों से। याद कीजिए कि 2014 में बीजेपी दिल्ली की सत्ता पर क़ाबिज़ हो चुकी थी और देशभर में गाय के नाम पर मुसलमानों की हत्याएँ और हमले हो रहे थे। ऐसे में लेफ़्ट के बचे-खुचे मुसलिम समर्थकों ने बीजेपी को टक्कर देने के लिए लेफ़्ट में रहने के बजाय तृणमूल को ही मज़बूत करने की ठान ली। दूसरी तरफ़ 2014 में बीजेपी को वोट देने वाले कई लोग इस विचार के रहे होंगे कि दिल्ली में तो मोदी ठीक हैं, लेकिन बंगाल में जहाँ बीजेपी की स्थिति उतनी बेहतर नहीं है, वहाँ लेफ़्ट के मुक़ाबले ममता का रहना ही बेहतर है। उनका तृणमूल के साथ जाना इसलिए भी स्वाभाविक लगता है कि 2016 में लेफ़्ट और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और राज्य की सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे थे। उनको रोकने के लिए बीजेपी के कुछ वोटर, हो सकता है, तृणमूल का समर्थन कर बैठे हों।

चलिए, ये तो बातें थीं कल की। सवाल है कि इस बार क्या होगा? हम अमित शाह और मोदी की बातों पर ग़ौर नहीं करेंगे। हमारी समझ का स्रोत वे पत्रकार हैं जो बंगाल से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। वे सब एक स्वर में कह रहे हैं कि इस बार बीजेपी 6 से 12 सीटें जीतने में क़ामयाब होगी। कुछ तो इससे ज़्यादा का भी अंदाज़ा लगा रहे हैं।

यह आकलन सही है? या हवा-हवाई है?

अगर हम तीन साल पहले यानी 2016 के विधानसभा चुनावों के आँकड़े देखें तो इसकी कोई संभावना नहीं बनती। दोनों पार्टियों में तब 35% का अंतर था। जहाँ 5-7% के अंतर पर स्वीप हो जाता है, वहाँ 35% के अंतर पर क्या होगा, आप कल्पना कर सकते हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव के आँकड़ों के आधार पर लोकसभा चुनाव परिणाम का आकलन करना ठीक नहीं है। इसलिए हम 2014 के लोकसभा चुनाव के आँकड़े देखते हैं।

2014 में तृणमूल को 40% और बीजेपी को 17% वोट मिले थे। यानी तब भी अंतर 23% का था। बीजेपी को तब 2 सीटें मिली थीं। अब पाँच सालों में उसका 17% वोट शेयर बढ़ेगा भी तो कितना बढ़ेगा और क्यों बढ़ेगा? ख़ासकर तब जब देशभर में बीजेपी का वोट शेयर घटता दिखाई दे रहा है।

यह अंतर तभी घट सकता है जब बीजेपी को लेफ़्ट और कांग्रेस के वोटरों का समर्थन मिले। लेकिन बीजेपी को लेफ़्ट और कांग्रेस के वोटरों का समर्थन क्यों मिलेगा?

मेरी समझ से इसका कारण यह है कि जहाँ देशभर में चुनाव इस मुद्दे पर हो रहा है कि मोदी को दुबारा लाना है या नहीं लाना है, वहीं बंगाल में लड़ाई ममता-समर्थकों और ममता-विरोधियों के बीच की हो गई है।

लेफ़्ट फ़्रंट बनाम तृणमूल शासन

लेफ़्ट फ़्रंट ने अपने 34 साल के शासनकाल के अंतिम 10 सालों में काफ़ी ज़्यादतियाँ की थीं। लेकिन जो लोग तब लेफ़्ट की इन ज़्यादतियों की शिकायत करते थे, वे ही आज कह रहे हैं कि वे इनसे लाख दर्जा बेहतर थे। तब किसी ज़्यादती की शिकायत आप ऊपर कर सकते थे। पार्टी के लोग पढ़े-लिखे थे, उनसे आप बात कर सकते थे। लेकिन आज तृणमूल के दादा किसी की नहीं सुनते। कोई भी नया काम करवाना हो, घर बनवाना हो, कारख़ाना खोलना हो, आपको क्लब को पचास हज़ार, एक लाख का चंदा देना ही होगा। नहीं तो आपका काम रुकवा दिया जाएगा।

2011 में तृणमूल के सत्ता में आने के बाद लेफ़्ट के कार्यकर्ताओं के बुरे दिन आ गए थे। उनमें से कुछ तो बचने के लिए तृणमूल में ही शामिल हो गए और कुछ उसका बदला लेने के लिए आज बीजेपी का साथ दे रहे हैं। ख़बरें ये भी हैं कि कुछ जगहों पर बीजेपी को पोलिंग एजेंट नहीं मिले तो सीपीएम के वर्करों ने उनका पोलिंग एजेंट बनकर काम किया। ये ख़बरें कितनी सही है, यह इससे भी पता चलता है कि पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एक चेतावनी-सी देते हुए कहा कि तृणमूल की खौलती कड़ाही से बचने के लिए बीजेपी की भभकती लपटों में कूदना क्या कोई समझदारी है?

विचार से ख़ास

लेफ़्ट के कितने वोट जाएँगे बीजेपी को?

लेफ़्ट के वोट बीजेपी को जा रहे हैं, यह तो सभी मान रहे हैं लेकिन कितने जा रहे हैं, इसका अंदाज़ा किसी के पास नहीं है। अगर एक-तिहाई चले गए जो कि एक बड़ी संख्या है तो बीजेपी एक झटके में 17% से 27% तक पहुँच सकती है लेकिन तब भी वह तृणमूल के 40% से बहुत दूर होगी। पिछली बार 30% वोटों के साथ लेफ़्ट को केवल 2 सीटें मिली थीं तो 27% वोटों के बल पर बीजेपी क्या कमाल दिखा सकती है! हाँ, अगर उसके वोट सारे राज्य में बिखरने के बजाय कुछ ख़ास सीटों तक ही सिमटे हों तो वह 27% पर वोट पाकर भी कई सीटें जीत सकती है।

आख़िर में एक बड़ा सवाल यह भी - क्या तृणमूल के वोटर भी बीजेपी को वोट कर सकते हैं? इसके जवाब में मैं एक अनुभव बताता हूँ जो कोलकाता में रह रहे मेरे एक मित्र ने परसों ही शेयर किया है। मित्र ने बताया कि उसके पड़ोस के युवा क्लब के अध्यक्ष से उसकी बात हुई जो तृणमूल का सदस्य है। उसने कहा कि वह इस बार बीजेपी को वोट देने जा रहा है। क्यों? क्योंकि दीदी मुसलमानों का बहुत फ़ेवर कर रही है।

पत्नी कुछ दिन पहले कोलकाता गई थी। एयरपोर्ट से कैब में बैठी तो कैब का चालक रास्ते भर उनसे बतियाता रहा। उसकी बातों का भी वही निष्कर्ष था- दीदी मुसलमानों के साथ पक्षपात कर रही है। रास्ते में उसने दिखाता भी कि यह हरी बिल्डिंग जो दिख रही है, वह दीदी ने मुसलमानों के लिए बनवाई है।

ममता राज्य में मुसलमानों के साथ पक्षपात कर रही हैं या नहीं, यह हम यहाँ दिल्ली में बैठकर नहीं कह सकते लेकिन सुना यही है कि वह उनके लिए काम कर रही हैं। उनका जीवन बेहतर बना रही हैं। स्कूल खुलवा रही हैं। घर-घर बिजली-पानी उपलब्ध करवा रही हैं। दूसरे शब्दों में विकास कर रही हैं।
लेकिन बीजेपी इसको अलग रंग दे रही है।

बंगाल में बीजेपी के पक्ष में जो उभार दिख रहा है, उसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है - हिंदुत्व का उभार और मुसलिम-विरोधी दुष्प्रचार। बीजेपी लोगों में यह भावना पैदा करने में सफल हो गई है कि राज्य सरकार मुसलमानों के साथ पक्षपात करती है और हिंदुओं के साथ भेदभाव। वही भावना जो उसने यूपीए के ख़िलाफ़ पैदा की थी और जिसके चलते 2014 में कांग्रेस 26% से 19% पर आ गई थी।

बंगाल में ऐसी सांप्रदायिक सोच रखने वाले कितने हैं, यह हमें नहीं पता। लेकिन यह तो तय है कि लेफ़्ट के वोट ट्रांसफ़र के साथ-साथ सांप्रदायिक वैमनस्य और ध्रुवीकरण के कारण भी इस बार बीजेपी का वोट शेयर बढ़ेगा ही बढ़ेगा। इसके साथ ही 2004 के बाद पहली बार तृणमूल का वोट शेयर भी घट सकता है। अगर नहीं घटता, इतने दुष्प्रचार के बाद भी नहीं घटता, तो मानना पड़ेगा कि बंगाल में दीदी को हिलाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

नीरेंद्र नागर
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